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जी-20: ‘इतिहास’ रचा या गर्व लायक कुछ नहीं?

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आज राजधानी दिल्ली का ताला खुलेगा। सवा तीन करोड़ लोग घरों से बाहर निकल वापिस अपने काम-धंधे तथा रोजमर्रा के ढर्रे में लौटेंगे। सोचें, घरों में बैठे लोगों ने जी-20 का क्या अर्थ निकाला होगा? चार-पांच दिन की बरबादी से दिल्ली के नागरिकों याकि भारत के 140 करोड़ लोगों को क्या हासिल हुआ? जवाब हमारी तासीर, उसके इलहाम व ख्याल हैं। पहली बात नरेंद्र मोदी का चेहरा! दूसरी बात रंग-बिरंगे, शाही वैभव की झांकियां। तीसरी बात अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान जैसे शक्तिशाली देशों के राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों से नरेंद्र मोदी की चमकी दुकान की तस्वीरें हैं। चौथी बात, टीवी चैनलों, भाषणों से वसुधैव कुटुम्बकम्, वन अर्थ-वन फैमिली-वन फ्यूचर, से पश्चिम एशिया से यूरोप तक रेल और शिपिंग कॉरिडोर, समावेशी, निर्णायक और महत्वाकांक्षी अध्यक्षता जैसे सुने गए बड़े-बड़े जुमले हैं! पांचवी और आखिरी बात ‘नई दिल्ली की लीडरशीप घोषित हुई’ इतिहास रचा गया जैसे वाक्य हैं, जिन्हें बोल कर प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री का अपने हाथों अपनी पीठ थपथपाना है। मतलब भारत विश्व नेता, विश्व गुरू, विश्व शक्ति!

मेरे घर की काम मददगार और कूड़ा उठाने वाले ने मेरी पत्नी से पूछा यह जी-20 है क्या जो पुलिस वाले रोक रहे हैं, सब बंद कर दिया है। इससे होगा क्या? हमें क्या मिलेगा? कह सकते हैं हमारा गौरव बढ़ा! प्रधानमंत्री को मई 2024 के चुनाव तक यह तराना गाना चाहिए कि साला मैं तो विश्व नेता बन गया। हम दुनिया के गुरू हो गए। निश्चित ही ऐसे असंख्य भक्त भारतीय हैं, जिन्होंने टीवी चैनलों के आगे बैठ क्षण-प्रतिक्षण यह सोचा कि मोदी तो भगवान हैं तभी तो यह मुमकिन हुआ। अब हम भारतीय तीन-चार साल में चीन को पछाड़ देंगे। तीसरा वर्ग उन लोगों का है जो जी-20 से इवेंट मैनेजर की मोदी काबलियत के मुरीद हैं। उन्हें मालूम है इवेंट के चुनावी मकसद।

लब्बोलुआब यह कि अंतरराष्ट्रीय रिश्तों, भू-राजनीति, कूटनीति, वैश्विक आर्थिकी और सबसे बड़ी बात भारत की सुरक्षा के संदर्भों में बिरले ही भारतीय होंगे जो रियलिटी, रियलिज्म में जी-20 के नतीजे को तौलते हुए हों। देश की सुरक्षा, समृद्धि, दुनिया में पहचान और रिश्तों के ओर-छोर में जी-20 की मेजबानी को जांचें।

