बवाल, राजनीति और प्रतिलिपि रघुवर

बवाल अब तय है। अगले दो साल नागरिकता संशोधन कानून, नागरिक रजिस्टर, जनगणना, जनसंख्या रजिस्टर की अफरा-तफरी के होंगे इसी पर राजनीति पकेगी। हिंदू-मुस्लिम होगा। केंद्र की भाजपा सरकार और प्रदेशों की गैर-भाजपा सरकारों में अलग टकराव बनेगा। और उसी पर फिर बिहार, यूपी, गुजरात व पश्चिम बंगाल के चार अहम राज्यों के विधानसभा चुनावों की दिशा भी बनेगी। यह सोचना फालतू है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एनआरसी पर भाषण से शांति बनेगी और मुद्दा आया-गया हो जाएगा।

जैसा मैंने कल लिखा कि नागरिकता संशोधन कानून गहरा अर्थ लिए हुए है। तभी यह सिर्फ असम का दायरा लिए हुए नहीं है, बल्कि एनपीआर, जनगणना और एनआरसी के क्रम में सन् 2024 तक का रोडमैप है। सामान्य बात नहीं जो रविवार को प्रधानमंत्री ने एनआरसी पर बोला और 48 घंटे के भीतर कैबिनेट ने बैठक कर एनपीआर याकि राष्ट्रीय आबादी रजिस्टर का निर्णय किया।

क्या है इसका अर्थ? क्या यह नहीं कि प्राण जाए पर अमित शाह का वचन न जाए कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) बनेगा। कोई माने या न माने अपना मानना है कि झारखंड में भाजपा की हार ने अमित शाह के एजेंडे को ताकत दी है! यों दो दिन रांची में रहते हुए मैं सोचता रहा हूं कि बतौर मुख्यमंत्री रघुवर दास इक्वल टू मोदी-शाह थे या नहीं? मोदी-शाह की झारखंड प्रतिलिपि! जैसे मोदी-शाह ने देश में राज किया वैसे रघुवर दास ने झारखंड में किया। रघुवर दास ने प्रदेश में भाजपा-संघ-तमाम तरह के नेताओं-कार्यकर्ताओं को अपनी मनमर्जी हांका। कथित तौर पर हिंदुवादी एप्रोच में काम किया। इसमें एक आंशिक सत्य है। इसे झारखंड से बाहर लोग नहीं जानते। उन्होंने चर्च, मिशनरी और मुस्लिम आबादी को हाशिए में डाला। रघुवर दास की यह हिम्मत मोदी-शाह से भी भारी थी, जो उन्होंने झारखंड में चर्च, स्कूल आदि की जमीन के कब्जे के दस्तावेज तलब किए। धर्मांतरण रोकने, हिंदू एजेंडे पर खम ठोक यदि किसी भाजपाई मुख्यमंत्री ने काम किया तो उसमें रघुवर दास अपने को आगे बता सकते हैं। इसी पर प्रतिक्रिया में बना सत्य है कि विधानसभा चुनाव में ईसाई-मुस्लिम-आदिवासी आबादी का गठजोड़ बनवाने, भाजपा को हरवाने में मिशनरी लॉबी ने बहुत कायदे से काम किया।

पर मोदी-शाह की तरह रघुवर दास ने अपने घमंड में, अपनी हिंदू बनाम गैर-हिंदू, आदिवासी बनाम गैर-आदिवासी राजनीति, नियंत्रित मीडिया के नैरेटिव में अपने अजेय हो जाने की गलतफहमी पाली। प्रदेश में भाजपा-संघ की चालीस साला मेहनत को ले डूबे। मोदी-शाह के मानसपुत्र के नाते रघुवर दास ने झारखंड के पांच सालों में लोकल बनाम बाहरी, आदिवासी बनाम गैर-आदिवासी, बनियों बनाम फारवर्ड आदि के जो छोटे-छोटे वोट टुकड़े और विमर्श बनाए उसका लक्ष्य था कि चुनाव के वक्त आदिवासी बनाम गैर-आदिवासी और अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक का वह चुनावी पाला बने, जिसके आगे विपक्ष टिक नहीं पाए। मगर यह सेना को घर बैठा कर सेनापति के घमंड का लक्ष्य था!

प्रादेशिक स्तर पर राजनीति का यह मोदी-शाह गुरूमंत्र रघुवर दास, देवेंद्र फड़नवीस, मनोहर लाल खट्टर के लिए रहा है तो योगी आदित्यनाथ, सर्वानंद सोनोवाल के लिए भी है। राजनीति को पहले धर्म-जाति के छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटना। फिर उससे एक बहुसंख्यक वोट समूह को इस चिंता के प्रचार से उभारना कि यदि विपक्ष जीता तो आदिवासी हावी होगा, मुसलमान हावी होंगे, अराजक तत्व हावी होंगे, जबकि हमसे सुरक्षा और विकास है। रघुवर दास ने वोटों की अपनी गोलबंदी में बनियावाद, आदिवासी की जमीन को सुरक्षित बनाने वाले एक्ट से छेड़खानी, कानून- कायदे में बिना आगे-पीछे सोचे जो फैसले किए और विकास के अपने घमंड में सत्ता का जैसे नशा किया, दो-चार अफसरों के घेरे में बरबादी का मकड़जाल अपने हाथों खुद जैसे रचा वह मोदी-शाह से प्रेरणा पाए हुए था तो उस पर मोदी-शाह भी फिदा थे। इन्हें अपने लघु-प्रादेशिक संस्करण के जीतने का सौ टका विश्वास था।

बहरहाल मैं भटक गया हूं। मूल बात है कि मोदी-शाह के वक्त की, उनकी सत्ता की, उनके प्रादेशिक संस्करणों की राजनीति का कवर बांटो, डराओ और जीतो था, है और रहेगा तो इसलिए भी कि हम हिंदुओं को इसके अलावा दूसरी राजनीति आती भी नहीं है। सोचने को सोचा जा सकता है कि सन् 2000 से ले कर आज तक नरेंद्र मोदी ने जातीय राजनीति से हिंदुओं को ऊपर उठाया। हिंदू राष्ट्रवाद बनाया लेकिन सतह की हकीकत पर जरा विचार करें तो जात-जात का खंड-खंड जो विग्रह मोदी-रघुवर दास की कमान में बना है वैसा तो कांग्रेस के वक्त भी नहीं था। पिछले पांच वर्षों में आदिवासी, दलित का हिंदू समाज, राजनीति से ऐसा भयावह विग्रह बना है, इससे छतीसगढ़-झाकखंड में भाजपा का जो सफाया हुआ है तो क्या सवाल नही बनता कि संघ-भाजपा हिंदुओं को एकजुट करते हैं या बिखराते हैं? सिर्फ साढ़े पांच साल के राज में आदिवासी और दलितों का इतना ऐसे बिदकना कि झारखंड में दो आदिवासी विधायक ही भाजपा से चुने गए!

सो, बांटो, डराओ और जीतो के दुष्परिणाम अपनी जगह हैं लेकिन और कुछ सूझ भी नहीं सकता। तभी अगले दो-तीन साल नागरिकता संशोधन कानून, नागरिक रजिस्टर, जनगणना, जनसंख्या रजिस्टर की अफरा-तफरी वाले होंगे। विकास, सबका साथ सबका विकास या पाकिस्तान नैरेटिव की जगह नागरिकता में राजनीति पकेगी। रघुवर दास ने मोदी-शाह में भ्रम बनाया था कि उन्होंने गजब विकास किया और विकास पर लोग वोट देंगे। यहां यह बताना जरूरी है कि यूपी में योगी, उत्तराखंड में त्रिवेंद्र, हिमाचल में जयराम ठाकुर या गुजरात में विजय रूपानी के मुकाबले में रघुवर दास ने विकास की कार्ययोजनाओं पर अधिक सख्ती से काम कराया। इन मुख्यमंत्रियों का नौकरशाही पर उतना डर नहीं है, जबकि रघुवर दास का था लेकिन उनका भी हस्र मकड़जाल वाला। ऐसे में मोदी-शाह विकास जैसी बातों पर अपनी वाहवाही नहीं सोच सकते। देश की आर्थिकी जिस दशा में पहुंच गई है उसमें मोदी-शाह के लिए विकास की बात करना भी संभव नहीं रहेगा। तभी नागरिकता कानून, भारत धर्मशाला नहीं और घुसपैठियों को निकाल बाहर करना, उनके डिटेंशन सेंटर, मुस्लिम विरोध-प्रदर्शन, हिंसा-आगजनी, लाठी, हजारों एफआईआर, संपत्ति जब्त आदि का वह भंवर बनना है, जिससे 2024 तक फिर एक सुनामी निकल पड़े।

5 thoughts on “बवाल, राजनीति और प्रतिलिपि रघुवर

  1. हरिशंकर जी व्यास

    आपका आलेख अच्छा है और इसका सत्य तत्व भी सही है कि महात्मा गांधी, जवाहर, गहलोत से लेकर मनमोहन सिंह तक पाक बांग्ला गैर मुस्लिम याकि प्रताड़ित और स्वैच्छिक (महात्मा गांधी के अनुसार) लोगों को भारत मे बसाने के पक्षधर रहे हैं अन्तर तो यही है कि मोदी शाह इन्हें बसा कर अपना हिन्दू वोट पक्ष भी साध लेंगे जो विपक्ष मुस्लिम वोट पक्ष की नाराजगी के भय से कभी कर न पाया। ये आप खुलकर ना लिख पाये पर साथ ही अन्तस् में छुपी अपनी चाटूकारिता प्रवृत्ति से भी आप अछूते ना रहे गोया कि अमेरिका के व्हाईट हाउस पर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर ट्रम्प ने लाठियां नहीं भांजी, कहर नहीं बरपाया। आप क्या कहना चाह रहे हैं कि जामिया मिलिया के उग्र हिंसक आगजनी जैसे प्रदर्शन व्हाइट हाउस के समक्ष हुए हैं?? ऐसा लिखकर आपने एकबार फिर अपनी चाटूकारिता को साबित कर दिया है।

    कैलाश माहेश्वरी, भीलवाड़ा-राजस्थान
    मोबाइल 9414114108

  2. हरिशंकर जी व्यास

    आपका आलेख अच्छा है पर आप एक बात भूल रहे या जानबूझकर नहीं कह रहे हैं कि कांग्रेस ने गठबंधन किया है और बीजेपी ने अपने एलायंस के बिना अलग अलग ही चुनाव लड़ा है। यही उसकी सबसे बड़ी गलती रही है। कांग्रेस के एलायंस वोट प्रतिशत से बीजेपी एलायंस वोट प्रतिशत लगभग15 प्रतिशत ज्यादा है। पर आपको चाटूकारिता के मनोमस्तिष्क कोने में ये लिखना गवारा थोड़े होगा।

    कैलाश माहेश्वरी, भीलवाड़ा-राजस्थान
    मोबाइल 9414114108

  3. व्यास जी,

    NRC इत्यादि के संदर्भ में मोदी और शाह में क्या खिचड़ी पक रही है? अगर अमित शाह की चालें इलेक्शन में फैल हों तो क्या मोदी-शाह का रिश्ता टूट सकता है?

  4. मोदी और शाह राजनीति के ऐसे चतुर सुजान और घाघ खिलाडी है कि इनकी राजनीति समझना यहाँ तक कुशाग्र बुद्धि के बहुत से लिए लोगों के बस मे नही है। क्या विभाजन के बाद आये हिंदुओं को भारत सरकार और काँग्रेस ने नागरिकता नही दी ,उनमे से दो सरदार मनमोहन सिंह. और इंद्र कुमार गुजराल तो भारत के प्रधानमंत्री नहीं बने। पाकिस्तान से आये विषेश कर पंजाबी सिंधी बंगाली रिफ्यूजी क्या आज भारत के नागरिक नही है। और तो और नेहरू ने शरणार्थियों के लिये पुनर्वास मंत्रालय का गठन किये और देश के काफी शहरों मे इनके लिए कालोनियां बना कर दी ,बरसो बाद नगण्य कीमत पर मालिकाना हक दिया। और व्यवसाय के लिए अनुदान दियाफिर यह बात और है कि इनमें से कुछ व्यावसायिक चातुर्य से यहाँ के लोगों से भी सम्पन्न बन गये। जबकि मोदी सरकार ने इनके लिये जमीन ,व्यावसाय नौकरी खेती के लिए कोई बजट नहीं बनाया है।इनको क्या झुग्गी झोपड़ी वाले बनाओगे। जबकि जिन देशों से यह आये कीमत और जमीन वसूलनी चाहिए।नागरिकता बिल की जरूरत क्या थी।अदनान सामी को मुसलमान होते हुऐ भी भारत की नागरिकता नही मिली।तस्लीमा नसरीन को क्या भारत मे रहने परमिट नही मिला। वास्तव मे देश के मुसलमानों विशेष कर और गरीब अनपढों को जो देश का बडा हिस्सा है,को यह उचित सशंय है कि नागरिकता का उनसे प्रमाण माँगा जायेगा,और न होने पर नागरिकता छीन ली जायेगी।यह डर देश के गरीबों को भी काफी ज्यादा है।क्योंकि उनके पास न मकान के कागजात ,ड्राविंग लाइसेंस., पासपोर्ट या पढाई के सर्टिफिकेट होते है।आसाम मे 1971 के बाप दादा से संबंधित कागजात माँगै गये.,NRC मे नाम होने के लिए। इस लिये वह आंदोलित है।रही बात सरकार की न तो वह जनता और न ही विपक्ष से सलाह करती है।जितना ही आंदोलन होगा और अगर दंगे हुऐ तो और अच्छा। हिंदू मुसलमान का विभाजन गहरा होगा, वोटों की फसल अच्छी और पकेगी।
    काँग्रेस का वर्तमान केंद्रीय शीर्ष नेतृत्व राजनीतिक रूप से अनपढ़ अपरिपक्व है,विशेष कर गाँधी परिवार ।विरोध का फिर भी उचित आधार बनता है। श्री लंका मे जब LTTE को समाप्त किया गया था ,तो लगभग सारे नौजवानो को खत्म किया गया था, उससे पहले तमिलों का शोषण और उत्पीड़न जारी था ,बाद मे यह राजनीतिक आंदोलन फिर आतकंवादी आदोलनों बना। तमिल हिंदू इसमें शामिल क्यों नही,बर्मा ने वहाँ बसे हिंदुओं जिसमें मारवाड़ी और पंजाबी तथा रोहिंग्या के हिंदू है मे इसको क्यों नहीं शामिल किया। तीसरी बात चीन के बौद्ध हिंदू जिनको तिब्बत को मिलाने के बाद उत्पीड़ित करके खदेड़ कर भेज दिया गया था ,क्योंकि नहीं शामिल किया गया। दूसरी बात जहाँ से यह आये है उनसे जमीन और पैसा माँगना चाहिए जिसमें यह लोग घर बनाना खेती व्यवसाय कर सके। लेकिन यह इसलिए नहीं किया गया कि इससे हिन्दू मुसलमान विभाजन और दंगे नहीं होते। इनके लिये बजट कोई प्रावधान नही किया गया है ,क्या भारत को झुग्गी झोपड़ी का देश बनाना है। चीन के आगे भारतीय नेता ऐसे दब्बू बनकर खुशामदी बने रहते है। आखिरी बात जिन संघी हिंदुओं को आज सरकारी सेवाओं मे जो कि कुल नौकरियों का दो तीन प्रतिशत नही है आरक्षण स्वीकार्य नही है।आज इन हिंदुओं के समर्थक होना अचरज भरा है।नार्थ ईस्ट मे इन विदेशियों को चाहे हिंदू हो या मुसलमान को कोई बसाने को तैय्यार नहीं है ,क्योंकि उनके संसाधन अवसर और डेमो ग्राफी बदल जाती है।
    बाँगला देश मे 15 लाख हिन्दू है और आसाम मे NRC मे निकले 6 लाख मुस्लिम।अगर हमने 6 लाख मुसलमान भेजे ,तो वह 15 लाख हिंदू भेज देगा।

  5. व्यास जी आप भी डरते हे ३०/१२/२०१९ को इंडिया गेट से लेख को पहले या अंतिम पेज पर नहीं छापा दुसरे पेज पर छापा इसमें आप के डर की झलक लगती हे इसमें आप कितने तर्क दे सकते हे पर यह सत्य हे आप डरते हे

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