फेल भारत की फेल बुद्धि

भारत फेल है। वह बिना बुद्धि, आंख, कान, नाक के है। भारत के लोग न सोच सकते हैं, न देख, न सुन व न सूंघ सकते हैं। सोचना, समझना, बूझना खत्म है। जाहिर है यह भयावह और झनझना देने वाली जुमलेबाजी है। लेकिन सोचें, यदि बुद्धि होती तो क्या 130 करोड़ लोग यह चिंता करते हुए नहीं होते कि 72 वर्षों में हमारी कैसी बेगारी जो दुनिया के ओलंपिक में बिना तमगों के हैं! कैसे गरीबी का माइग्रेशन व महानगरीय झुग्गीकरण है? कैसे शिक्षा व्यवस्था, जहां कोचिंग-ट्यूशन के धंधे में परिवर्तित है तो चिकित्सा व्यवस्था प्राइवेट लुटेरों पर आर्श्रित! कैसे हमारा खानपान पकौड़े-छोले-भटूरे-गुटके-नकली दूध-मिलावटी खाद्य चीजों में परिवर्तित है! और क्यों कर लोगों का जीवन जीना धर्मादा, खैरात, मुफ्तखोरी पर निर्भर है! ये उदाहरण आपको सामान्य लगेंगे। मगर ये फेल राष्ट्र में 130 करोड़ लोगों के जीवन जीने का रोजमर्रा का अनुभव है। बावजूद इसके दिल-दिमाग में हकीकत का बोध नहीं। उफ! कैसी भयावह स्थिति!

सोचें, क्या देश की बुद्धि-दिमाग इस चिंता में कभी दिखा कि हर घर, हर परिवार बच्चे की शिक्षा ट्यूशन-कोचिंग-दाखिले का खर्च लिए हुए है। ऐसा क्यों? क्या इसलिए नहीं कि भारत राष्ट्र-राज्य की, केंद्र-प्रदेश सरकारों की शिक्षा व्यवस्था फेल है। स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई नहीं होती है तभी तो परिवारों को ट्यूशन-कोचिंग करवानी होती है। बच्चों को नौकरी पाना है, दाखिला लेना है तो भारत में कोचिंग-ट्यूशन करना होगा और ऐसा होना क्या शिक्षा व्यवस्था का फेल होना नहीं है? जैसा मैंने पहले भी लिखा है कि दुनिया में अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, जापान आदि में कहीं भी यह नहीं जो कोचिंग-ट्यूशन का धंधा राष्ट्रीय बजट के शिक्षा खर्च से कई गुना अधिक हो।

भारत के फेल होने की हकीकत है, जो भारत में 72 वर्षों से उत्तरोत्तर स्कूल-कॉलेज- विश्वविद्यालय फेल, जर्जर होते गए और कोचिंग-ट्यूशन का धंधा दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ा। इस कोचिंग में रट्टा मार, खांचे की स्ट्रक्चरल पढ़ाई मतलब डॉक्टर-इंजीनियर-आईएएस-आईपीएस-सरकारी कर्मचारी बनने जैसे कमाई के टारगेट वाले खांचों का कुल मिशन। ज्ञान के खुलेपन से बौद्धिक उर्वरता, सृजनात्मकता नहीं बल्कि पढ़ कर भी एकरंगी, ठूंठ अशिक्षित होना।  इतनी बुरी हकीकत लेकिन भारत की बुद्धि, आंख, कान, नाक में सोचा जाता है कि यह भारत का विकास  है। सेवा क्षेत्र का फैलाव है। कोचिंग-ट्यूशन का धंधा बढ़ना मतलब ग्रोथ!

अपना मानना है ऐसा होना अनुत्पादकता, संसाधनों की बरबादी है। बच्चों-नौजवानों की बेगारी है। यदि स्कूल-कॉलेज फेल हैं तो उन्हें चलाया ही क्यों जा रहा है? उनमें बच्चों-नौजवानों का समय क्यों बरबाद है, क्यों व्यर्थ का प्रपंच है? ठीक विपरित दुनिया के बाकी देशो में स्कूल-कॉलेजों में ही पढ़ाई करके आगे के दाखिले, नौकरी की काबिलियत बनती है तो भारत में हम लोग बच्चों पर, परिवार पर दोहरा बोझ, दोहरा खर्च डाल कर क्या कर रहे है? क्या यह संसाधन, समय, पैसे की बरबादी नहीं है? यह विकास है या विनाश है?

ऐसा ही हाल भारत राष्ट्र-राज्य के तंत्र याकि दफ्तरों का है तो चिकित्सा व्यवस्था का भी है। सरकारी दफ्तर काम के लिए बने हुए हैं लेकिन वहां काम तब होता है जब अफसर-बाबू-इंस्पेक्टरों को पटाओ। पैसा खिलाओ। मतलब सरकारी कर्मचारी तनख्वाह लेते हुए भी बिना उत्पादकता के हंै। उसकी उत्पादकता का मीटर तब चालू होगा जब उसे ग्राहक से, नागरिक से पैसा मिलेगा। यों भ्रष्टाचार दुनिया में कई देशों में मिलेगा लेकिन हम हिंदुओं ने अपनी सत्ता को और हाकिमों को अवतार या डंडा मान उस पर चढ़ावे-भ्रष्टाचार-सदाचार का जो लौकिक शृंगार किया है, जो रूप दिया है वैसा दुनिया में और कहीं नहीं हुआ। यह हमारा फेल होना है या पास होना?बारीकी से नोट करें हकीकत कि बतौर राष्ट्र-राज्य में भारत सरकार, प्रदेशों की सरकार, उसके दफ्तरों, कर्मचारियों के लिए जहां एक खर्च बजट अधिकृत है तो दूसरा जनता द्वारा खर्च, चढ़ावा भी है। कैसी भयावह दोहरी बरबादी है।

ऐसा ही हिसाब चिकित्सा व्यवस्था का बनता है। 72 वर्षों से भारत में सरकारों की चिकित्सा व्यवस्था उत्तरोत्तर फेल होती गई है। तभी सरकारी अस्पताल, उसकी व्यवस्थाएं भी गरीब मरीज से बाहर से टेस्ट करवाने, रिपोर्ट लाने को कहती हैं या वहां का डॉक्टर कमीशन नेटवर्क में बंध दवाईयां लिखता है या चौतरफा कुकरमुत्ते की तरह उगे प्राइवेट अस्पतालों में जा कर इलाज के लिए कहता है। तभी सोचंे कथित तौर पर सर्वाधिक तेज रफ्तार बढ़ते प्राइवेट मेडिकल अस्पतालों का सेवा क्षेत्र हकीकत में जनता का क्या अनुभव बनवाए हुए है। जवाब हैमजबूरी का फायदा उठा हर तरह से लूटना? क्या यह सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था का फेल होना नहीं है? यह विकास है या सार्वजनिक और निज पैसे की दोहरी बरबादी है?

एक और हकीकत। भारत और भारत का तंत्र नागरिक को सुरक्षा देने की व्यवस्था में भी वैसे ही फेल है जैसे शिक्षा-चिकित्सा में है। भारत के सेवा क्षेत्र में विकास की छलांग का एक कंपोनेंट याकि एक क्षेत्र सुरक्षा, सिक्योरिटी देने का धंधा भी होगा। पुलिस व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था फेल है तो प्राइवेट सिक्योरिटी कंपनियों की चांदी है। आप गौर करें, दिल्ली या महानगरों की हर कॉलोनी में कॉलोनी वाले सुरक्षा बंदोबस्त करते मिलेंगे। हर कॉलोनी, हर सरकारी इमारत तारों का बाड़ा लिए मिलेगी। इस नाते भी दुनिया में ऐसा कहीं नहीं हो रहा है जैसा भारत में है। पूरा लंदन घूम जाएं, वहां कहीं नेताओं, अफसरों का घर, अलग-अलग कॉलोनियां दीवारबंदी-तारबंदी-गेट व प्राइवेट गार्डों का घेरा लिए नहीं मिलेगी। मतलब पुलिस की सार्वजनिक सुरक्षा में वहां सभी बस्तियां सुरक्षित हैं इसलिए आरडब्लुए बना कर रहने वालों से पैसा वसूल कर कॉलोनी की सुरक्षा का प्रबंध-प्रपंच करना जरूरी नहीं। मगर भारत में पुलिस-सुरक्षा व्यवस्था क्योंकि फेल है इसलिए सरकारी दफ्तर, कॉलोनियां भी तारों की घेरेबंदी, कैमरे-गार्ड लिए हुए मिलेंगी तो अमीर-मध्य- निम्नवर्गीय सभी कॉलोनियां भी सुरक्षा का निजी खर्चा होता मिलेगा। क्या यह देश में सुरक्षा व्यवस्था का फेल होना, दोहरे खर्च की बरबादी नहीं?

अब जरा नागरिकों के खानपान वाले मामले पर विचारा जाए। पिछले 72 वर्षों में लोगों के खाने की भूख में कैसे ढाक के तीन पात हैं और इस बहाने फेल देश में उसके नागरिक कैसे जीये हैं इसका प्रमाण अनाज-राशन व्यवस्था का भंडारा है। जैसे शिक्षा, चिकित्सा व्यवस्था फेल है वैसे राशन व्यवस्था फेल है, इसे समझना हो तो भारत सरकार और राज्यों की सरकारों द्वारा 1947 से ले कर 2020 की राशन-खाद्य सब्सिडी और तमाम योजनाओं का ब्योरा एकत्र करें। लब्बोलुआब बनेगा कि पंडित नेहरू के वक्त में अमेरिका से पीएल-480 योजना में गेहूं मंगा कर भूख मिटाने से सिलसिला शुरू हुआ था। तब से गरीब की भूख मिटाओ में किसानों से अनाज खरीदने, एफसीआई में भंडारण, दो-तीन रुपए किलो की रेट पर अनाज बांटने से लेकर शहरों में सस्ती इडली-डोसा, रोटी-सब्जी बेचने याकि अम्मा, अन्नपूर्णा, अक्षत पात्र, स्कूलों में मिड डे भोजन जैसे असंख्य लंगर सरकारों ने खोले हुए हैं और इसका कुल परिणाम संसाधनों का दोहरा-तिहरा खर्च व भ्रष्टाचार है। अभी हाल में दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुआ। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में लोगों से कहा कि यदि उसे जिताया तो दो रुपए किलो की रेट पर अच्छे गेहूं का आटा बाटेंगे।

सोचें, 72 वर्ष में भारत कहां से कहां पहुंचा। जहां झुग्गी वहां पट्टा और दो रुपए किलो आटा, मुफ्त बिजली वाली मुफ्तखोरी जैसी जरूरत देश की राजधानी दिल्ली के दो करोड़ (भविष्य में चार करोड़ लोगों) नागरिकों में यदि बहुसंख्यकों की भूख है तो यह सफल भारत का प्रमाण है या फेल भारत का प्रमाण?

ऐसा भारत के प्रधानमंत्री, उनकी सत्तारूढ़ पार्टी या प्रादेशिक पार्टी और क्षत्रप का सोचना व नागरिकों से वादा करना क्या यह नहीं बतलाता कि भारत कितना फेल है और भारत के नागरिक कैसी बेगारी में हैं? नागरिकों की क्या उत्पादकता है, उनका क्या पुरुषार्थ है, क्या मेहनत है जो वे झुग्गी का पट्टा बनवाने, झुग्गी को बिजली-पानी या झुग्गी को मोहल्ला क्लिनिक या दो रुपए किलो आटा या स्कूलों को बेहतर करने की लालसा में, भूख में  जी रहे हैं?

और यदि ऐसा है तो देश की बुद्धि, आंख, कान, नाक को आपने कभी हकीकत पर रोते हुए, चिंता करते हुए  क्या कभी देखा है? पर जैसे सरकार बेसुध है वैसे नागरिक बेसुध है तो भला बुद्धि कहां?

इस कॉलम में बताई हकीकत पर समग्रता से विचार करते हुए जरा सोचंे कि नागरिक की सुरक्षा, शिक्षा, चिकित्सा, खान-पान आदि की सार्वजनिक जिम्मेवारियों में यदि सरकार फेल है तो भारत में सरकार फिर कर क्या रही है? तब उसका काम, मकसद इस हकीकत को बयां करता मिलेगा कि जनता से टैक्स वसूलो और अपना तानाबाना, इस्टेबलिसमेंट चलाए रखो। उधर नागरिक पर विचार करें तो उसकी बुद्धि इतना भी नहीं सोच पाती कि वह सरकार को सुरक्षा, शिक्षा, चिकित्सा के लिए पैसा बतौर टैक्स देता है और अपनी जेब से भी इन जरूरतों पर पैसा खर्च कर रहा है। ऐसी दोहरी बरबादी क्यों?

विचार में गहराई बढ़ती जा रही है। इसलिए और विचारना होगा। शायद अगले सप्ताह।

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