अंग्रेज की कोख से है नौकरशाही

जैसे नेहरू-पटेल थे वैसे मोदी-शाह है, ऐसा होना उस क़ॉमन कड़ी, उस तासीर, उस तंत्र से है जिसका नाम नौकरशाही है। सोचें, यह नौकरशाही किसकी कोख से पैदा हुई?जवाब है अंग्रेजों की कोख से! किस उद्देश्य से हुई? राज करने के लिए!राज किसलिए? भारत को लूटने के लिए, खाने के लिए! तीस करोड़ लोगों को गुलाम बनाए रखने के लिए! खाया-लूटा कैसे जाता है? लोगों को डरा कर, उलझा कर! नौकरशाहों की विशेषज्ञता क्या है? सर, सर, यससर, हुकुम-हुकुम वाली बुद्धीहीन तासीर! हां, लोगों पर राज करने के लिए बुद्धी, दिमाग, दिमागी होशियारी, इंटलिजैंस नहीं बल्कि डंडे, फाइल, नियम-कानून के जंजाल की जरूरत होती है। अंग्रेजों ने 1858 में जब आईसीएस सेवा बनाई थी तब उसमें सौ फीसद गोरे थे। वे मालिक थे, दीन-हीन गुलाम भारतीयों के हाकीम थे तो उनके ऐसो-आराम और जलवे का ठाठ ही भारत में तब लोगों को कंपकंपा देता था। एक बार गौरे ने परीक्षा पास की नहीं कि फिर ठाठ ही ठाठ! बिना बौदि्धकता के राज का ठसका। तभी अपने को ऐसे उदाहरण नहीं मिले जिसमें कोई गौरा आईसीएस अफसर करियर के बाद ब्रितानी बौद्धिकता का प्रतिनिधी बना हो। गौरे आईसीएस भी लूटने, ऐस करने, प़ॉवर के एजेंट, रेवेन्यू, मालगुजारी वसूलने का डीएनए लिए हुए थे! मतलब राज भोगना और राज करना!

तभी तब और अब भी भारत की नौकरशाही का एक ही संस्कार है राज भोगना और राज करना!दुनिया में कही नौकरशाही का हिस्सा बनने का वैसा क्रेज नहीं है जैसा भारत में है। क्यों? इसलिए कि अंग्रेजों की कोख हो या नेहरू-पटेल के वक्त का पालना या मोदी-शाह का न्यू इंडिया सभी वक्तों में नौकरशाही, आईएएस जमात की पैदायस इस लोरी के साथ है कि सरकारी नौकरी राज का मौका है!राजा की एजेंटगिरी और लोगों को सिकंजे में ले कर लूटने का मौका है!

ब्रितानी दिल-दिमाग-तानेबाने-मकसद से भारत में जो इंपीरियल सिविल सर्विस (आईसीएस) के अफसर तैयार हुए थे वे रेवेन्यू-लगान वसूलने और ब्रितानी सत्ता को मजबूत बनाते हुए कानून-व्यवस्था ठीक रखने का मकसद लिए हुए थे। इन्हे नसीहत थी किगुलामों में विद्रोह, आजादी की बुद्धी नहीं बनने दे। वे लोगों का माईबाप बन कर रहे। हां, लार्ड कर्जन के राज से ले कर याकि 1858 से ले कर 1947 तक आईसीएस की अफसरशाही ने यही काम किया तो आजादी के बाद इसका नामांतरण भले आईएएस काहुआ हो लेकिन 1947 से आज तक काम वहीं है जो अंग्रेजों के वक्त से चला आ रहा था। राजा को खुश रखना, उसका स्वार्थ साधना और सत्ता के बतौर एजेंट जनता पर हुकुम चलाना! अंग्रेजों के वक्त रेवेन्यू वसूली का काम जैसा था वह आज भले टैक्स प्रशासन में बदला हुआ हो लेकिन नेचर, प्रकृति जस की तस है। मतलब डराना, धमकाना और हाकिम सा सलूक। अंग्रेजों के वक्त, प्रेमचंद की कहानियों में हम गरीब किसान, नमक के दरोगा जैसे किस्से पढ़ते थे तो 21 वीं सदी के भारत में टैक्स दरोगाओं के त्रास से अरबपति सिद्धार्थ जैसे की आत्महत्या की कहानियां पढ़ते हंै!

