मोदी, एनआरसी और‘झूठ’

रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों को, मुसलमानों को गुमराह हुआ बताया। उन्होने दो टूक शब्दों में कहा कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर याकि एनआरसी की बात झूठी है। बावजूद इसके आज भी टीवी चैनलों पर विरोध-प्रदर्शन होते दिखे हैं। दिल्ली के मंडी हाऊस-जंतर-मंतर पर भीड़ दिखी। क्या अर्थ निकाला जाए? या तो देश ने प्रधानमंत्री के कहे को झूठा माना या लोगों को गुमराह करने से विरोधी, शहरी नक्सली बाज नहीं आ रहे हंै! सरकार मुसलमानों को समझाने के लिए विज्ञापनबाजी कर रही है लेकिन मुसलमान भरोसा नहीं कर रहे हैं। प्रधानमंत्री के कहे जाने के बावजूद नहीं माना जा रहा कि एनआरसी की बात झूठ और फितूर है। सोचंे, प्रधानमंत्री की जुबान बनाम आंदोलित जनता व विरोधी नेताओं के मध्य अविश्वास का कितना बड़ा अंतर, खाई याकि गेप है।

यह स्थिति देश की किस दशा को दर्शाती है? 130 करोड लोगों की आबादी में यदि आज यह तौलने बैठे कि कितने लोग प्रधानमंत्री मोदी के कहे पर विश्वास कर रहे हंै और कितने नहीं तो खौफनाक तस्वीर निकलेगी और भारत का जनमानस विभाजित व शासक- प्रजा के बीच खाई बनी हुई दिखेगी। इस बात को वोट, चुनाव, राजनीति के चश्मे में न देखें और विचार करें कि नागरिकता जैसे मसले पर भी जब परस्पर विरोधी सोच बनी है तो उससे राष्ट्र-राज्य के प्रति विश्वास-आस्था का क्या बन रहा होगा?प्रधानमंत्री कह रहे है कि सब झूठ और लोग उसे मान नहीं रहे।तभी विरोध-प्रदर्शन- आंदोलन खत्म नहीं।

हां, प्रधानमंत्री मोदी ने रामलीला मैदान में एनआरसी पर आंदोलनरत लोगों को झूठ का शिकार और झूठा करार दिया! भारत के मौजूदा नैरेटिव व बवाल को झूठा बताया!इसे शहरी नक्सलवादियों द्वारा गुमराह बनाना कहा। तथ्य है कि हर कोई उनके भाषण से पहले एनआरसी का ख्याल लिए हुए था। एक वर्ग मान रहा था कि अच्छा है तो दूसरा वर्ग मान रहा था बुरा। सबका निचोड़ था, दुनिया मान रही थी, हम सब मान रहे थे कि एनआरसी और घुसपैठियों को निकालना मोदी सरकार की प्राथमिकता है। सरकारइस पर गंभीरता से काम कर रही है। लेकिन अचानक प्रधानमंत्री ने रविवार को दो टूक शब्दों में कहा यह सब गलत।

पहला सवाल है हम क्यों ऐसा मान रहे थे? क्यों आंदोलन हो रहा था? जवाब है भाजपा ने, मोदी सरकार ने, राष्ट्रपति ने, गृह मंत्री ने इसका वादा, इसका संकल्प बताया हुआ था।मोदी सरकार की दूसरी शपथ के बाद भारत के राष्ट्रपति से लेकर गृह मंत्री अमित शाह सबने अलग-अलग मौको पर ऑन रिकार्ड कहा है कि ‘मान के चलिए एनआरसी आने वाला है!’

