भारत की कोरोना सच्चाई छुपी हुई!

डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने कल फोन कर कहा- मुझे लगता है 31 मार्च तक हम कोरोना संकट से पार हो जाएंगे! मैंने सुन जवाब दिया, वाह! आपके मुंह में घी शक्कर! फिर उन्होंने कहा नरेंद्र मोदी आज अपने भाषण में चमत्कारी बात कहेंगे। मैं उनके भाषण के बाद ही लिखूंगा। फिर कयास में उन्होंने मेरी जानकारी बढ़ाई भारत से कुनैन की गोली का निर्यात बढ़ गया है। भारत चमत्कार करेगा। ध्यान रहे दो दिन पहले वैदिकजी ने नया इंडिया के अपने कॉलम में यह चमत्कारी हेडिंग दी थी- भारत जीतेगा कोरोना युद्ध! कल उनका लिखा था ‘कोरोना से डरो मत’। सोमवार के कॉलम में वैदिकजी की ये लाइनें थीं- मुझे खुशी है कि हमारे सभी प्रमुख टीवी चैनल कोरोना-युद्ध लड़ने के लिए हमारे परमप्रिय बाबा रामदेवजी को योद्धा बनाए हुए हैं। आसन और प्राणायाम के साथ-साथ वायुशोधक औषधियों से हवन करने की प्रेरणा मोदी और रामदेव जनता को क्यों नहीं दे रहे हैं? अ-हिंदू लोग चाहें तो हवन में वेद मंत्रपाठ करने की बजाय कुरान की आयतें, बाइबिल के पद, त्रिपिटक के सूत्र, जैन-आगम आदि का पाठ कर सकते हैं। विषाणु-निरोधक आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपैथिक दवाइयां लेने में भी कोई हानि नहीं है। इस कोरोना-युद्ध में भारत की विजय सुनिश्चित है।

इन आशावादी लाइनों पर मैंने संपादन के वक्त भी सोचा था तो कल उनके फोन के बाद भी सोचा। लगा कि पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण जब सुनेगा तो लोग कोरोना वायरस के खत्म होने का विश्वास वैसे ही लिए हुए होंगे जैसे नोटबंदी भाषण के साथ काला धन खत्म होने का बना था। जब लोग थाली, ताली, घंटे बजा चुके हैं तो महामारी खत्म होने का आशीर्वाद भी लेंगे! कितनी बैचेनी से मोदी के भाषण का इंतजार हो रहा है! वैदिकजी ने भी इंतजार कर कॉलम लिखा।

उफ! दुनिया कैसे वायरस को ले रही है और हम कैसे ले रहे हैं? कल मैंने बीबीसी पर मिथ और रिएलिटी में एक आइटम गौमूत्र पर देखा। प्रोग्रामर ने इसका खुलासा इस जुमले से किया कि हिंदू संगठन यह फैला रहे हैं कि कोरोना का इलाज गौमूत्र है जबकि यह रियलिटी नहीं है।

तभी कोरोना ने सवाल बनाया है कि हम भारतीयों, खास कर हिंदुओं के डीएनए का वह कौन सा रसायन है, जिससे वह उन मुगालतों, कल्पनाओं में रहता है जो शेष दुनिया के लिए अकल्पनीय होती हैं? दुनिया कैसे सोचती है और हम कैसे सोचते हैं? मैं इन दिनों रोजाना डोनाल्ड ट्रंप, बोरिस जॉनसन, मैक्रों, मर्केल, न्यूयार्क के गर्वनर कुओमो, विश्व स्वास्थ्य संगठन महासचिव डॉक्टर ऐडरेनॉम की घोषणाएं, प्रेस कांफ्रेस सुनता हूं और तुलना करता हूं कि ये नेता कैसे बोलते हैं, कैसा प्रबंधन कर रहे हैं और अपने नेता, प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री क्या बोल रहे हैं? दिन-रात का इतना कैसे फर्क है संकट को समझने का और संकट प्रबंधन का!

वैदिकजी ने पूछा- आप क्यों नहीं लिख रहे तो मेरा जवाब था देश को आपके आशावाद की जरूरत है न कि मेरी रूदाली की। मैं पहले ही कोरोना की हकीकत पर पहले ही मैं चेता चूका हूं (भीड़ कैसे घरों में बंद हो?-17 मार्च,वायरस हुआ वैश्विक व लापरवाह भारत-28 फरवरी) तो और कितना रोया जाए मौजूदा भारत पर! जब चौबीसों घंटे भारत में बात, बहस, नैरेटिव, टीवी चैनल, अखबार सभी झूठ में जीने के आदी हो गए हैं तो आईना दिखाने से क्या होगा? पर वैदिकजी मेरी बात नोट करके रखें कि यदि दुनिया ने वैक्सीन जल्दी बना कर भारत को नहीं दी तो पूरा देश रूदाली में बदला हुआ होगा। भारत इतनी लापरवाही कर चुका है कि दुनिया के तमाम देशों के आंकड़ों के कुल आंकड़ों से अधिक आंकड़ा लिए हुए बने तो रोना नहीं। भारत अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मार चुका है। हां, अपना मानना है कि देश भले लॉकडाउन में चला गया हो लेकिन वायरस के आगे भारत का आत्मघाती रुख जस का तस है और मुगालतों में जल्द जीत की हवाबाजी में सांसें ले रहा है। आज का ही मामला है। अपने मीडिया ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के इस वाक्य को खूब चलाया कि भारत पोलियो की तरह कोरोना पर विजय प्राप्त कर लेगा। पर विश्व स्वास्थ्य संगठन जिस असली बात का रट्टा लगाए हुए है उसका भारत में कोई ख्याल नहीं है। संगठन हर दिन दोहरा रहा है न कि- सभी देशों के लिए हमारा सिर्फ एक मैसेज है और वह है टेस्ट, टेस्ट, और टेस्ट। सभी देशों को सभी संदिग्ध मामलों के टेस्ट करने में समर्थ होना चाहिए, आंखों पर पट्टी बांध कर इस महामारी से लड़ा नहीं जा सकता है।

