कालिख और भाजपा का हिंदू विकल्प

पता नहीं नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने संविधान दिवस की सुबह कालिख पुती महसूस की या नहीं!क्या खूब पटाक्षेप हुआ दिल्ली-मुंबई के संवैधानिक पदों पर बैठे चेहरों द्वारा संविधान को धत्ता बताने और फड़नवीस-अजित पवार की पॉवर हाईजेकिंग का! इस मामले में भारत राष्ट्र-राज्य के मौजूदा वक्त के कई सबक और तथ्य छुपे है। डरो नहीं लड़ो तो गुलामी के बीच भी पब्लिक मूड बेखौफ बन सकता है! फिर मोदी-शाह की राजनीति के गंदी होने की धारणा इस तेजी से फैल रही है कि शिवसेना की अनैतिकता, कांग्रेस का विचारधारा छोड़ना भी लोगों में इसलिए मान्य है क्योंकि भाजपा पर चेक लगे, उसे झटका लगे यह चाह उस वर्ग में भी है, जो मोदी-शाह की तूताड़ी लिए हुए है। याद करें पिछले दो-तीन दिनों में भोंपू मीडिया ने अजित पवार का कैसे प्रचार किया? मंगलवार को फड़नवीस की प्रेस कांफ्रेस में मुंबई के पत्रकारों ने चौतरफा अंदाज में जैसे सवाल किए उन्हें सुन सोचना पड़ा किऐसे हिम्मत कैसे खुली। बेबाकी से फड़नवीस से पूछा गया कि जिस अजित पवार के लिए आप लगातार कहते रहे कि वह तो जेल में चक्की पीसेगा, चक्की पीसेगा, उसका समर्थन आपने लिया कैसे?

इससे भी बड़ा सबक विपक्ष के नेताओं, शरद पवार, सोनिया गांधी, अखिलेश यादव, मायावती, हेमंत सोरेन, अरविंद केजरीवाल से ले कर नीतीश कुमार, नवीन पटनायक, देवगौड़ा आदि उन सब नेताओं के लिए है जो हार कर या सत्ता गंवा कर या सरेंडर हो कर यह सोच बना बैठे हैं कि मोदी-शाह से जीता नहीं जा सकता है। कोई माने या न माने अपना मानना है कि उद्धव ठाकरे और उनके शिव सैनिकों ने मोदी-शाह की परवाह नहीं करने, उनसे लड़ने की, बेबाकी से जवाब देने की, सत्ता के अपने हक के लिए जो पंगा लिया वह बाकी सब विरोधी नेताओं के लिए मिसाल है कि खौफ से बाहर हो लड़ते हुए बाजी जीती जा सकती है। याद करें शरद पवार को चुनाव के वक्त ईडी से डराया गया था। उन्होंने उलटे जिद्द पाली कि डटकर चुनाव लड़ाना है तो न केवल दलबदलुओं को हरवाया, बल्कि भतीजे अजित पवार के विश्वासघात के बावजूद डटे रहे।

सबसे बड़ा सबक है कि भाजपा की राजनीति जब भ्रष्ट है, पैसे-सत्ता के लालच से विधायकों की खरीद-फरोख्त की मंडी सजाने वाली है, पैसा फूंक कर वोट खरीदने की है, विचारधारा की जगह ईडी-सीबीआई-एजेंसियों के जरिए राजनीति की है तो विरोधी पार्टियां क्यों न मिलकर लोहे को लोहे के अंदाज में काटें! आजाद भारत के 72 साल के इतिहास की हकीकत है कि पिछले पांच वर्षों में मोदी-शाह की भाजपा ने जितना दलबदल करवाया, सत्ता पाने, खरीदने के लिए जितनी तरह के झूठ, पाप किए हैं उसकी दास्तां लिखने बैठें तो दलबदल के शिखर भ्रष्ट नेता भजनलाल की गाथा फीकी बनेगी और इंदिरा गांधी का राज्यपालों का दुरूपयोग, संविधान की व्यवस्थाओं का दुरूपयोग मामूली लगेगा वहीं देवीलाल या समाजवादियों की पार्टियों की तोड़फोड़, विचारधारा का पाखंड आज के अनुभव के आगे मामूली लगेगा।

और यह उस भाजपा से है, जिसके कभी एक नेता अटलबिहारी वाजपेयी हुआ करते थे और जो कहते थे कि ऐसी गंदी राजनीति (दलबदल आदि) से मिली सत्ता को मैं चिमटे से भी छूना नहीं चाहूंगा। तभी अपने को कई बार यह सोच हैरानी होती है कि ऐसे वाजपेयी के साथी रहे लालकृष्ण आडवाणी, डॉ मुरली मनोहर जोशी को ऐसा क्या लकवा मारा जो ऐसी गंदगी देख करभी जुबान से उफ तक की हिम्मत नहीं! पर सत्ता के आगे गुलामी खांटी हिंदुओं का इतिहासजन्य डीएनए है इसलिए आडवाणी-जोशी का मुंबई में राज्यपाल के व्यवहार, आधी रात में केंद्र सरकार, राष्ट्रपति के व्यवहार पर मौन धारणा अस्वभाविक भी नहीं है।

बहरहाल, महाराष्ट्र में विपक्ष की सरकार शरद पवार और सोनिया गांधी के लिए रास्ता है। दोनों के लिए हिंदू मतदाताओं में भरोसा बनाने का मौका है! यदि शिवसेना के साथ शरद पवार और सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र में अगले पांच साल हिंदू हितकारी राज का औसत अनुभव कराया तो कांग्रेस पर हिंदुओं का भरोसा बनेगा और हिंदू मतदाताओं में विपक्षी एकताबतौर विकल्प साख पा सकती है। मैं महाराष्ट्र के नतीजों के तुरंत बाद से लिख रहा हूं कि एनसीपी-कांग्रेस को शिवसेना की ओर लपकना चाहिए। परस्पर अछूतपना छोड़ कर साझा सरकार बनाएं ताकि हिंदू समझ पाएं कि हिंदू राजनीति का ठेका अकेले मोदी-शाह और भाजपा का नहीं है। अपने को पूरा खटका था कि मोदी-शाह ऐसा नहीं होने देंगे। वे कांग्रेस-एनसीपी की मदद से शिवसेना की सरकार नहीं बनने देंगे। मोदी-शाह किसी भी हद तक जा कर फड़नवीस सरकार बनवाएंगे! पर यह कल्पना अपने को भी नहीं थी कि इसके लिए अजित पवार जैसे दागी को भाजपा पकड़ेगी! तभी अजित पवार के फर्जीवाड़े ने शिवसेना और कांग्रेस में मेल की बदनामी को बहुत कुछ धो डाला है। उद्धव ठाकरे, शरद पवार और सोनिया गांधी तीनों का साथ होना अब स्वीकार्य हो गया है। अजित पवार-फड़नवीस के किस्सा कुर्सी से कांग्रेस और शिवसेना का बेमेलपना ढक गया है। साथ ही पूरे देश में शरद पवार की एक ऐसी इमेज बनी है, जिसके चलते वे मोदी-शाह विरोधी राजनीति को एकजुट बनाने की धुरी भी बन सकते हैं। दिल्ली, झारखंड, यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल जैसे प्रदेशों में उनकाविपक्षी एकजुटता बनवाने वाला रोल बन सकता है।

मतलब महाराष्ट्र में यदि उद्धव ठाकरे की सरकार कायदे से चली, एनसीपी-कांग्रेस ने उसे चलाए रखने के लिए यदि संजीदगी से काम किया, उसे बाकी राज्यों के लिए विपक्षी एकता का रोल मॉडल बनाया तो 2024 में लोकसभा चुनाव आते-आते विपक्ष में एकता का वह आधार बनेगा, जिस पर औसत हिंदू सकारात्मकता से विकल्प का विचार बनाने लगे।

और जान लें इस संभावना को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व अमित शाह कतई साकार नहीं होने देंगे। वे किसी सूरत में न उद्धव ठाकरे को बतौर मुख्यमंत्री सफल होने देंगे और न शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के विधायकों को एकजुट रहने देंगे। तीनों पार्टियों में झगड़ा कराने की दस तरह की कोशिश होगी। मुंबई में अशांति, हिंदू बनाम मुस्लिम, हिंदू मुद्दे पर ठाकरे को घेरने से ले कर कर्नाटक जैसी खरीद-फरोख्त की मंडी, शरद पवार,प्रफुल्ल पटेल आदि को ईडी-सीबीआई से जेल में डालने जैसे तमाम वे उपाय तब तक आजमाए जाते रहेंगे जब तक कि सरकार गिर न जाए!

मतलब शर्त लगाई जा सकती है कि उद्धव ठाकरे की सरकार साल चलेगी या दो साल! सन् 2024 के लोकसभा चुनाव के वक्त तक उद्धव ठाकरे की सरकार चल जाए, यह नरेंद्र मोदी-अमित शाह कतई बरदाश्त नहीं कर सकते। ऐसा होना तो फिर लोकसभा चुनाव में खतरा मोल लेना है!

सवाल है क्या इस सिनेरियो को सोनिया गांधी, अहमद पटेल, कांग्रेस कार्यकारिणी के वे नेता समझे हुए होंगे, जिन्होंने शिवसेना से रिश्तों की बात पर पार्टी के भीतर बहस कराई कि तब केरल के वायनाड में राहुल गांधी के मुसलमान वोट क्या बिदेकेंगे नहीं?

एक हद तक शरद पवार पर ही दारोमदार है कि वे प्रशासन में अनुभवहीन उद्धव ठाकरे को सलाह देते हुए सफल बनवाएं तो कांग्रेस में भी समझदारी बनवाएं। कांग्रेस और विपक्ष का कोर संकट है जो हिंदू मतदाताओं में नरेंद्र मोदी का मायावी जादू है। उससे लोग बाहर तभी आ सकते है जब हिंदुओं में यह भरोसा बने कि कांग्रेस, सपा, बसपा, आप आदि मुसलमानों की पार्टी नहीं हैं, बल्कि वह हिंदू भोजनालय है, जहां हिंदुओं के लिए खाना-पानी ज्यादा साफ-सथुरा-अच्छा है बनिस्पत भाजपा के भोजनालय के। यहीं शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस को आगे महाराष्ट्र में प्रमाणित करना है। सो, क्यों न उद्धव ठाकरे और उनके मंत्रिमंडल साथी शपथ के बाद अयोध्या जा कर दर्शन से सरकार की शुरुआत करते!उनके साथ शरद पवार और अहमद पटेल भी जाएं तो क्या हर्ज!

One thought on “कालिख और भाजपा का हिंदू विकल्प

  1. …सो, क्यों न उद्धव ठाकरे और उनके मंत्रिमंडल साथी शपथ के बाद अयोध्या जा कर दर्शन से सरकार की शुरुआत करते!उनके साथ शरद पवार और अहमद पटेल भी जाएं तो क्या हर्ज!
    🤔🤔🤔सर, अगर ये चमत्कार हो गया तो सही मायने में भारतीय राजनीति का नवजागरण होगा। परन्तु मुझे इतनी उदारता की उम्मीद नहीं है। 🙏🙏🙏

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares