गरीबी के नए रूप और बुद्धि की गरीबी

भारत की समस्या भारत की आर्थिक बुद्धि है! लेकिन क्या बुद्धि है भी? आज नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, उससे पहले डॉ. मनमोहन सिंह थे। मोदी ने अपनी सरकार में अभी हाल ही में चिंतन-संकल्प-फैसला बनवाया कि जहां झुग्गी वहीं पट्टा, वहीं मकान! उधर विपक्ष के केजरीवाल की ‘काम करने वाली सरकार’ की परिभाषा है- खैरात बांटना, लोगों को मुफ्तखोर बनाना! इनके पहले के मनमोहन सिंह के वक्त के सबसे बड़े काम को जरा याद करें। तो वह था- पैसे बांटने की मनरेगा और सस्ते राशन की खाद्य गारंटी! ठीक विपरित चीन में देंग शियाओ पिंग से लेकर मौजूदा शी जिनफिंग का चिंतन-संकल्प और फैसले क्या थे? तो जाना जाए कि इनका राष्ट्र निर्माण का रोडमैप था- फैक्टरियां लगवाना, लोगों से मजदूरी करवाना, झुग्गियों को तोड़ना, बहुमंजिला इमारतें बनवाना, इंफ्रास्ट्रक्चर के विशाल प्रोजेक्ट बनवा कर लोगों को, आबादी को, गरीब को सख्त मेहनत, खून-पसीने की कमाई की आदत बनवाना! इसे गरीब का, मजदूर-सर्वहारा वर्ग का शोषण कहें या पूंजीवाद का नंगा नाच मगर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने, वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी ने या दुनिया के पूंजीवादी देशों (अमेरिका, जापान से लेकर फ्रांस, ब्रिटेन, सिंगापुर सबमें) की लोकतांत्रिक पार्टियों ने आबादी को खून-पसीने की मेहनत में झोंका, उसके अवसर बनवाए न कि लंगर, खैरात, धर्मादा की मुफ्तखोरी का आदि बनवाया!

मतलब आबादी का, लोगों का, देश का बनना पूंजी और श्रम से होता है न कि कंगाली, मुफ्तखोरी व भष्टाचार से। यह तब संभव है जब पूंजी-पैसा हो और पैसा तब आता या बनता है जब भ्रष्टाचार, बंदिशें न हों। इस बेसिक बुद्धि पर भारत में ताला लगा हुआ है। 21वीं सदी के आज के मुकाम में देश की राजधानी में भारत के नियंताओं का यह आर्थिक नुस्खा अपने को भयावह चुभा कि जहां झुग्गी वहीं पट्टा और खैरात, धर्मादा है सरकार का काम! तभी आजाद भारत के 72 साला आर्थिक इतिहास में पीएल-480 के जरिए अमेरिका से गेहूं की भारत में खैरात से ले कर केजरीवाल, नरेंद्र मोदी के राज में मुफ्त-सस्ते राशन, बिजली का सिलसिला अनवरत है। और यहीं निरंतरता भारत के विकास की गरीब दास्तां है।

इस बात को जरा बारीकी से समझा जाए। देश की राजधानी दिल्ली तेजी से बढ़ता महानगर है। 1951 में 17 लाख की आबादी वाला शहर आज कोई दो करोड़ की आबादी लिए हुए है। अगले दस सालों में यह एनसीआर सहित कोई पौने चार करोड़ लोगों को लिए हुए होगा! भला क्यों दिल्ली की तरफ लोग दौड़ रहे हैं? क्या दिल्ली-एनसीआर में उद्योग लग रहे हैं, रोजगार मिल रहा है? क्या सरकारी नौकरियों से परिवार शिफ्ट हुए हैं? क्या दुनिया की अन्य राजधानियों की तरह वित्तीय-बैंकिग, पर्यटन, सिंगापुर-दुबई जैसे आवासीय-व्यवसायी हब बनने जैसे विकास सेलबालब है दिल्ली? ऐसा कुछ नहीं है। उलटे हकीकत है कि पिछले तीस सालों में दिल्ली की सीमा के भीतर कल-कारखाने बंद हुए हैं। धंधे चौपट हुए हैं। मकान महंगे हुए हैं, दिल्ली गैस चैंबर बनी है। बावजूद इसके क्यों दिल्ली में, या मुंबई, महानगरों की तरफ लोगों का सैलाब है? इसलिए क्योंकि गरीबी के साथ लोगों का टाइमपास होना दिल्ली में आसान है! दिल्ली में झुग्गी का जुगाड़ हो जाएगा। राशन कार्ड, सस्ता अनाज मिल जाएगा। चोरी से या मुफ्त में बिजली मिल जाएगी। देश की राजधानी-नौकरशाहों की अथाह कमाई में, दो नंबर की आर्थिकी में घरों में दो-दो तीन-तीन नौकर, कामवालियों, ड्राइवर, कारे साफ करने वाले, चौकीदार, हेल्पर, बढ़ई, पलंबर, पेंट-पुताई, कारीगर, कुली, बोझा ढोने से लेकर, कुरियर ब्वॉय-डिलीवरी-काउंटर ब्वॉय, चाय-भटूरे-पकौड़े-सब्जी-गुटके के ठेले, रेहड़ी, फुटपाथ बाजार, संडे-मंडे बाजार, रिक्शा-तिपहिया वाहन से लेकर छोटे-छोटे मंदिर-मस्जिद में पुजारी- मौलवी के वे तमाम कुशल-अकुशल काम दिल्ली में हैं, जिससे दिल्ली में लाखों लोगों-परिवारों का गरीबी के साथ मजे से टाइमपास है।

हां, दिल्ली में बंगाल, झारखंड, ओड़िशा से ले कर पूर्वांचल, बिहार, राजस्थान आदि प्रदेशों की गांव-देहात की गरीब आबादी का आना कुल मिलाकर काली आर्थिकी, भ्रष्ट समृद्धि में काम वालियों, काम वालों का वह सैलाब है, जिसमें निर्माण नहीं है, बल्कि गरीबी का एक जगह से दूसरी जगह ट्रांसफर इस सुकून में है कि शहर में झुग्गी मिलेगी, मुफ्त राशन-पानी-बिजली मिलेगी तो गांव-घर भेजने के लिए कामवाली बनकर नौकरानी-नौकर बन कर जीने से पैसा भी होगा। गांव में ये गमछा पहने घूमते थे दिल्ली में सौ-दो सौ रू की जिंस पहने मोबाइल से टाइम पास करते है, छोटे-छोटे काम करते है। ऐसा चीन में, वियतनाम (और अब आश्चर्यजनक रूप से ढाका में भी) के बीजिंग, शंघाई, हो ची मिन्ह सिटी आदि में नहीं मिलेगा। ढाका में रेडिमेड कपड़ों की फैक्टरियों के चलते अब माइग्रेशन हो रहा है तो चीन, वियतनाम में आबादी का माइग्रेशन उन इलाकों में हुआ है, जहां विदेशियों ने आ कर विशाल फैक्टरियां स्थापित की। चीन में प्रदेशों में औद्योगीकीरण ने राजधानी बीजिंग को नहीं बिगड़ने दिया।

कोई माने या न माने, पूरे भारत में आज, 130 करोड़ की आबादी में गांव-कस्बों से शहर, महानगर जाने का जो रेला है वह गरीबी का माइग्रेशन है। गरीबी का शहरीकरण है। इसमें भारत का वैशिष्ट, भारत की आबादी का जीवन उत्तरोत्तर मुफ्तखोरी, काम चोरी और भूख-लालसा (महानगरों में वर्गीय असमानता के अनुभव से) में बंधते जाना है। यह हिसाब फालतू है कि काम वालियों, काम वालों, नौकर-नौकरानियों से भारत की आर्थिकी में सेवा सेक्टर बढ़ रहा है। दिल्ली में यदि दो करोड़ लोग हैं और सरकारी कर्मचारियों, दो नंबर की आर्थिकी के धंधेबाजी का पैसा है तो बाकी देश के मुकाबले यहा भले प्रति व्यक्ति आमद अधिक है और झुग्गी झोंपड़ी में रहने वाला भी निम्न मध्यवर्गीय माना जा सकता है लेकिन वह विकास नहीं है।

विकास का यह झुग्गी मॉडल दुनिया के कई अफ्रीकी, लातिनी अमेरिकी देशों में भी अस्तित्व में है मगर भारत अनहोना इस नाते है क्योंकि आबादी में भारत नंबर दो पर है और बीस-तीस सालों में वह आबादी में चीन को पछाड़ देगा। डेढ़ सौ करोड़ लोगों की भीड़ या कि दिल्ली में चार करोड़ लोगों का जीना यदि भीड़ की तरह या अकुशल-मुफ्तखोर-वोट बैंक की तरह दशक-दर-दशक बढ़ता गया तो आगे कैसी भयावह दशा बनेगी? चीन ने पिछले चालीस सालों में भीड़ को उत्पादक श्रम शक्ति में कन्वर्ट किया है। उसने अपनी आबादी को दुनिया घूमवा दी है या दुनिया से साक्षात्कार करवा दिया है। अमेरिकी-यूरोपीय कंपनियों की कार्य संस्कृति, आधुनिकता, मेहनत- बुद्धि का उसे अभ्यस्त बनवा दिया है। अपनी मैंडेरिन भाषा को, अपने अनुशासन को, अपनी जीवन शैली, अपनी सभ्यता को न केवल वैश्विक कसौटी में दमदार साबित किया है, बल्कि पूरी दुनिया को अपने पर निर्भर बनाया है।

कैसे? मेहनत से न कि मुफ्तखोरी से। दुनिया भर से पूंजी, बहुराष्ट्रीय कंपनियों को खुश कर, उससे अपने यहां फैक्टरियां लगवा कर।लेबर लॉ और मजदूरों के भले की बातों को दफना कर।

कितनी सामान्य बात है यह! कोई 42 साल पहले चीन में देंग शियाओ पिंग ने सोचा कि बिना मेहनत, बिना विदेशी कंपनियों के लिए लाल कालीन बिछाए याकि पूंजी और श्रम की केमिस्ट्री बनवाए बिना राष्ट्र निर्माण संभव नहीं है। इस सामान्य समझ पर देंग नाम के एक नेता ने कम्युनिस्ट पार्टी का रोडमैप बनवाया और 1983 से ले कर आज तक के पांच राष्ट्रपतियों (ली शियानियान 1983-88, यांग शांगकुन 1988–1993, जियांग जेमिन 1993-2003, हू जिनताओ 2008-13, और 2013 से शी जिनफिंग) ने वह कमाल कर दिखाया, जिसमें धर्मादा, गरीबी, मुफ्तखोरी राजधर्म नहीं और पूरा देश बना दुनिया की फैक्टरी!

भारत में पीवी नरसिंह राव ने देश की आर्थिक सोच बदलवाने का साहस दिखाया था लेकिन उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी ने पूरा वक्त किंतु-परंतु में जाया किया। इन्हें विदेशी पूंजी, विदेशी तकनीक, विदेशी कंपनियों के लिए पलक पावंड़े बिछाने थे। मजदूरों के भले के नाम पर बने इंस्पेक्टर राज, लेबर लॉ को खत्म करना था। सिस्टम के डंडों-टैक्स को खत्म करना या घटाना था लेकिन न हिम्मत और न दृष्टि। नतीजे में आज क्या है? भारत की भीड़ अब चीन का बाजार है और फुटपाथ बाजार व शहरी केहोस का विकास है तो जो झुग्गी वहीं पट्टा और खैरात बांटनाहै सरकारों का काम मॉडल!

तभी गजब है भारत के हम लोग! और गजब हैं नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल और डॉ. मनमोहन सिंह याकि भारत के नेता और भारत की पार्टियां और उनकी बुद्धि! (जारी)

2 thoughts on “गरीबी के नए रूप और बुद्धि की गरीबी

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