यह वाक्य लोकसभा में नागरिकता संशोधन बिल को पास कराते हुए 9 दिसंबर को गृह मंत्री अमित शाह ने सदन स्पीकर की और इंगित हो कर बोला था। इसकी वीडियो क्लीपिंग दुनिया ने देखी है। ऐसे ही नई सरकार के पहले संसद सत्र में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सांसदों से कहा कि मेरी सरकार ने राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के प्रोसेस पर प्राथमिकता के आधार पर उन इलाकों में अमल का निश्चय किया है जो घुसपैठिया प्रभावित है। क्या राष्ट्रपति झूठ बोल रहे थे? क्या इनका मंतव्य सिर्फ असम था?पर असम में तो रजिस्टर का काम, उसका प्रोसेस हो चुका था। उसके बाद बंगाल को ही सर्वाधिक घुसपैठियां प्रभावित इलाका माना जाता है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने असम के बारे में भी देश का, खासकर हिंदुओं का यह सोचना झूठा करार दिया कि वहां घुसपैठियों के लिए डिटेंशन कैंप बन गए है और घुसपैठियों को चिंहित कर कैंपों में रखा जा रहा है। उन्होने बताया कि डिटेंशन सेंटर है ही नहीं। उनके शब्दों में- कांग्रेस और अरबन नक्सल के द्वारा उड़ाई गई डिटेंशन सेटंर वाली अपवाह, सरासर झूठ है, देश को बरबाद करने वाली है, यह नापाक इरादों से भरी है, यह झूठ है, झूठ है, झूठ है!

मगर इसे सोमवार को कोलकत्ता के टेलिग्राफ अखबार ने सप्रमाण सफेद झूठ साबित किया। अखबार ने असम के गोलपारा जिले के कदमटोला, गोपालपुर में बन रहे डिटेंशन सेंटर का फोटो छापते हुए जानकारी दी कि असम में जेलों के कम से कम छह डिटेंशन सेंटर हैं। और इसी साल भारत सरकार के गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने संसद को जवाब देते हुए बताया कि असम के छह सेंटरों में 1, 043 विदेशी रखे हुए हंै। इनमें 1025 बांग्लादेशी हंै और 18 म्यंमारी हैं।(संसद में यह भी जवाब है कि असम के डिटेंशन केंद्रों में 28 अवैध घुसपैठियों की मौत हुई है।)असम सरकार के ये डिटेंशन सेंटर केंद्र के गृह मंत्रालय की मंजूरी से है।

टेलिग्राफ की रपट के अनुसार असम में गोलपारा, कोकरझार, सिल्चर, डिब्रूगढ़, जोरहाट, तेजपुर में छह डिटेंशन सेंटर है व दस और की अनुमति केंद्रीय गृह मंत्रालय से मांगी हुई है। असम में भाजपा सरकार कोई 47 करोड़ रू की लागत से गोलापारा जिले में तीन हजार लोगों को रखने वाला डिटेंशन सेंटर बना रही है। असम के बाहर भी महाराष्ट्र में फड़नवीस सरकार ने गैर-कानूनी घुसपैठियों को रखने के लिए जगह चिंहित की है। केंद्र सरकार द्वारा निर्देश भेजने के बाद जुलाई में जगह खोजने का काम शुरू हुआ। ऐसे ही कर्नाटक में हाईकोर्ट में दायर जवाब में केंद्र ने बताया कि विदेशी गैर-कानूनी लोगों, घुसपैठियों को लेकर उसने सभी राज्य सरकारों को 2014 में पत्र लिख निर्देश दिया था। फिर उसके फोलो अप में 2018 में वापिस डिटेंशन सेंटर बाबत पत्र भेजा गया। इसी केस में फिर कर्नाटक सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि गैर-कानूनी विदेशियों को रखने के लिए 35 अस्थाई डिटेंशन सेंटर है।

क्या टेलिग्राफ का यह ब्यौरा, फोटो झूठ है, झूठ है, झूठ है? तभी उस अखबार में सोमवार को पेज एक पर लीड हैडिंग थीकि- क्या कह रहे हैं एक झूठा,पीएम? क्या मोदी एनआरसी जहाज को छोड़ कूद रहे हंै या वक्त चाह रहे हंै? (just who are you calling a liar, PM?-is modi just jumping the NRC or buying time?)

अखबार ने मंगलवार को भी मोदी बनाम मोदी: दावा सत्य टेस्ट में फेल (Modi VS Modi: claims fail truth test) शीर्षक की खबर में पाठकों को डिटेंशन सेंटर का फोटो, उनका तथ्यात्मक ब्यौरा देते हुए प्रधानमंत्री के एक इंटरव्यू का निम्न अंश पढ़वाया-असम में एनआरसी के अनुभव से जो तस्वीर बनी है वह बहुत चिंताजनक है। और यदि चिंताजनक है तो देश में उस पर बहस होनी चाहिए। दुनिया में कोई देश कैसे धर्मशाला बने रह सकता है? कौन सा देश है जिसने नागरिकता रजिस्टर नहीं बना रखा है? सवाल उनसे पूछा जाना चाहिए जिन्होने 70 सालो में नागरिकता रजिस्टर नहीं बनवाया, नागरिकों का रजिस्टर नहीं बनाया।

तभी लबोलुआब कि ‘एनआरसी’ क्या महज झूठ है? शहरी नक्सलियों का फैलाया झूठ है या भाजपा का सुविचारित सत्य है? यदि सुविचारित सत्य नहीं होता तो मोदी के भाषण के ठीक 48 घंटे बाद याकि मंगलवार को केबिनेट की बैठक में राष्ट्रीय आबादी रजिस्टर (एनपीआर) पर ठप्पा लगाने की जल्दी क्यों हुई? और एनपीआर क्या एनआरसी की सीढ़ी नहीं होगा? इस पर कल।

3 thoughts on “मोदी, एनआरसी और‘झूठ’

    1. No
      विस्तृत में टिप्पणी निचे देखें।
      कैलाश माहेश्वरी

  1. हरिशंकर जी व्यास

    आपने एक बार फिर टेलीग्राफ अखबार के हवाले प्रधानमंत्री के डिटेंशन सेंटर के वक्तव्य के बारे में झूठ फैला कर अपने पत्रकारिता धर्म को चाटूकारिता की खूँटी पर टांग दिया है। झूठों के सरदार राहुल गांधी की तरह ही आप भी नया इंडिया के पाठकों में भ्रम फैलाने का दुष्चक्र कर रहें हैं वो भी बिना किसी तथ्यपरक जानकारी के टेलीग्राफ अखबार की बैशाखियों के सहारे। किसी अखबार में छपी जानकारी कितनी सही है ये जाने बिना ही आप उसके सन्दर्भ के सहारे देश के प्रधानमंत्री के डिटेंशन सेंटर वाले वक्तव्य को झूठ सिद्ध करने के प्रयास में लग जाये, इतनी स्तरहीन पत्रकारिता पर उतारू हो गये आप चाटूकारिता निभाते निभाते। राजनेता तो बैकफुट पर आ जाते हैं आप तो पत्रकार हैं शास्वत स्तम्भ के पर्याय! क्या आप भी वैसा ही आचरण रखना चाहते हैं पाठकों के समक्ष जैसा देश में विपक्ष कर रहा है बैकफुट पर आकर बिना तथ्यों के अपनी बात को सिद्ध करें। आप पत्रकार हैं चाटूकारिता छोड़कर आपअपना पत्रकारिता पर समर्पित धर्म निभाइये, स्पष्ट और निष्पक्ष रहिये। विषय वस्तु का वो ही पक्ष नही है जो आप जाहिर कर रहे हैंऔर पाठकों को दिखलाना चाह रहें हैं सत्य जिसे आप अपनी शैली से छुपा रहे है वो ही सत्य अन्य अखबार टीवी चैनल सोशल मीडिया स्त्रोतों से प्रस्फुटित हो पाठकों के समक्ष आ ही जाता है पर समयरेखा तो आपको उस अपराधबोध से लिप्त कर ही देगी एकदिन। कचोट और प्रायश्चित्त क्या उस पत्रकारिता के कलङ्क को धो सकेंगे? निरपेक्ष रहिये सापेक्ष नही।

    कैलाश माहेश्वरी, भीलवाड़ा-राजस्थान
    मोबाइल 9414114108

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares