सत्तर वर्ष की उम्र में अपने बचपन को दूसरों की स्मृतियों में तलाश रहा हूँ तो एक अजीब दुनिया खुल रही है। देश आजाद था, लोकतंत्र नया था, लेकिन घर-परिवारों की राजनीति में गांधी और नेहरू के साथ राम, गाय, सनातन धर्म और रामराज्य भी थे। सवाल है, उस नए भारत को तब के लोगों ने कैसे समझा और जिया?… लोग तब जैसे थे? उन्हे स्वतंत्रता ने बदला या उन्होने याकि लोकमिजाज, लोकव्यवहार ने स्वतंत्रता को बदला
लिखने का बचा क्या?–२
“हाँ, काका सा (गोविंद प्रसाद व्यास) बनेड़ा में हमारे घर आए थे। वोट माँगने।”
ओमजी की स्मृति में यह बात तुरंत उभरी। फिर उन्होंने बताया, उनका चुनाव चिह्न उगता सूरज था। तब बच्चे नारा लगाते थे, “रामराज्य परिषद का निशान, उगते सूरज भगवान!”
बात 1962 की है। मेरे भाईबंद ओमप्रकाश व्यास, जिनका जन्म 1944 में हुआ था, तब सत्रह-अठारह वर्ष के थे। मैं दशहरे 1956 में जन्मा था। सो तब पाँच-छह वर्ष का रहा होऊँगा। और मेरी स्मृति में भी एक जीप है। उस पर लगा लाउडस्पीकर है। और गुलाबी रंग के वे पर्चे हैं, जिन पर उगते सूरज की छपाई थी।
ओमजी को काका सा (मेरे पिता) का बनेड़ा में उनके घर आना याद है। मुझे जीप और गुलाबी पर्चे। दोनों स्मृतियों को जोड़ने पर 1962 का वह चुनाव है, जिसमें मेरे पिता गोविंद प्रसाद व्यास विधानसभा चुनाव उम्मीदवार थे। इसी से ख्याल बना कि कैसे भला 1947 की स्वतंत्रता के बाद हमारे घर, मोहल्ले, शहर और इलाके में राजनीति पहुँची? क्या आजादी, संविधान, लोकतंत्र और समाजवाद जैसे शब्दों के जरिए? या राम, गांधी, पंडितजी और उगते सूरज भगवान के रूप में?
नेहरू को पंडितजी कहा जाता था। वे गांधी से समझे-जाने जाते थे। और गांधी का नाम राम से जुड़ा था। उनकी अंतिम साँस के साथ ‘हे राम’ की बात घर-घर बताई जाती थी। लेकिन चुनाव में रामराज्य परिषद में भी राम था। स्वामी करपात्री का रामराज्य। इसका आग्रह परंपरागत सनातन धर्म, गोसंरक्षण, हिंदू धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता और हिंदू व्यक्तिगत कानूनों में नेहरू सरकार के प्रस्तावित सुधारों के विरोध पर था। मामूली बात नहीं जो रामराज्य परिषद के माधोसिंह ने राजस्थान के जालौर से पहले मुख्यमंत्री कांग्रेस के जयनारायण व्यास को 1952 का चुनाव हरा दिया था।
तभी स्वतंत्र भारत के लोकतंत्र का आरंभ धर्म से था। इसलिए कि हर सनातनी घर-परिवार धर्म से ही धड़कता था! उस नाते मेरी स्मृति में तब और अब के धर्म का फर्क ले देकर आचरण और दिखावे का है। विश्वास और अविश्वास का है। तब सनातन धर्म था, अब हिंदू, हिंदुत्व है। यह विवरण सचमुच है कि रामराज्य परिषद की सभाओं में तब “धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो” का सनातनी आह्वान गूँजा करता था। इसमें भगवान राम के आदर्श शासन की वापसी, धार्मिक जीवन और भारत के गौरवशाली अतीत को भविष्य से जोड़ने की बात थी।
