ट्रंपः अहोभाग्य भारत का!

भारत डोनाल्ड ट्रंप के लिए पलक पांवड़े बिछाए हुए है। बतौर मेजबान नहीं, बल्कि याचक के रूप में! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए नगाड़े बजवा रहे हैं। उनके लिए भीड़ इकट्ठी करवा रहे हैं। गुजरातियों में हल्ला बनवा दे रहे हैं कि हुकुम पधार गए। यों भी गुजरात में अमेरिका अल्टीमेट है, वहां का वीजा स्वर्ग का रास्ता है तो भला गुजरात में ‘करोड़ों लोग’ (बकौल ट्रंप) क्यों नहीं अमेरिकी राष्ट्रपति का जयकारा लगाएंगे? वैसे भी हम हिंदुओं का महाशक्ति का जयकारा लगाना 72 साला विदेश नीति का सत्व-तत्व है। दुनिया की कोई भी महाशक्ति हो, चीन, सोवियत संघ, अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन से लेकर कुबेरी संपदा लिए जर्मनी, जापान, सऊदी अरब सभी के आगे तो भारत की विदेश नीति लेटती, गिड़गिड़ाती, भाई-भाई का नारा लगाती रही है। सबसे बड़ा उदाहरण चीन है। चीन के माओत्से तुंग भी भारत के दुश्मन थे और मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनफिंग भी भारत के दुश्मन हैं। अभी-अभी कोरोना वायरस की आपदा के बीच भी अमित शाह अरुणाचल प्रदेश गए तो चीन ने बयान दे कर भारत को आंखें दिखाई। माओ-चाऊ एन लाई ने भारत की हजारों किलोमीटर भूमि कब्जा कर भारत के मुकुट का अंग भंग किया तो देंग और जिनपिंग के नए चीन ने भारत की आर्थिकी को खा डाला, डोकलाम खा डाला बावजूद इसके भारत के प्रधानमंत्री मोदी को जब भी मौका मिलता है तो शी जिनफिंग से लिपटने दौड़े चले जाते हैं!

क्यों? ताकि वे पटें और पाकिस्तान से दूर हों। पंडित नेहरू ने ‘भारत-चीन भाई-भाई’ के नारे लगवाए थे और प्रधानमंत्री मोदी ने पांच साल से भारत के सवा सौ करोड़ लोगों को दिखलाया हुआ है कि शी जिनफिंग तो उनके यार हैं। वैसे ही जैसे बराक ओबामा थे, डोनाल्ड ट्रंप हैं। पुतिन हैं और सऊदी शेख हैं, बोरिस जॉनसन हैं, प्रधानमंत्री आबे हैं और चासंलर मर्केल हैं।

और भोले भारतीय सोचते हैं कि कभी नेहरू विश्व नेता थे अब मोदी विश्व नेता हैं। सचमुच पंडित नेहरू से ले कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सफर हम हिंदुओं के इस मनोविज्ञान का प्रमाण है कि हम लोग खामोख्याली में जीते हैं। विदेशी खासकर गोरे लोगों, देशों, कौमों के साथ रूमानी मुहब्बत पाले रहते हैं। संभव है ऐसा हिंदुओं के सनातनी धर्म, कर्म की उस वर्जना से हो, जिसमें समुद्र पार जाने, विदेश जाने में मनाही रही है। या विदेशियों की गुलामी के कारण उनका मान सहज स्वभाव हो। ध्यान रहे सौ-डेढ़ सौ साल पहले विदेश यात्रा पाप हुआ करती थी। ब्रितानी मालिक हुए तो हिंदू घरों से पढ़ाई के लिए ब्रिटेन जाना इसलिए धर्म विरूद्ध समझा जाता था क्योंकि समुद्र यात्रा पर निषेध था। शायद यहीं वजह हो कि दो-ढाई हजार साल के जाग्रत इतिहास में खैबर पार से अलेक्जेंडर से ले कर मुस्लिम हमलावर, जितने आए तो हम या तो बेखबर पाए गए और गुलाम हुए या यूनानी औरतों, मध्य एशिया की नस्लों से रूमानी मोहब्बत में रहे, उनकी कहानियों- उनकी भारत यात्रा के वृतांत में अपना इतिहास लिखाते रहे या उनके मनसबदार रहे। वह तो भला हो बुद्धम शरणम् गच्छामि के अनुयायियों का जो उन्होंने अपने नए धर्म के प्रसार में पूर्व, दक्षिण-पूर्व एशिया के समुद्री रास्ते बनाए।

मैं भटक गया हूं। पते की बात है कि हम हिंदुओं के मनोविज्ञान में विदेशी और खासकर गोरे विदेशियों से एकतरफा रूमानी मुहब्बत, रोमांस याकि किसी गोरे के कंधे पर हाथ रखने देने से भाव विभोर हो कर दुनिया जीत लेने के ख्यालों में खोना सहज स्वभाव है। मुझे याद है बचपन में देखी अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की पत्नी जैकलीन कैनेडी (तब था ‘अमेरिकी रानी’ का हल्ला और अब मेलानिया ट्रंप) की भारत यात्रा में पंडित नेहरू के साथ उनकी फोटो। जैकलीन होली का गुलाल नेहरू पर लगाते हुए। तब भी नेहरू सरकार, नेहरू-इंदिरा ने जैकलीन, उनकी बहन का स्वागत पलक पांवड़ों के साथ भारत के लोगों को 1962 में इस अंदाज में मूर्ख बनाते हुए किया कि चीन से पंगा है तो क्या अमेरिका और कैनेडी भारत पर फिदा हैं!

