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किसानों पर क्या मेहरबानी करेंगे ट्रंप?

यह लाख टके का सवाल है। आखिर कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलने पर ही तो विवाद है। राहुल गांधी ने भी संसद के अंदर किसानों के हितों से समझौता किए जाने की बात कही। फिर 12 फरवरी को भारत बंद में किसान संगठनों ने इस मुद्दे को शामिल किया। मोटे तौर पर भारत बंद मजदूर संगठनों और बैंकिंग कर्मचारियों का था, जो नए लेबर कोड का विरोध कर रहे हैं लेकिन किसान उसमें शामिल हुए तो उनकी चिंता भारत और अमेरिका के व्यापार समझौते को लेकर है। किसानों को लग रहा है कि भारत सरकार अमेरिकी उत्पादों के लिए भारत का बाजार खोलने जा रही है और कई अमेरिकी कृषि उत्पादों पर टैरिफ घटेगा या लगेगा ही नहीं।

ध्यान रहे कृषि पैदावार भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार संधियों में हमेशा प्रोटेक्शन की चीज रहे हैं। विश्व व्यापार संगठन यानी डब्लूटीओ के साथ हर  समझौते के समय भारत के तत्कालीन वाणिज्य मंत्रियों ने भारत के हितों को मजबूती से रखा और किसानों की रक्षा की। कमलनाथ से लेकर आनंद शर्मा तक और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के वाणिज्य मंत्रियों तक ने इसमें कोई समझौता नहीं किया। इस मामले में पक्ष और विपक्ष दोनों के बीच सहमति है। वैसे भी यह कहने की जरुरत नहीं है कि अमेरिका और यूरोप के किसानों के आगे भारतीय किसान टिक नहीं सकेंगे। अमेरिका में औसतन एक किसान को 60 लाख रुपए सालाना तक की सब्सिडी मिलती है। भारत में बातें बहुत हैं और योजनाएं भी बहुत हैं लेकिन किसानों की सम्मान निधि पांच सौ रुपया महीना है। भारत में किसानों को खाद और बीज पर जो सब्सिडी मिलती है वह कंपनियां ले जाती हैं। किसान तो बेचारा खाद और बीज के लिए भटकता ही रहता है।

इसी तरह डेयरी का मामला है। भारत में व्यापक रूप से न तो कॉरपोरेट फार्मिंग है और न कॉरपोरेट डेयरी का काम है। अमेरिका में एक गाय पर एक सौ से तीन सौ डॉलर यानी नौ हजार से लेकर 27 हजार रुपए तक की सालाना सब्सिडी मिलती है। यह फॉर्म के आकार पर निर्भर करता है। दो सौ तक गाय वाले फॉर्म को कम और उससे ज्यादा वाले को ज्यादा सब्सिडी मिलती है। इसके उलट भारत में ज्यादातर पशुपालक एक या दो गाय रखते हैं और उनका दूध बेच कर अपना घर चलाते हैं। किसानों की प्रति किलो दूध की लागत और बिक्री की कीमत का अंतर कम करने के लिए भारत में भी सब्सिडी दी जाती है लेकिन वह बहुत कम है। किसानों में भी औसत लैंड होल्डिंग भारत में बहुत कम है। ज्यादातर किसान आधा या एक एकड़ वाले हैं। ऊपर से यह तथ्य इस बार के बजट से भी जाहिर हुआ है कि भारत में आधी आबादी अब भी रोजगार और जीवनयापन के लिए कृषि पर निर्भर है। ऐसे क्षेत्र को अगर प्रतिस्पर्धा के लिए खोल दिया गया तो भारत में बड़ी समस्या होगी।

तभी सवाल है कि क्या भारत सरकार अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इस बात के लिए मना पाएगी कि वे भारत के साथ व्यापार संधि तो करें लेकिन अपने  कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में न बेचें? सवाल इसलिए है क्योंकि पिछले 10 दिन से ट्रायल एंड एरर की प्रक्रिया चल रही है। पहले दो फरवरी को व्यापार समझौते की घोषणा हुई। उसके बाद समझौते का एक फ्रेमवर्क दस्तावेज जारी हुआ, जिसमें विस्तार से बताया गया कि क्या संधि हो रही है, किन चीजों के लिए बाजार खोला जा रहा है। उसके बाद एक फैक्टशीट जारी हुई, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति के कार्यकारी आदेशों के जरिए किए गए कुछ प्रावधानों की जानकारी दी गई। इसके बाद से फ्रेमवर्क और फैक्टशीट में बदलाव हो रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि पहले फ्रेमवर्क और फैक्टशीट जो जारी की गई उसका मकसद यह देखना था कि भारत में इसका कितना विरोध होता है।

जैसे पहले कहा गया कि भारत अगले पांच साल में अमेरिका से पांच सौ अरब डॉलर के सामान खरीदेगा। यानी हर साल एक सौ अरब डॉलर का सामान खरीदने की प्रतिबद्धता जताई गई। ध्यान रहे अभी हर साल 40 अरब डॉलर का सामान खरीदा जाता है। जब इसका विरोध हुआ कि 40 अरब डॉलर को बढ़ा कर कैसे एक सौ अरब डॉलर किया जाएगा तो फैक्टशीट में एक बदलाव हुआ और कहा गया कि पहले पांच साल में पांच सौ अरब डॉलर की खरीद की जो प्रतिबद्धता थी, उसे मंशा में बदल दिया गया है। यानी ‘कमिटमेंट’ को ‘इंटेंड’ कर दिया गया है। इसी तरह फैक्टशीट में कहा गया था कि दालों का भारत आयात करेगा और उस पर जीरो टैरिफ होगा। लेकिन बाद में दालों को जीरो टैरिफ लिस्ट से हटा दिया गया। इसी तरह फ्रैमपर्क और फैक्टशीट दस्तावेज से कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलने की बात भी हटा दी गई है। इसके बावजूद अंत में क्या समझौता सामने आता है यह कोई नहीं कह सकता है। क्योंकि मार्च में अंतिम समझौते पर दस्तखत से पहले क्या क्या बदलाव होगा वह इस पर निर्भर करेगा कि भारत में सरकार पर कितना दबाव बनता है और सरकार उस दबाव को कितना अमेरिका के ऊपर ट्रांसफर कर पाती है।

अभी की स्थिति यह है कि भारत में अनेक अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए बाजार खुल रहा है और टैरिफ जीरो हो रहा है या बहुत कम किया जा रहा है। जैसे भारत ने सोयाबीन तेल के आयात की मंजूरी दे दी है और उस पर लगने वाले 45 फीसदी टैरिफ को जीरो या बहुत कम करने वाली श्रेणी में रखा है। पशुओं के चारे और दूसरे कुछ कामों में इस्तेमाल होने वाले ड्रायड डिस्टिलर्स ग्रेन यानी डीडीजी को भी मंजूरी दे दी गई। इसी तरह बादाम से लेकर अखरोट तक पर टैरिफ घटाने की सहमति हुई है। सेब पर टैरिफ घटाने का बड़ा विरोध भारत में हो रहा है। भारत के सामने इससे सिर्फ यह समस्या नहीं आ रही है कि किसान और पशुपालक परेशान हैं और उनको नुकसान होगा। इस सौदे से भारत का आयात बिल बढ़ेगा, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर असर होगा। अगर भारत इसी अनुपात में अमेरिका और यूरोप को निर्यात नहीं बढ़ाता है तो मुश्किलें और भी बढ़ेगी।

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