स्वामी करपात्री ने 1951 में नेहरू सरकार के प्रस्तावित हिंदू कानून सुधारों के विरुद्ध हिंदू कोड बिल विरोधी आंदोलन शुरू किया था। जनवरी 1950 में सीकर जिले के रानोली में नेहरू के खिलाफ बाकायदा एक सभा हुई। बीकानेर में कांग्रेस विरोधी पर्चे बँटे। घर-घर राजनीति पहुंचाने के लिए तब रामराज्य परिषद, हिंदू महासभा और जनसंघ तीनों का साझा राजनीतिक विषय गोहत्या निषेध था। संस्कृत, आयुर्वेद और धार्मिक परंपराओं के संरक्षण की बातें भी एक-सी थीं। मगर जाति व्यवस्था, अस्पृश्यता और मंदिर प्रवेश के मसलों में मतभेद थे। ध्यान रहे, 1949 में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर स्वामी करपात्री और हिंदू महासभा से जुड़े धार्मिक नेताओं ने बात की थी, मगर श्यामाप्रसाद मुखर्जी और आरएसएस की बनाई जनसंघ ने नहीं। 1951 के हिंदू कोड बिल विरोधी प्रदर्शनों में तब नारे लगते थे- “पाकिस्तान तोड़ दो”, “नेहरू हुकूमत छोड़ दो”!
हां, धार्मिक मसलों से ही स्वतंत्र भारत में राजनीति का स्थान बना। दिल्ली, पंजाब, यूपी आदि में विभाजन, शरणार्थियों और सांप्रदायिक हिंसा की सुर्खियाँ अखबारों में छाई रहती थीं, लेकिन रियासती प्रदेशों, मेवाड़, मालवा और मध्य भारत, हिंदीभाषी इलाकों में राम पहले थे, गाय और सनातन धर्म पहले था।
राम, धर्म, जाति, पंडित, साधु, मंदिर, गाय और धार्मिक प्रतीकों ने भारतीय लोकजीवन में राजनीति को घुसाया तो इसमें भी कांग्रेस का नेतृत्व मामूली नहीं था। गांधी ने राजनीति को अपने सार्वजनिक जीवन में रामनाम, प्रार्थना, उपवास, आत्मशुद्धि, सत्याग्रह, अहिंसा और रामराज्य से लोकमानस में पैठाया। इसका सार्वजनिक आचरण और शब्दावली राजनीतिक नैतिकता की भाषा थी। दिल्ली और दुनिया के एलीट ने इसके दूसरे अर्थ निकाले, लेकिन रायला, भीलवाड़ा, नाथद्वारा, उदयपुर यानी मेवाड़ में गांधी वही रामनामी ओढ़े हुए थे, जिसके राम की प्रतिछाया में सनातनी करपात्री थे या भीलवाड़ा का एक नगर सेठ था।
सो गांधी, मालवीय, कांग्रेस के सनातनी नेता, हिंदू महासभा और बाद में रामराज्य परिषद तथा जनसंघ इसी लंबे धर्म इतिहास के अलग-अलग पड़ाव थे। हिंदू महासभा या रामराज्य परिषद ने कोई बिल्कुल नई धार्मिक राजनीतिक भाषा पैदा नहीं की थी। उस भाषा की जड़ें स्वतंत्रता से कई दशक पहले के कांग्रेस-हिंदू सभा संबंधों में थीं।
सोचें, मेरे बचपन के उस समय पर! 1948 में हरिराम नाथानी भीलवाड़ा के श्री गांधी स्मारक कोष (गांधी की हत्या के बाद) के मानद कोषाध्यक्ष थे तो वही 1951 में चित्तौड़गढ़ किले के सप्तशताब्दी महासती मेले के अध्यक्ष भी थे। और मेरे पिता गोविंद प्रसाद व्यास उनकी दूदूवाला कंपनी के प्रबंधक और उनके राजनीतिक एक्टिविस्ट थे। दोनों ने रामराज्य परिषद से चुनाव लड़ा। एक पहला भीलवाडा का लोकसभा सांसद बना और दूसरे ने जिले की बनेडा विधानसभा सीट से 1962 में चुनाव लड़ा। धर्म की जय, अधर्म का नाश, प्राणियों में सद्भावना और विश्व के कल्याण की सनातनी प्रार्थना के नारे लगवाए। हां, जन्माष्टमी के दिन दूदूवाला कंपनी, हरिराम नाथानी कस्बे-जिले की सबसे बड़ी और भव्य झाँकी भी आयोजित करते थे।