मगर हकीकत है कि तब भी नेहरू अमेरिका से, कैनेडी प्रशासन से भारत हित साधने में वैसे ही नाकाम थे जैसे नरेंद्र मोदी आज ट्रंप प्रशासन से व्यापार संधि, पाकिस्तान को दबवाने या अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना को तैनात रखवाने में नाकाम हैं या एच-1 बी वीजा, भारत का अमेरिका में विशेष व्यापार दर्जा बहाल करवाने में असफल हैं। कोई माने या न माने, वास्तविकता है कि भारत और भारत के लोगों ने डोनाल्ड ट्रंप के तीन सालों में जितना गंवाया है वैसा क्लिंटन प्रशासन के बाद कभी नहीं हुआ। क्लिंटन प्रशासन से ओबामा प्रशासन के बीच पीवी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सरकार ने भारत-अमेरिकी रिश्तों में जो उपलब्धियां पाईं वह ट्रंप-मोदी की तीन वर्षों की कूटनीति में पूरी तरह एकतरफा याकि अमेरिकी हितगामी है। इन तीन वर्षों में अमेरिका में पढ़ाई-काम-धंधा कर रहे अस्थायी वीजाधारी, भारतीय आईटी कंपनियां जितनी परेशानी में रही हैं उसका कोई हिसाब नहीं है। भारत ने दोपक्षीय व्यापार में अमेरिकी रियायतों को गंवाया। यहीं नहीं बार-बार ट्रंप ने भारत की व्यापार शर्तों की आलोचना की। भारतवंशियों के अमेरिका में बसने, उनके वीजा में बाधाएं डालीं और ट्रंप ने खरबों डॉलर के हथियारों के भारत से ऑर्डर लिए या लेने वाले हैं लेकिन वे भारत से आयात बढ़ाने को तैयार नहीं। अब सर्वाधिक घातक भू राजनीतिक फैसला वे अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना को हटाने और तालिबानियों की तख्तपोशी का रास्ता बनवाने का ले रहे हैं।

सोचें, सब कुछ भारत प्रतिकूल फिर भी डोनाल्ड ट्रंप पर फूल बरस रहे हैं तो वजह भारत की मजबूरी है तो साथ में प्रधानमंत्री मोदी का नगाड़ा प्रेम भी है। अपनी फितरत में जीने के बावजूद नेहरू 1962 में कैनेडी के आगे याचक थे तो आज नरेंद्र मोदी व भारत इसलिए याचक हैं क्योंकि पाकिस्तान से निपटना है। जम्मू-कश्मीर मामले में अमेरिका को पटा कर रखना है। भारत की विदेश नीति ने, विदेश नीति के कर्ता-धर्ताओं ने, भारत के सत्ता कर्णधारों ने स्थिति ऐसी बना रखी है कि आज हर महाबली देश को पटाए रखना जरूरी है। मतलब हम वहीं हैं, जहां 15 अगस्त 1947 के बाद थे। तब भी जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान को ले कर कूटनीति थी और आज भी उसी की चिंता में, वहीं कूटनीति है।

उफ! आजाद भारत की विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय संबंधों का 72 साला सत्व-तत्व। नौ दिन चले अढाई कोस। जहां थे वहीं अभी भी। वक्त बदल गया, चेहरे बदल गए लेकिन भारत जस का तस वहीं। सोचें, 72 सालों में दुनिया में क्या से क्या हुआ? दुनिया में घनघोर शीत युद्ध हुआ और खत्म भी हो गया। दुनिया एक गांव में बदल गई। भूमंडलीकरण हो गया। चीन दुनिया की फैक्टरी हो गया। चीन लाल क्रांति का निर्यात कर तब अपना लाल साम्राज्य बना रहा था और अब वह कुबेर के खजाने के साथ आर्थिक साम्राज्य दुनिया भर में फैला रहा है लेकिन भारत के 130 करोड़ लोगों का देश जम्मू-कश्मीर में अटका हुआ है। पाकिस्तान में अटका हुआ है और यह जयकारा लगाने को मजबूर है कि बोलो- डोनाल्ड  ट्रंप जिंदाबाद! बोलो- शी जिनफिंग जिंदाबाद! बोलो- पुतिन जिंदाबाद!

कह सकते हैं हम हिंदुओं का अहोभाग्य है जो हमें 72 सालों से वैश्विक मूर्तियों की पूजा का, जयकारे का सौभाग्य मिलता रहा। कभी नेहरू जय! कभी मोदी जय! कभी दुनिया के निर्गुट देश नेहरूजी को पूजते हुए तो कभी अमेरिका हाउडी मोदी करते हुए और कभी नमस्ते ट्रंप में झूमते हम!

हां, यह तो खैर स्थायी मूर्तिपूजा प्रवृति है कि बोलो- विश्व नेता कैसा हो… नरेंद्र मोदी जैसा हो! बोलो-विश्व नेता कैसा हो … पंडित नेहरू जैसा हो! (हां, 17 साल इस नारे में भी हम झूमे थे) यहीं भारत का, भारत राष्ट्र-राज्य की विदेश नीति का सत्व-तत्व था, है और रहेगा!

One thought on “ट्रंपः अहोभाग्य भारत का!

  1. अमेरिका की कभी महारानी आई थीं और नागार्जुन ने कहा था कि आओ रानी हम ढोए पालकी।

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