सब मानेंगे नरेंद्र मोदी का यह कहा कि इतिहास रच गया या विदेश मंत्री जयशंकर का यह जुमला की नई दिल्ली की लीडरशीप घोषित हुई! बेसिक सवाल है क्या दुनिया ने इसे माना? खास कर उस जी-20 समूह में भारत का क्या मान-सम्मान बना, जिसके नेताओं की लल्लोचप्पो में प्रधानमंत्री मोदी पिछले नौ वर्षों से दुनिया घूमते हुए हैं। इस सत्य को गांठ बांधें कि जी-20 समूह अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, इटली याकि दुनिया के सर्वाधिक अमीर सात देशों के जी-7 का बनाया समूह है। पिछले नौ सालों में नरेंद्र मोदी ने डोनाल्ड ट्रम्प और जो बाइडेन के साथ बैठ कर और अमेरिका में अपना अभिनंदन करवा कर अपने को सर्वाधिक गौरवान्वित, मुदित दिखलाया है तो ऐसा इसलिए कि पश्चिम में ही हमें सुकून मिलता है। मोदी जानते हैं कि भारत के लोगों, गुजरातियों और नौजवान आबादी की तासीर में अमेरिका-यूरोप याकि पश्चिमी सभ्यता का क्रेज नंबर एक पर है। इसमें सबके अलग-अलग कारण हैं। बतौर वैचारिक तथा भारत जरूरत में, मैं स्वंय अपनी पढ़ाई व समझ तथा 1976 में पत्रकारिता के आरंभ में मानवाधिकारों, मानव गरिमा, अवसर व विकल्पों-विचारों की भिन्नता, सुलभता में शीतयुद्ध के अनुभवों से एक राय बनाए हुए हूं। मेरा निष्कर्ष है मानवता का भला पश्चिम से है। भारत का हित पश्चिम से है। तभी मैं नेहरू-इंदिरा-कांग्रेस के निर्गुट फलसफे का आलोचक रहा हूं। मेरा मानना है कि रिश्तों की नैसर्गिकता, ऐतिहासिकता में न चीन भरोसे लायक है और न पाकिस्तान। तानाशाह देश, साम्यवादी विचारधारा, कबीलाई-गंवार इस्लामी देश तथा अहंकारी चाइनीज सभ्यता से हम भारतीयों ने यदि भाईचारे की गलतफहमी पाली तो धोखा खाएंगे। और मोटा-मोटी मेरा यह सोचा व लिखा वक्त की कसौटी पर सही साबित हुआ है।

मैं पीवी नरसिंह राव, वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह से लेकर नरेंद्र मोदी के पश्चिमी रूझान का समर्थक रहा हूं। मेरा मानना था, है और रहेगा कि 9/11, अफगानिस्तान, यूक्रेन पर रूस के हमले और शी जिनफिंग के विस्तारवादी मंसूबों की घटना-दर-घटना से प्रमाणित होता हुआ है कि यदि भारत ने अमेरिका-पश्चिमी सभ्यता से कदमताल में वैश्विक राजनीति नहीं की तो न इधर के रहेंगे और न उधर के। चीन ने भारत को पहले खाया है और भी खाएगा। चीन के लिए ताइवान या वियतनाम की तुलना में भारत का अक्साई चिन व अरूणाचल प्रदेश कई गुना अधिक सॉफ्ट टारगेट है। पिछले बीस सालों में चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी, शी जिनफिंग ने भारत को आर्थिक तौर पर आश्रित बनाया है, उसकी पड़ोसी देशों में तूती घटाई है, भारत की घेरेबंदी की है तो वक्त चेताता हुआ है कि चीन के आगे सुरक्षा, समर्थन अमेरिका और पश्चिमी देशों से ही है। इसलिए भारत को पश्चिम से प्रगाढ़ सामरिक-राजनीतिक-सैनिक रिश्ते बनाने चाहिए। उनकी भावनाओं और संवेदनाओं की चिंता करनी चाहिए।

उधर अमेरिका और पश्चिम को भी भारत की इसलिए जरूरत है क्योंकि उसे भी चीन से खतरा है। पश्चिम ने नादानी में चीन को बेइंतहां दूध पिला कर उसे ऐसा भस्मासुर बनाया है कि वह अब दुनिया के लिए खतरा है। चीन रियल महाशक्ति है और वह अपनी धुरी पर नई वैश्विक व्यवस्था चाहता है। उसके आगे भारत पचास साल कोशिश कर ले तब भी वह बराबरी नहीं पा सकेगा। दोनों देशों की इकोनॉमी का अंतर तीन-चार खरब डॉलर बनाम 15 खरब डॉलर का है। नरेंद्र मोदी अमृतकाल, विकसित भारत का कितना ही झूठ बनाएं भारत यदि दुनिया के ग्लोबल साउथ याकि गरीब-कंगले-विकासशील (इनमें बड़ी तादाद में कर्ज ले कर चीन के बंधक बने देश) देशों की जमात में अपनी कमान का ख्याल बनाता है तो वह गंवार निर्गुट नीति की वापसी होगी। जैसे पंडित नेहरू सत्तर साल पहले निर्गुट आंदोलन के नाम पर दुनिया के नेतृत्वकर्ता होने के गुमान में थे और हिंदी-चीनी भाई-भाई की हवाबाजी में कथित इतिहास बनाते थे वही फिर होता हुआ है।

प्रधानमंत्री मोदी ने 9-10 सितंबर को क्या कूटनीति की? जी-20 के 16 देशों (जो रूस के यूक्रेन के हमले के निंदक) को मनाया कि वे यूक्रेन पर हमले में रूस की आलोचना का स्टैंड छोड़ें ताकि रूस व चीन को पटा कर दिल्ली घोषणापत्र बन सकें। ऐसा क्यों चाहा ताकि भारत की दुकान चले। जिसे असंभव माना जा रहा था वह संभव हो जाए। नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता की वाह होगी!

पर क्या वाह हुई? हां, रूस के विदेश मंत्री ने भारत की वाह की। चीन ने वैसी प्रतिक्रिया नहीं दी क्योंकि शी जिनफिंग ने दिल्ली नहीं आ कर पहले ही बता रखा था कि वह भारत की अध्यक्षता को क्या भाव देते हैं।

बावजूद इसके विदेश मंत्री का ऐलान कि नई दिल्ली की लीडरशीप घोषित हुई! जाहिर है नेहरू से नरेंद्र मोदी तक का यह भारत सत्य है कि हम हिंदुओं की तासीर मुंगेलीलाल के सपनों की है। जी-7 याकि पश्चिमी देशों ने बहुत सोच समझ कर (भले पीछे स्वार्थ हो) भारत को, नरेंद्र मोदी को जी-20 की अध्यक्षता का दायित्व दिया। और नतीजे में नरेंद्र मोदी मानते हैं कि इतिहास रचा गया तो दूसरी तरफ अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस सहित दुनिया के प्रबुद्ध तथा मीडिया (रायटर, बीबीसी, अल जजीरा, गार्डियन, डीडब्ल्यू एबीसी, सीएनबीसी आदि लगभग सभी की रिपोर्टों-टिप्पणियों में) इस सत्य को पकड़े हुए है कि संयुक्त घोषणापत्र बिना रूस के उल्लेख के जारी हुआ। मतलब यूरोप-अमेरिका-जी-7 देशों के घर-घर की दुखती नस के प्रतीक यूक्रेन पर हमले की निंदा दिल्ली में नहीं हुई। तभी यूक्रेन ने तुरंत यूरोपीय संघ-अमेरिका की इस प्रतिनिधि प्रतिक्रिया को व्यक्त किया कि दिल्ली घोषणापत्र में गर्व लायक कुछ नहीं है। मतलब बेकार, अप्रभावी, कूड़ेदानी में फेंकने लायक घोषणापत्र।

दिल्ली घोषणापत्र के कंट्रास्ट में बाली घोषणापत्र याकि इंडोनेशिया की वाह है, जबकि भारत के विदेश मंत्री का घमंड में यह तुक्का है कि बाली, बाली है और नई दिल्ली, नई दिल्ली।

सोचें, जिस जी-20 याकि पश्चिमी देशों के समूह की तूताड़ी प्रधानमंत्री मोदी ने भारत में घर-घर में बनवाई, देश भर में प्रोपेगेंडा और बैठकें हुईं उसका निर्माता पश्चिमी जनमानस दिल्ली घोषणापत्र को धिक्कारता हुआ है और निराश है। तभी वैश्विक (चीन-रूस विरोधी पश्चिमी समूह) थिंकटैंक व जी-20 की कोर राजधानियों का नैरेटिव यह बना है कि भारत ऐसा ही है। अमेरिका के नंबर एक अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स में रिपोर्ट थी कि शिखर सम्मेलन में राष्ट्रपति बाइडेन भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपने रिश्तों को सहज बनाने, दिखलाने में अधिकांश समय चुपचाप रहे। बाइडेन के एयरफोर्स वन में आए पत्रकारों ने, अधिकारियों का कुल मिलाकर दिल्ली में समय काटना था। पत्रकारों का ज्यादा समय इस शिकायत में गुजरा कि हमें फ्री एक्सेस क्यों नहीं है? ऐसे शिखर सम्मेलन का क्या अर्थ है? पश्चिमी मीडिया की रिपोर्टों का सार है कि उनके नेताओं ने घोषणापत्र वह बनने दिया जो वे (मोदी) चाहते थे। मेजबान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्मान में राष्ट्रपति बाइडेन ने लोकतंत्र के मुद्दों को हवा नहीं दी। घोषणापत्र से यूक्रेन पर रूसी आक्रामकता की आलोचना को हटा दिया गया। बाइडेन दिल्ली आए, सीधे नरेंद्र मोदी के घर गए और उसके बाद पश्चिमी समूह ने चुपचाप वह होने दिया, जिससे नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक दुकान चमके। आखिर पश्चिमी देश यदि अड़ते तो बिना रूस की आलोचना के घोषणापत्र बनता ही नहीं। तब भारत की किरकिरी होती। कथित ग्लोबल साउथ, चीन और रूस सबमें भारत व नरेंद्र मोदी का जीरो मतलब होता। जबकि भारत का चीन के आगे रूतबा और मान बने यह तो पश्चिमी देशों की अब प्राथमिक जरूरत है। इस बात को देशी और खुद प्रधानमंत्री मोदी के उदाहरण से समझें कि जैसे दिल्ली में बड़े-बड़े मीडिया समूह कथित थिंक इंडिया की फाइव स्टार गोष्ठियां करते हैं और बतौर मिसाल ‘इंडिया टुडे’ की उस गोष्ठी को याद करें, जिसमें अरूण पुरी विनती करते हैं कि मोदीजी हमारी दुकान चला दीजिए तो मोदी उन पर कृपा कर, यह कहते हुए कि चलो मैं आज दुकान चला देता हूं गोष्ठी को हिट बनवा देते हैं वैसा ही बाइडेन ने होने दिया। बाइडेन से मोदीजी ने गुजारिश की होगी और उन्होंने मौन रह कर, सबको कह कर भारत के साझा घोषणापत्र को ओके कराया, जिस पर जयशंकर का हुंकारा था-नई दिल्ली की लीडरशीप घोषित हुई!

कह सकते हैं क्या फर्क पड़ता है। भारत की दुकान तो चल गई। रूस व चीन भी खुश।

पर हिसाब से जिस जी-20 से भारत ने चीन के मुकाबले के लिए सामरिक-सैनिक-रणनीतिक गठजोड़ का प्लान बनाया है मोदी सरकार का सामरिक, भू-राजनीतिक ताना-बाना है वह क्या ऐसी कूटनीति से फलीभूत होगा? आप यूरोप व अमेरिका के सगे न बने और वह चीन के मुकाबले में आपका सगा बने ऐसा क्या संभव है? ताली दो हाथ से बजती है या एक हाथ से?

यदि जी-20 फालतू है। उससे लंबा फायदा नहीं है तब भला सरकार ने जी-20 का देश भर में हल्ला क्यों बनाया? दिल्ली को लॉकडाउन में क्यों रखा? रिकार्ड तोड़ इतना ऐसा खर्च कैसे जो छह साल पहले जर्मनी के आयोजन से सात सौ प्रतिशत अधिक बताया जा रहा है? क्यों तब चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के मुकाबले अमेरिका के साथ भारत से पश्चिम एशिया से यूरोप तक रेल और शिपिंग कॉरिडोर की योजना का ऐलान हुआ? पूरे साल पूरे देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका केंद्रित जी-20 की मेजबानी को भारत का अहोभाग्य बताया तो अंत परिणाम में ऐसा कैसे जो अमेरिका-यूरोप में दिल्ली घोषणापत्र निरर्थक करार है? यूरोप में यह मानना कि यूक्रेन की बजाय रूस की चिंता में भारत ने घोषणापत्र बनाया। वही अमेरिका में यह धारणा है कि भारत है ही ऐसा! वह लफ्फाजी पसंद है, उसे अपनी खुद की सुरक्षा, हितों का भी ख्याल नहीं होता।

सोचें,  दिल्ली घोषणापत्र में रूस की विस्तारवादी आक्रामकता की भर्त्सना या आलोचना नहीं होने दे कर भारत ने चीन को क्या मैसेज दिया है? दुनिया को क्या बताया है? इसी के साथ कल्पना करें कि चीन ने यदि अक्साई चिन व अरूणाचल में अपनी सेना घुसाई तो भारत तब दुनिया से, अमेरिका या यूरोप से चीन की आलोचना व निंदा चाहेगा या नहीं? अगले वर्ष जब जी-20 की शिखर वार्ता होगी और उससे पहले चीन ने भारत की सीमा पर आक्रामकता दिखाई तो जी-20 के नए अध्यक्ष ब्राजील के राष्ट्रपति लूला ने यदि चीन से अपने खास संबंधों में भारत के चाहने के बावजूद रियो घोषणापत्र में चीन की आक्रामकता का जिक्र नहीं होने दिया तो भारत के लिए बैठक कैसी निरर्थक होगी? भारत क्या तब यह आलोचना करते हुए नहीं होगा कि रियो घोषणापत्र में क्या है गौरव लायक! भारत अकेला अलग-थलग तब बेगानी शादी में अब्दुल्ला दिवाना नहीं होगा?

सवाल है क्यों ऐसा सोचें? इसलिए क्योंकि विश्व राजनीति सचमुच रियलिज्म, यथार्थवाद की निर्ममता में है। जबकि भारत की त्रासदी है जो पहले दिन से संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मुद्दे को ले जाने से ले कर जी-20 बैठक के ऐतिहासिक मौके पर हवाबाजी, जुमलेबाजी से गलतियां करते हुए है। अवसर गंवाता है। इतिहास रचने की कपोल कल्पनाएं करता है। हम न यथार्थवादी हैं और न आदर्शवादी आचरणकर्ता हैं। सबका साथ, समावेशी या वन अर्थ जैसे आदर्शों में फिर करनी में भी आचारण दिखलाना होता है। तभी पंडित नेहरू से आज तक की भारत विदेश नीति इलहामी, मुंगेरीलाल वाली और गंवार रही है। ख्यालों व छलावों में जीते हुए ऐसे जुमले बोलते रहो कि इतिहास रचा, विश्व नेता और विश्व गुरू हुए। ठीक कहा एक वैश्विक जानकार रिचर्ड एन हास ने कि शिखर बैठकों की संयुक्त घोषणाएं अक्सर मेजबान देश की तासीर में होती है, उसकी विशेषताओं को लेती हैं। लगता है मेजबान ने चीन या रूस का विरोध नहीं करने का फैसला किया।… जबकि बाइडेन, पिछले राष्ट्रपतियों की तरह, भारत को करीब लाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, उन्हें सीमित सफलता मिल रही है, लेकिन यह रिश्ते की प्रकृति है। यह यहां केक में पकाया जाता है। क्या यह बात हम, भारत के लोग समझ सकते है?

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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