मैं भटक रहा हूं। बुनियादी बात है कि पंडित नेहरू से ले कर नरेंद्र मोदी सभी ने नौकरशाही का उपयोग बतौर अपने एजेंट अपनी सत्ता, अपनी सनक, अपने इलहाम के लिए किया! नौकरशाही के लिए भी यह सुकूनदायी, स्वभाविक थाइसलिए क्योंकि अंग्रेजों की कोख से नौकरशाही का जीवाष्म या डीएनए राज के एजेंट के रूप में ही स्थापित है। जब राज करने के लिए ही जन्म है तो वह न लोकसेवक हो सकता है और न बौद्धिक श्रेष्ठीजन। सोचे, क्यों भारत में हर कोई सरकारी अफसर, सरकारी नौकर बनना चाहता है?इसलिए ताकि वह राज करने वाला राजा बने। भारत में लाखों-करोड़ों लड़के -लडकियां सरकारी अफसर, आईएएस, सरकारी नौकरी के लिए पागल हुए पड़े है तो वजह राजा, याकि पॉवर, सत्ता का एजेंट बनने का सीधा-स्थाई मौका और राजसी सत्ता ठाठ!

जान लंे भारत में राजा हो या उसका दरबार या उसके नौकर उन्हे पसीना नहीं बहाना होता है। भारत भगवान भरोसे चलने वाला सनातनी देश है। इस हकीकत को हमेशा याद रखे कि 1947 के वक्त सिर्फ हजार आईसीएस अफसर तीस करोड़ लोगों पर राज करते थे। अंग्रेजों ने भारत पर दो सौ साल मुश्किल से सेना सहित कभी ग्यारह हजार तो कभी बीस हजार लोगों की संख्या से राज किया था। भारत की जनता का डीएनए गुलामी, खौफ से इतना भरापूरा है कि आबादी तीस करोड़ हो या सवा सौ करोड़ लोग एक राजा फरमान जारी करेगा कि आज से तुम सब लोगों का पैसा हराम, आज से नोटबंदी या नसबंदी तो सब उस राजा को सिर पर बैठा कर जयकारा लगाएंगे! राजा को इलहाम हुआ तो अफसर उसका फरमान निकालेगा और जनता वाह करेगी!

यही भारत में गर्वनेश का इतिहास और सत्व-तत्व है!

कुल मिलाकर न राजा को बुद्धि, माइंड, बौद्धिक अनुष्ठान करना याकि आगा-पीछा सोचना है और न नतीजों की परवाह करनी है। न उनके अफसर याकि नौकरशाही यह सोच कर दुबली होनी है कि जम्मू-कश्मीर दुरूस्त नहीं हुआ या नोटबंदी से नुकसान हुआ तो क्या होगा!भारत के लोगों की गुलामी और खौफ की बानगी है जो अंग्रेजों से भारत में किसने 1942 में पूछा था कि अकाल में करोड़ो लोग मर गए अब तो शर्म से डुब मरो या पंचवर्षीय योजनाएं फेल है तो नेहरूजी अब तो मिक्स खिचड़ी छोड़ो या नोटबंदी में आर्थिकी दिवालिया हो गई है तो अब तो अपने आपको सर्वज्ञ मत मानों!

गौर करें इस बात पर कि 1857 की क्रांति कोशिश के बाद भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी की जगह जब महारानी का, ब्रितानी संसद का सीधा राज हुआ तो वहां के नियंताओं, लार्ड कर्जन आदि ने क्या किया? उनमें विचार हुआ कि भारत पर कैसे राज किया जाए। ब्रितानी प्रधानमंत्रियों, केबिनेट, गर्वनर-जनरलों ने बहुत विचारा, सोचा-समझा और नौकरशाही की आईसीएस सेवा बनाने का फैसला किया। अपना वह एक स्टील फ्रेमवर्क बनाया जिससे भारत पर कंट्रोल रखा जा सकें। वह शासन प्रक्रिया, वे कानून, वह राजभाषा थोपी जिससे लोग डरे और अंग्रेजों का राज सुरक्षित होता जाए।

क्या ऐसे जब भारत आजाद हुआ तो नेहरू-पटेल ने सोचा था कि अब कैसे राज हो? कैसे भारत के लोग भयमुक्त, सौ टका स्वतंत्रता से सांस ले? लेकिन इनका पहला फैसला था कि जैसे अंग्रेज राज कर रहे थे, जो नौकरशाही उनके राज की एजेंट थीउसे ही नेहरू-पटेल ने अपनाया। सो अंग्रेज के छोड़े अफसर नेहरू-पटेल के अफसर हुए। राजा बदला पर राजा का एजेंट पुराना ही रहा।

अब सोचंे इनसे नेहरू ने क्या काम लिया और इन्होने नेहरू के लिए क्या काम किया? नेहरू को इलहाम हुआकि जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान के हमले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाना चाहिए। फिर इलहाम हुआ, जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष व्यवस्था बने। तो अफसरों ने अनुच्छेद-370 का फरमान बनाया।!नेहरू याकि राजा, सत्ता की इच्छा हुई और अफसरों ने फाइल-फरमान बनाया। मतलब राजा के कहे की पालना नौकरशाही का परमों धर्म! अब 2019 में मोदी-शाह ने कहा कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 खत्म तो तुरंत खत्म! तय माने कि नेहरू के वक्त की फाईलों पर और मोदी-शाह की फाइलों में ऐसा कोई विचार लिखा नहीं मिलेगा कि ऐसा करने से आगे क्या होगा? आगे इस रोडमैप अनुसार चलते हुए फंला यह-यह कदम उठेगा। आगे सुविचारित उजाला है या अंधेरी गुफा का आधी रात वाला सफर तो नहीं जिसमें फिर ढाई के तीन पांत!

जाहिर है नेहरू के फैसले उनकी फितरत में थे तो मोदी-शाह के फैसले भी इनके इलहाम और फितरत में है। जबकि अंग्रेज मकसद (लूट-गुलामी) लिए हुए थे। उनके उत्तराधिकारी भारत के प्रधानमंत्रियों ने फितरत और सनक में जनता का माईबाप बन कर बतौर एजेंट नौकरशाही से जनता पर जैसे जो प्रयोग किए है उसने कुल मिलाकर नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाला अनुभव है और दीवाल पर सिर पीटते रहना है। फिर मामला भले आर्थिकी, प्रदूषण या जम्मू-कश्मीर का हो।

नेहरू-पटेल का बलंडर था जो लोगों पर राज करने के मकसद से बनी नौकरशाही से जनता के कल्याण की कल्पना की। वैसे ही नरेंद्र मोदी का पांच वर्षों से बलंडर है जो अपने जुमलों पर नौकरशाही के जरिए भारत में क्रांति होते देख रहे हैं।

यह सब क्यों? इसलिए कि भारत के हम लोग, हम लोगों का दिल्ली तख्त, हमारा राजा और हमारा सत्ता तंत्र सब उस दिमाग के मारे है जो मंद बुद्धी है, जो बौद्धिकता में बांझ है और इतना भी बूझ नहीं पाते, विचार नहीं कर पाते कि जो लूटने के लिए, राज करने के लिए बने उनसे अपना भला कैसे हो सकता है? सोचें, हम सोच पाने में भी कितने अपंग हैं!(जारी)

3 thoughts on “अंग्रेज की कोख से है नौकरशाही

  1. 🙏🙏🙏 शानदार, जबरदस्त, जिन्दाबाद 👍👍👍 बेहतरीन सर

  2. 👍👍👍शानदार, जबरदस्त, जिन्दाबाद🙏🙏🙏 बेहतरीन आलेख सर

  3. नौकरशाही वास्तव में देश की सबसे मुख्य समस्या है, राजनीति और न्यायपालिका द्वितीयक है

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