घोंसले का सत्य जानें, भावना में उड़ें नहीं!

बुढ़ी अम्माओं का धरना-2: उड़ना यों आजादी का सुख है और विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र की जिंदादिली। बावजूद इसके भ्रम, झूठ और बिना दिशा के उड़ना भटकना है। जीवन की, जमीन के घोंसले की हकीकत से कोसों दूर होना है। जरा शाहीन बाग (याकि आम मुस्लिम घर का मनोभाव) से रिपोर्ट हुए इन वाक्यों पर गौर करें- कोई भी सरकार अब मुसलमानों के लिए नहीं है। इस उम्र में मैंने लड़ने का फैसला लिया। मैं बहुत कुछ देख चुकी हूं। उन्होंने हमें बांट दिया है। अब शाहीन ने परवाज (उड़ना) की है। हिना ने मोबाइल पर एक मैसेज भेजा- हम लोग यहां पर डटे हुए हैं। जब तक हम लोगों की मांगें पूरी नहीं हो जातीं, हम लोग यहीं रहेंगे। 75 साल की नूर-उन-निसां कहती हैं- मेरा दिल अब सख़्त हो चुका है। अब आप मुझे गोली मार सकते हो। मैं नहीं डर रही हूं। छतरपुर से अपनी दो साल की बेटी के साथ प्रदर्शन में हिस्सा लेने आई मुबीना ने बताया कि उन्हें जब भी समय मिलता है, वे देश और अपनी संस्कृति बचाने के लिए यहां आ जाती हैं।

सोचें, पर्दे में रहने वाली औरतों का यह जज्बा! जाहिर है मुस्लिम मनोभाव में जीवन-मरण का संकट बना है। आर-पार के संर्घष का भभका है। इसको फिर अरूंधति रॉय, कन्हैया, ममता बनर्जी, वामपंथी-प्रगतिशील और सेकुलर बिरादरी से यह हौसलाबंदी प्राप्त है कि ‘पूरा देश आपके साथ है। आप अपनी लड़ाई जारी रखें।’

एक मायने में जिस मनोभाव में मुसलमान है उसी में अरूंधति रॉय, कन्हैया, ममता बनर्जी, वामपंथी-प्रगतिशील और सेकुलर जमात भी है। छटपटाहट, बेचैनी, गुस्सा और जीवन-मरण के भय में आर-पार के संर्घष वाला भभका। सब इस ग्रंथि में हैं कि वक्त ऐसा कैसे आ गया जो हम अप्रासंगिक हैं। अब हमारा मतलब नहीं है। हम समस्या हो गए हैं। वोट राजनीति में, बहुसंख्यक हिंदुओं में, मीडिया में, सामाजिक व्यवहार में हम समस्या बन गए हैं। हमारा खान-पान समस्या, हमारा पहनावा समस्या, हमारी नागरिकता समस्या!  मतलब हमें घेर-घेर कर ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया गया है, जिसमें हम अपना रोना रोएं तो कैसे रोएं! एक सुधी मुस्लिम जन मोहम्मद आसीम का पिछले दिनों इंडियन एक्सप्रेस में लेख पढ़ने को मिला। ‘मैं एक मुसलमान भारतीय और मैं नहीं कोई समस्या!’ के शीर्षक में जनाब का सार था कि – इस देश में सरकार, टीवी मीडिया, सोशल मीडिया सबने मुसलमान की वह घेरेबंदी बना डाली है, जिसका लब्बोलुआब असहिष्णुता, नफरत का शोर है। समस्या मैं नहीं हूं, बल्कि यह नफरत है! क्यों टीवी चैनल्स मुसलमानों पर बहस में हर दिन पगलाए रहते हैं, यह पगलाहट समस्या है न कि मैं समस्या हूं। कौन बोल रहा है ये जुमले- ‘हिंदू खतरे में’, ‘राहुल का मुस्लिम प्रेम’, ‘कांग्रेस मुस्लिम पार्टी है’, ‘राहुल के कंधे पर जनेऊ, दिल में जिन्ना’, ‘मुसलमानों के वोट बैंक की राजनीति’ आदि आदि। ऐसे भटकाना समस्या है न कि मैं समस्या हूं।….फिर उन्होंने आखिर में लिखा- साथी देशवासियों मुझसे बात करो। मुझे न समझो पागलों के जरिए। संवाद करो। नफरत के उस शोर से बाहर निकलो, जिसमें कुछ सुना नहीं जा रहा है। शुरू करो एक संवाद। एक मुसलमान से बात करो।

यह पीड़ा अपने को आज के भारत में अरूंधति रॉय, कन्हैया, ममता बनर्जी, वामपंथी-प्रगतिशील और सेकुलर जमात की भी समझ आती है। सचमुच वक्त का सत्य है कि आजाद भारत के 72 साल के इतिहास में सन् 2014 तक देश सेकुलर आइडिया ऑफ इंडिया में रंगा-पुता-चिल्लाता हुआ था, जिसमें हर कोई मुसलमान से संवाद लिए हुए, उनकी चिंता करते हुए था और छह वर्ष उलटी धारा, मोदी-शाह के आइडिया ऑफ इंडिया का हुआ नहीं, भारत भगवा कुछ बना नहीं कि शाहीन के परवाज (उड़ने) की नौबत आ गई! जीवन-मरण, आर-पार के संर्घष की नौबत आ पड़ी! संवाद की तरस बन गई!

सिर्फ पांच-छह साल का हिंदू शोर, हिंदू राजनीति, हिंदू वोटों की हिंदू भक्ति, हिंदू नेताओं के सत्ता दुरूपयोग में सत्ता के कुछ फैसलों पर हताशा में यह तक सोच लेना कि ‘कोई भी सरकार अब मुसलमानों के लिए नहीं है’…या ‘देश और अपनी संस्कृति बचाने के लिए लड़ने जैसी बातें!

सोचें, 65 साल सेकुलर भारत, सेकुलर मीडिया, सेकुलर सत्ता, सत्ता में प्रगतिशीलता-मुस्लिम भागीदारी, तुष्टीकरण सब कुछ था। उन 65 वर्षों में लोकतंत्र और चुनाव में सत्ता के आने-जाने का अनुभव भी है तब भी यह भरोसा अपने आप क्या नहीं बना होना चाहिए कि हमारा वक्त भी लौटेगा। कानून बनता है तो बदला भी जाता है। मतलब बेसिक बात लोकतंत्र के सत्य और उसके अनुभव की है। सेकुलर डेमोक्रेसी के नैरेटिव-शोर ने 65 साल हिंदू के घर-घर मैसेज बनवाया कि भाजपा, संघ, हिंदुवादी खतरा हैं, अछूत हैं। अब यदि पांच साल से मीडिया और हिंदू सत्ता मुसलमान को खतरा या अछूत बना दे रही है तो जीवन-मरण, आर-पार के संर्घष की भला क्यों सोची जानी चाहिए? संघ-भाजपा-हिंदुवादियों ने भी अपने वक्त के लिए धैर्य रखा, दस तरह के संकट झेले, पापड़ बेले। एक वक्त था जब हिंदू, हिंदी, हिंदुस्तानी की बात करना, हिंदू होना समस्या था, आंतकवाद था और आज यदि मुसलमान होना समस्या है तो यह वक्त के चलते, वक्त की कसौटी से है, जिसमें देवबंद के मौलानाओं को, शाहीन बाग में महिलाओं को, मोहम्मद आसीम को सीपीएम-सीपीआई के कॉमरेडों को सोचना चाहिए कि ऐसा वक्त क्यों आया? क्यों मोदी-शाह सुन नहीं रहे हैं, निष्ठुर हैं और क्यों दुनिया में बाकी जगह भी डोनाल्ड ट्रंप, पुतिन, शी जिनफिंग से ले कर बॉरिस जॉनसन सब सेकुलर आइडिया में मुसलमान को हाशिए में रखे हुए हैं?

मैं भटक रहा हूं। बुनियादी सत्य लोकतंत्र है। इस लोकतंत्र में जुम्मे के बाद सड़कों पर प्रदर्शन या शाहीन बाग में औरतों, बूढ़ी महिलाओं का धरने-प्रदर्शन पर स्थायी तौर पर बैठना उड़ना नहीं, लोकतंत्र की जीवंतता नहीं, बल्कि भटकना, अपनी जमीन, अपने घोंसले की बरबादी है। यह झूठ सौ टका है कि सीएए, एनपीआर या एनसीआर से मुसलमानों की नागरिकता खतरे में आएगी। कतई नहीं। हां, नागरिकता संशोधन कानून से मुसलमान शरणार्थी के प्रति भेदभाव का जरूर प्रावधान बना है। भेदभाव की शुरुआत हुई है। यह सत्य है और इसका राष्ट्र-राज्य के संदर्भ, उसकी तासीर, उसके मनोविज्ञान में कई अर्थ हैं लेकिन भारत के बीस करोड़ मुसलमानों की नागरिकता पर इससे रत्ती भर असर नहीं होना है। बीस करोड़ मुसलमान न शरणार्थी हैं न शरणार्थी करार दिए जा सकते हैं। यदि मोदी-शाह-हिंदुवादी ऐसा सोचें या चाहें तो उलटे मुसलमानों को, सेकुलरों को मजा लेना चाहिए। यहीं नहीं मोदी सरकार को चुनौती देनी चाहिए कि सीएए को असम में ही लागू कर वहां चिन्हित मुस्लिम घुसपैठियों को बांग्लादेश लौटा कर जरा बताएं!

सचमुच मुसलमान क्यों चिंता करे कि वह घुसपैठिया करार दिया जाएगा या वह समस्या है या उसे समस्या माना जा रहा है? और मान लें हिंदू राज की मूर्ख तासीर में सब मुसलमानों को घुसपैठिया बताया जाने लगे तब भी मुसलमान का क्या घबराना! क्या दस्तावेज तलाशना? मतलब दस्तावेज बनवाना, पेश करना हिंदुओं को अधिक करना होगा? क्यों फिजूल की मुसलमान ऐसी चिंता पालें कि उनके हक मारे जाएंगे या अरब सागर में डुबोया जाएगा या पाकिस्तान भेजा जाएगा!

फिजूल की बातें, फिजूल का भय और फिजूल हल्ला। तभी अपना कल वाला तर्क फिर है कि वक्त से जो हकीकत जाहिर हुई है और इस देश के बहुसंख्यक वर्ग याकि लोकतंत्र में लोक की भावना का जो सियासी भगवा रंग बना है उसे मुसलमान को, अरूंधति रॉय, कन्हैया, ममता बनर्जी, वामपंथी-प्रगतिशील और सेकुलर जमात को समझना चाहिए। देश की हिंदुवादी दशा-दिशा का वक्त जिन आंकाक्षाओं को लिए हुए है वह इस जमीन की मूल धड़कन है, इस सत्य को उन्हें मान्यता देनी होगी और उसी के दायरे में फिर लोकतंत्र से अपना वक्त बनवाना है। जिसे चाहें तो आप मलेशिया के उदाहरण से समझ सकते हैं। आप सोच सकते हैं कि भला मलेशिया कैसे हिंदुवादी सांचे में फिट होता है तो इस पर कल।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares