सांड जब हो राष्ट्रपति!

सांड का पर्याय पुरूष प्रतिनिधि मतलब डोनाल्ड ट्रंप! वक्त सचमुच सांडों का है! दुनिया का नंबर एक देश और उसका मालिक सांड! तो क्या होगा? बिना आगा पीछा सोचे महाबली सींग मारेगा। याद करें अफगानिस्तान के तालिबानियों को, इस्लामी स्टेट के बगदादी को! इन सांडों के सींग निकले नहीं कि तालिबानियों ने बामियान में बौद्ध के प्राचीन स्मारकों, प्रतिमाओं में बारूद लगा उन्हें नष्ट किया तो बगदादी ने इराक-सीरिया क्षेत्र के कई सांस्कृतिक-पुरातात्विक ठिकानों को जमींदोज किया! भला बगदादी व तालिबान के मुल्ला उमर का संस्कृति, शिक्षा, बुद्धि, इतिहास से क्या लेना देना तो अमेरिका के सांड का भी क्या लेना देना! तभी डोनाल्ड ट्रंप ने डंके की चोट कहा मैं ईरान के सांस्कृतिक ठिकानों को उड़ा दूंगा! सोचें ऐसा कहना! क्या मुल्ला उमर, बगदादी और ट्रंप में कोई फर्क बनता है? सचमुच डोनाल्ड ट्रंप ने यह सवाल, यह आंशका बनवाई है कि सभ्यतागत लड़ाई कहीं सांडो की कमान में तो नहीं होगी? बगदादी, मुल्ला उमर, खुमैनी या सुलेमानी या सऊदी शहंशाह, इमरान खान आदि यदि इस्लामी झंडा लिए तीसरे महायुद्ध की तरफ दुनिया को ले जाएंगें तो क्या पश्चिमी सभ्यता, उसका सिरमौर अमेरिका भी सांड के सींग लिए हुए होगा?

दुनिया डोनाल्ड ट्रंप पर थू, थू कर रही है। ईरान राष्ट्र-राज्य के आला कमांडर कासिम सुलेमानी पर डोनाल्डो ट्रंप ने ड्रोन से निशाना बनवा कर उसकी जैसी हत्या करवाई वह एक स्वतंत्र देश की सार्वभौमता पर सांड के सींग का वार है तो आ बैल मुझे मार वाला न्योता भी है। सोमवार को ईरान में सुलेमानी के अंतिम संस्कार के लिए लोगों की जैसी भीड़ उमड़ी और पूरे देश ने एक आवाज में अमेरिका से बदला लेने का जो ऐलान किया उसके खतरे मामूली नहीं हैं। पहली बार दुनिया को एक वैधानिक राष्ट्र अमेरिका के खिलाफ जिहाद का संकल्प लेता दिख रहा है। वह दो टूक घोषणा कर रहा है कि अब तो हम एटमी हथियार बनाएंगे! इस पर दुनिया में किधर से भी यह बात नहीं है कि ईरान का युद्धोन्माद, अमेरिका से बदला लेने की उसकी गर्जनाएं गलत हैं। मतलब आतंकवाद, गैर-जिम्मेदार व्यवहार या उग्रवाद का आरोप ईरान पर नहीं है, बल्कि डोनाल्ड ट्रंप के चलते अमेरिका की मूर्खता की चर्चा है।

सोचें, एक सांड ने अचानक दुनिया में, खाड़ी क्षेत्र, मध्य एशिया, अरब-इस्लामी देशों में कैसा, क्या उत्पात मचा दिया। हां, बिन लादेन, बगदादी, मुल्ला उमर आदि का जिहादी हुंकारा इस्लाम की सुन्नी, वहाबी धारा में बना हुआ था। उससे शियाओं की दूरी थी। ईरान के अयातुल्लाओं का उग्रवाद क्षेत्रीय राजनीति याकि सुन्नी सऊदी अरब से पंगे, इराक व मध्य एशिया की भू राजनीति में सिमटा हुआ था। अमेरिका से पंगा था लेकिन वह भी खाड़ी-अरब क्षेत्र की भू राजनीति और उसकी क्षेत्रीय महत्वकांक्षाओं, एटमी प्रोग्राम में रोकने, इजराइल के बिंदु पर था। ईरान ने और उसके कमांडर सुलेमानी ने खुफिया-सेना प्रमुख के नाते यमन, लेबनान, इराक आदि जगह शिया आबादी के भाईचारे में हम्मास आदि कई संगठनों पर हाथ रखा हुआ था। मतलब जैसे दक्षिण एशिया में भारत अपने आकार, अपनी आबादी, अपने बाहुबल से अगल-बगल के भू राजनीतिक उद्देश्य लिए हुए है वैसे खाड़ी-अरब क्षेत्र में ईरान की राजनीति है और उसमें सुन्नी प्रतिस्पर्धी सऊदी अरब व उसके गॉडफादर अमेरिका से उसका पंगा पुराना है। बावजूद इसके ऐसा कभी नहीं हुआ कि पूरे इलाके की आम जनता में यह कभी भाव बने कि सुन्नी और शियाओं को कंधा से कंधा मिला कर शैतान अमेरिका से लड़ना है।

अब वह भाव बन गया है। डोनाल्ड ट्रंप ने सुलेमानी की हत्या करवा कर सुन्नी-शिया का साझा टारगेट बनवा दिया है। सुलेमानी की मौत, ईरान में जन सैलाब और बदले के प्रण व उस पर ट्रंप की धमकी ने जो उबाल बनाया है उसका अनुमान लगाया जा सकता है। सऊदी अरब या खाड़ी के शाही परिवारों और सुल्तानों को अलग रखें और आम सुन्नी और शिया मुसलमान के मनोविज्ञान पर सोचें तो अमेरिका से बदला लेने की गूंज का नैरेटिव जहां सुन्नी-शिया भाईचारा बनवाने वाली सुनामी है वहीं ईरान का अमेरिका विरोधी दाएश (इस्लामी स्टेट, आईएसआईएस) में कन्वर्ट होना भी है। अब ईरान को कोई एटमी हथियार बनाने से नहीं रोक सकता।

पर डोनाल्ड ट्रंप रोकेंगे। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि अमेरिका से बदला लेने में रत्ती भर भी ईरान ने कुछ किया तो वे ईरान को भून देंगे। 52 जगह हमले करेंगे, जिनमें उसकी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर भी होगी। मतलब सांड का गरजते हुए सींग और दिखाना! तभी डोनाल्ड ट्रंप की करनी और धमकी ने अमेरिकी संसद, राजनीति और विदेश नीति के तमाम थिंक टैंकों में कंपकंपी पैदा कर दी है। इसलिए कि डोनाल्ड ट्रंप ने सुलेमानी की हत्या से ले कर ईरान की सांस्कृतिक धरोहरों को बरबाद करने की जो चेतावनी दी है वह अंतरराष्ट्रीय कानून अनुसार ‘वार क्राइम’ की श्रेणी वाला व्यवहार है। मतलब ट्रंप का हिटलर, सर्बिया के मिलोसोविक, लीबिया के कज्जाफी जैसा वार अपराधी बनने की तरफ बढ़ना!

पर डोनाल्ड़ ट्रंप क्योंकि सांड है और सांड का बाहुबल अमेरिकी राष्ट्रवाद, गोरों के नस्ली गौरव में जोश बनवाता है तो उन्हें न अंतरराष्ट्रीय कायदे-कानून की चिंता है और न ईरान के बदला लेने का डर है। आखिर ईरान में यह ताकत तो है नहीं जो वह अपने ड्रोन से व्हाइट हाउस पर हमला करे। तभी डोनाल्ड ट्रंप का चेहरा खुशी से चमचमा रहा है। अमेरिका में पिछले दिनों ससंद ने महाभियोग लगा सांड को पूंछ से जैसे बांधना चाहा था, अमेरिका में जो माहौल बना हुआ था वह सुलेमानी पर हमले से हवा हवाई हो गया है। अमेरिकी सांसद हो या विरोधी डेमोक्रेटिक पार्टी सभी तीसरे महायुद्ध की आशंका में राजनीति भूल गए हैं तो अमेरिकी मतदाता अपने सांड की हिम्मत का फिर कायल है। डोनाल्ड ट्रंप तो चाहेंगे कि ईरान बदले की कार्रवाई में कुछ करे तो चुनाव साल में अपने आप इस्लाम के खतरे का नया नैरेटिव, नया हल्ला बन जाए। सुलेमानी पर हमला और ईरान से पंगा ट्रंप की दुबारा चुनाव जीतने की राजनीति में चला गया वह दांव है, जिसके खिलाफ माहौल बना सकना डेमोक्रेटिक पार्टी या प्रतिस्पर्धी राष्ट्रपति के बस में नहीं है।

पर यदि ईरान ने सींग पकड़ सांड को घायल बनाया तब क्या होगा? इराक के शिया नेताओं ने अमेरिका को सेना वापिस बुलाने के लिए मजबूर किया तब क्या होगा? इराक के मामले में भी डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी है कि यदि ऐसा हुआ तो वे इराक के खिलाफ पाबंदियां लगाएंगे! सोचें, क्या गजब बात। जिस इराक में अमेरिका ने सेना को दांव पर लगाया, उसे अघोषित कॉलोनी बनाया, उसकी राजधानी बगदाद में अमेरिकी दूतावास पर हमला हो रहा है और संसद में बहुमत के साथ अमेरिकी सेना की वापसी का प्रस्ताव पास हो रहा है तो इस पर भड़कते और भड़काते हुए ट्रंप का कहना कि तब वे पाबंदियां लगाएंगे

जाहिर है मध्य-पूर्व के सभी इस्लामी देशों में शिया आबादी के बीच अमेरिका अब नंबर एक विलेन है। उधर सुन्नी व इस्लामी स्टेट, दाएश चाहने वाले पहले से ही घोर अमेरिका विरोधी हैं। शिया बहुल ईरान-इराक के नेता पूरे तालमेल से आगे मध्य एशिया के बाकी देशों के शियाओं को अमेरिका के खिलाफ भड़काएंगे तो सऊदी अरब, खाड़ी देशों के सुल्तानों के खिलाफ आम अवाम का सुलगना नई चिंगारियां लिए हुए होगा।

तो क्या मानें कि तीसरे महायुद्ध याकि सभ्यताओं के संघर्ष की तरफ बढ़ने का है यह धक्का?  फिलहाल अपन आसार नहीं मानते। मगर हां, 9/11 से शुरू सिलसिले में एक कदम और। उसकी दिशा में पहली बार लगता है कि अरब-खाड़ी देश का सबसे बड़ा राष्ट्र-राज्य अमेरिका के खिलाफ अपने को दाएश में कहीं कन्वर्ट नहीं कर ले। पूरा ईरान अब अमेरिका से बदला लेने, जिहाद की आग में तपता हो सकता है!

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