हरिराम नाथानी का सांसद बना अकल्पनीय बात थी। वे 1952 में भीलवाड़ा से स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव में रामराज्य परिषद के उम्मीदवार थे। उन्हें 51,562 वोट मिले जबकि कांग्रेस के रमेशचंद्र व्यास को 38,361। सो नाथानी 13,201 मतों से जीते और सांसद बने।
पड़ोसी मानसिंहका परिवार के घनश्याम से इस दफा मालूम हुआ कि दूदूवाला कंपनी की बड़ी टूंका अभ्रक खान में उनका परिवार काम करता था। वह साइकिल से बागौर स्कूल जाता था। तब उसकी माँ बताती थी कि भीलवाड़ा में अपने घर के सामने रहने वाले गोविंदजी सेठजी के साथ गाड़ी में दिल्ली आते-जाते हैं! इस नाथानी परिवार के धर्म-कर्म और गोसेवा की यादें शहर में घर-घर थीं। मेरी याद की जन्माष्टमी के दिन कंपनी में लगने वाली झाँकी और भीड़ के तो कहने ही क्या!
एक बात और। रामराज्य परिषद ने 1951 में चुनाव आयोग से पहली पसंद के रूप में बछड़े और दूध दुहती स्त्री के साथ गाय का चिह्न माँगा था। वहीं हिंदू महासभा ने स्वस्तिक और तलवार को पहली पसंद बताया था। उसे अंततः घोड़ा और सवार मिला तो रामराज्य परिषद को उगता सूरज। और कांग्रेस का चुनाव चिह्न था दो बैलों की जोड़ी। जाहिर है, चुनाव में धर्म और ग्रामीण जीवन के परिचित प्रतीकों की भूमिका धर्म उत्प्रेरित थी।
1952 के आम चुनाव को जब मैंने खंगाला तो और खुलासा हुआ। सीकर से कांग्रेस के उम्मीदवार कमलनयन बजाज रामराज्य परिषद के उम्मीदवार से पराजित हुए। उन्होंने आठ पेज की एक रिपोर्ट लिखी। उसमें शिकायत थी कि रामराज्य परिषद के प्रचारक लोगों से कहते थे, कांग्रेस को वोट देना एक हजार गायों की हत्या के बराबर पाप है, जबकि रामराज्य परिषद को वोट देने से एक हजार गायों की सेवा का पुण्य मिलेगा। बजाज ने बच्चों को मिठाइयाँ देकर रामराज्य के नारे लगवाने और ब्राह्मणों को धन बाँटने के आरोप भी लगाए।
मतलब स्वतंत्र भारत के पहले चुनाव में गुलामी की समाप्ति, सत्ता परिवर्तन और नए जमाने की गूंज तथा सरकार चुनने का मामला मात्र नहीं था। उसमें पाप-पुण्य का हिसाब भी था। राजस्थान विधानसभा के उस पहले चुनाव में रामराज्य परिषद को 24 सीटें मिली थीं। कांग्रेस के बाद वह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। उसने लोकसभा की भी तीन सीटें जीती थीं।
सवाल है घर-परिवार और लोकव्यवहार में इन सब बातों को कैसे समझा जाता था? मतलब नाथानी गांधी स्मारक कोष से भी जुड़े थे, धार्मिक आयोजनों से भी और रामराज्य परिषद की राजनीति से भी। तब क्या इनमें किसी को कोई विरोधाभास दिखाई देता था? या यह सब उस समय के जीवन का स्वाभाविक हिस्सा था?
मेरी स्मृति में मई 1964 का वह दिन याद है, जब नेहरू की मृत्यु के बाद भीलवाड़ा में तेजाजी मंदिर के तालाब के किनारे चौक पर नेहरू को श्रद्धांजलि देने की शोकसभा हुई। सभी पार्टियों के सभी नेता, कम्युनिस्ट, प्रजा समाजवादी, जनसंघ, कांग्रेस और तब तक विलुप्त-सी हो चुकी रामराज्य परिषद के नेता भी उस शोकमग्न भीड़ और मंच पर थे।
ओमजी ने बताया, नेहरू भीलवाड़ा आए थे। सुरेशजी ने जोड़ा, वे सड़क से रायला होते हुए भीलवाड़ा पहुँचे थे। और दोनों का देखा यह सत्य चौंका गया कि पूरा कस्बा, शहर सड़क किनारे उमड़ा हुआ था। रायला में सड़क किनारे के स्कूल और भीलवाड़ा में जोधड़ास से शहर की तरफ सड़क के दोनों ओर पूरा शहर जमा था। नेहरू खुली गाड़ी में थे। उन पर फूल बरस रहे थे तो वे भी फूल और मालाएँ भीड़ की ओर उछाल रहे थे। नेहरू की वह यात्रा 8 मार्च 1959 को था। भीलवाड़ा में उन्होंने भारत सेवक समाज के अधिवेशन और एक सार्वजनिक सभा को संबोधित किया था।
कुल मिलाकर मेवाड़ के रियासती, सामंती, धार्मिक मानस के इलाके में भी नेहरू सुपरस्टार थे। क्यों? मैंने ओमजी से पूछा, घरों में लोग क्या नेहरू का नाम लेते थे? आप 1964 में हायर सेकेंडरी स्कूल में पीटीआई बनकर आए। आपके अनुशासन और नेहरू, नए जमाने तथा मेरी छीपा बिल्डिंग की बाद की स्कूल स्मृति के “जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़ियाँ करती हैं बसेरा, वो भारत देश है मेरा” जैसे राष्ट्रवादी भभकों वाले गानों का पाठ बनता था तो क्या इसी तरह आपके दादाजी, पिता, मेरे दादाजी या माँ और पिता कुछ बोलते, सोचते, बातें करते थे? क्यों सब नेहरू को देखने को उमड़ पड़े थे?
मोटा-मोटी जवाब था, गांधी से उनका जुड़ाव, ब्राह्मण और राजा (प्रधानमंत्री) होने के कारण। गांव, शहर में तब चंद मरफी के रेडियो सेट हुआ करते थे। जिसके पास होता था, वह दिखाने, बताने, सुनाने के लिए फुल आवाज में रेडियो खुला रखता। लोग आवाज सुनते, अनसुनी करते। नवज्योति, राष्ट्रदूत अखबार आता था, पर कुछ ही घरों में!
सो कोई न माने, मेरा मानना है कि स्वतंत्र भारत की बहुसंख्या न केवल तब अशिक्षित थी, बल्कि उतनी ही सोई हुई थी, जितनी आज कथित शिक्षित आबादी सोशल मीडिया की अफीम में अचेत है। कुंभकर्णी है।
बहरहाल, नेहरू ब्राह्मण होने के कारण पंडितों, ब्राह्मणों में घर-घर में अपने माने जाते थे। नेहरू जातिवाद के खिलाफी थे पर वही उनकी पूंजी भी थी। ब्राह्मण जाति में तब भी घर-घर बात कराने की वह ताकत थी, जैसे आज भी धर्म के जरिए घर-घर हिंदुत्व की कथाएँ बनाने वाले है। तब पार्टी कोई हो, समाज में गाय, धर्म और रामराज्य के नाम पर वोट माँगा जाता था। जहाँ “धर्म और रीति री रक्षा करो” का नारा था, वहीं जयनारायण व्यास और मोहनलाल सुखाड़िया आदि कांग्रेसी नेता जनता को यह कहकर लुभाते थे कि गया जमाना राजा-महाराजाओं का, अब जनता का राज आया है!
बावजूद इसके धर्मपरायणता दिखलाने में न कांग्रेस के रमेशचंद्र व्यास पीछे थे और न सुखाड़िया या जयनारायण व्यास।
मेरा मानना है, स्वतंत्र भारत के लोकव्यवहार और उसकी सांसारिकता में राजनीति ने धर्म की पूँछ पकड़कर ही घरों में प्रवेश किया है। कम से कम स्वतंत्रता के बाद की जिस दुनिया में, जिस नए जमाने में मेरा जन्म हुआ, उसकी शुरुआती राजनीति के रामराज्य (भले अलग-अलग हों), गाय, बैलों की जोड़ी, दीये और उगते सूरज की यादों से तो यही अर्थ है।
मैं जिस घर-परिवार में जन्मा, उसकी दुनिया मेरे जन्म से पहले ही बन चुकी थी। दादासा मालवा में कथा बाँचने जाते थे। वहाँ से अनाज और पैसा लाते थे। पैसा महाजन के यहाँ रखते थे। धर्म उनके लिए पूजा-पाठ और आस्था ही नहीं, आजीविका का साधन भी था। फिर संस्कृत की अध्यापकी (नाथद्वारा में) थी जिससे उन्होने बेटे-बेटी सभी को पढ़ाया। बडा बेटा और बेटी अध्यापक बने। एक एलएलबी कर राघोगढ़ में मजिस्ट्रेट हुए। मेरे पिता उस दूदूवाला कंपनी में प्रबंधक जिसके पास भारत की एक बड़ी अभ्रक निर्यातक की खानें थीं, गाड़ियाँ थीं, धर्मादा था और उससे स्वतंत्रता से आई राजनीति थी।
बदलाव मामूली नहीं था। पर घर-परिवार, जनजीवन इन सबसे निस्पृह ही था। ओमजी और सुरेशजी ने एक झटके में बात खत्म की और कहा बचपन में ही हमारी शादी कर दी गई और पिता ने बताया, “हमने हमारा कर्तव्य निभा दिया। अब तुम्हें जो करना हो, करो।”
सोचता हूँ, यह कैसी दुनिया थी? बचपन में विवाह, फिर अपने बूते आजीविका का ऐसा बोझ! पढ़ाई कितनी हुई, दुनिया कितनी देखी, क्या करना चाहते थे, यह सब शायद किसी ने पूछा ही नहीं। बड़े शहरों के संपन्न परिवारों में जीवन कुछ और रहा होगा। लेकिन रायला, बनेड़ा, भीलवाड़ा और आसपास के कस्बों-गाँवों, असल भारत में स्वतंत्रता बाद की नई पीढ़ी के लिए अपना रास्ता खुद बनाना असाधारण मामला था। तब घर-परिवार की जिम्मेदारियाँ व समय उम्र पूछकर नहीं आता था।
और मैं? जिस समय मेरा बचपन शुरू हो रहा था, उस समय मेरे पिता और उनसे पहले की पीढ़ी अपने-अपने हिस्से का जीवन बहुत जी चुकी थी। दादासा के कथा बाँचने से पिता के कंपनी प्रबंधक और चुनावी उम्मीदवार बनने तक कितना कुछ बदला होगा, इसका अनुमान ही लग सकता है।
मैं अब सत्तर वर्ष का होकर उन लोगों से पूछ रहा हूँ कि मेरे जन्म से पहले घर में क्या-क्या हुआ था। और हैरानी यह है कि जिनसे पूछ रहा हूँ, वे भी उस समय बच्चे ही थे।
ओमजी और सुरेशजी की बातें सुनते हुए मुझे बार-बार दादासा का खयाल आया। वे मालवा में कथा बाँचने जाते थे? कितने दिन रहते थे? अनाज और पैसा लेकर लौटते तो घर कैसे चलता था? लोग कैसे चलते थे? स्वतंत्रता ने उन्हे बदला या उन्होने याकि लोकमिजाज. लोकव्यवहार ने स्वतंत्रता को बदला? (जारी)