डब्लुएचओ के मुताबिक और दक्षिण कोरिया, सिंगापुर जैसे बीमारी पर काबू पाने वाले देशों के अनुभव में टेस्ट महामारी से लड़ने का नंबर एक औजार है। इस बात को मैंने 20 मार्च को ‘कोरोनाः मेडिकल अध्यादेश ला सेना के सुपुर्द करो!’ शीर्षक कॉलम में लिखते हुए कहा था –कोरोना वायरस से रामभरोसे लड़ा जा रहा है।…विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख बार-बार जो टेस्ट व ट्रेस करने की हिदायत दे रहे हैं उसके प्रति भारत या तो लापरवाह है या नगण्य टेस्टिंग है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख को आज भी मैंने यह बोलते हुए सुना है कि यह न सोचो कि महामारी नहीं आएगी। वह आएगी इसलिए टेस्ट और ट्रेसिंग पहली बेसिक जरूरत है जिस पर सघनता से फोकस हो।

जबकि 23 मार्च 2020 याकि परसों साढ़े आठ बजे तक की हकीकत का आकंड़ा है कि कुल 20,707 सैंपल में 19,817 व्यक्तियों का टेस्ट हुए। एक सौ तीस करोड़ लोगों की आबादी में सिर्फ बीस हजार टेस्ट! ध्यान रहे भारत में कोरोना वायरस का पहला मामला केरल में 30 जनवरी को मिला था। उस बीमार का वुहान यात्रा का रिकार्ड था। तब से अब तक भारत के लगभग सभी प्रदेशों में कोरोना पॉजिटिव केस हैं लेकिन 53 दिनों में कुल बीस हजार लोगों का टेस्ट। मतलब औसत 377 टेस्ट प्रतिदिन! यह आंकड़ा भी हाल में टेस्टिंग बढ़ने से है जबकि आईसीएमआर ने कहा हुआ है कि भारत में प्रतिदिन दस हजार टेस्ट हो सकते हैं। उस नाते मार्च के 24 दिनों में भी यदि पांच हजार प्रतिदिन के हिसाब से टेस्ट होते तब सवा लाख टेस्ट संभव थे।

भारत की रियलिटी टेस्ट नहीं होना है जबकि यह सब जान चुके हैं कि भारत में कोरोना वायरस सभी प्रदेशों में पहुंच चुका है। वह कितने लोगों के बीच है इसका असली अनुमान इसलिए नहीं है क्योंकि इतने टेस्ट ही नहीं हैं, जिससे मालूम हो कि असली संख्या क्या संभव है?

यह स्थिति लॉकडाउन याकि तालाबंदी के बाद भी है। वुहान, दक्षिण कोरिया, ताईवान, सिंगापुर, इटली, स्पेन आदि तमाम प्रारंभिक देशों में इलाके विशेष के लॉकडाउन के बाद वहां इलाकों में तेजी से सघन टेस्टिंग शुरू हुई थी। तभी एकदम संक्रमित मरीजों की संख्या मालूम कर वस्तुस्थिति अनुसार वायरस पर काबू पाने, उसे खत्म करने के टारगेट में काम हो सका। मतलब लॉकडाउन से पहले और तुरंत बाद सीधा फोकस टेस्ट और आइसोलेशन का था। सो, भारत की अभी की दशा कोरोना वायरस के छुपे होने की है। हां, कोरोना का अभी तक अनुभव यह है कि या तो आप छुपाए रख सकते हैं, उसे दबाने का अभियान चला सकते हैं या खत्म करने का महाअभियान चलाए। फिलहाल भारत में कोरोना छुपा हुआ है और यह तब तक छुपा रहेगा जब तक प्रति दस लाख आबादी के पीछे तीन-हजार टेस्ट न हों। भारत में यह काम कितने महीनों में संभव हो सकेगा? कितने महीने लॉकडाउन में रहेंगे छह महीने या एक साल? पर मेरे लिखे पर भरोसा मत कीजिए। मै खुद वैदिकजी के इस भरोसे में जीना चाहता हूं कि मोदीजी21 दिन में चमत्कार कर देंगे, संकट को खत्म कर डालेंगे।

(कोरोना वायरस की वैश्विक-भारत सच्चाई की बेबाक हकीकत में नया इंडिया में फरवरी के पहले सप्ताह से जो छपा है, वह हिंदी के किसी और अखबार में न छपा है और न छपा मिलेगा। अखबार के तमाम स्तंभकारों के लिखे कॉलम, संपादकीय, लेख, बीबीसी-डीडब्ल्यू जैसे वैश्विक मीडिया ठिकानों से साभार प्रकाशित विश्वसनीय रिपोर्ट का सच्चा प्रतिमान है नया इंडिया अखबार। आग्रह है www.nayaindia.com पर जाएं और कोरोना वायरस पर छपे  कॉलम/लेख पढ़ विचारें कि हमने भारत के संदर्भ में भी कितना पहले भयावह खतरे से आगाह किया था- संपादक)

One thought on “भारत की कोरोना सच्चाई छुपी हुई!

  1. आपकी बेहतरीन पत्रकारिता को दिल से सलाम – अब्दुल हमीद जयपुर

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