भारत के बीहड़ में टाटा ट्रस्ट!

भारत में कारोबार कैसा मुश्किल है और अच्छे-अच्छों को भी कैसे जूझना पड़ता है इसकीकथा अंतहीन है। समकालीन याददास्त में ही अनेक ऐसे मामले हैं (प्रणब मुखर्जी के पिछली तारीख से टैक्स लगाने के वोडोफोन किस्से से ले कर हाल में टेलकॉल कंपनियों को सुप्रीम कोर्ट से सालों बाद देनदारी मिलना) जिनकी किस्सागोई को यदि क्रमवार लिखा जाए तो इस शीर्षक का महाग्रंथ बनेगा कि भारत दुनिया का नंबर एक बीहड़!

आज एक और खबर मिली। टाटा के ट्रस्टों ने आयकर विभाग को लिखा है कि उन्हंे धर्मादा करने के लिए टैक्स छूट नहीं चाहिए और यदि विभाग ने अपनी निकाली टैक्स देनदारी में जबरदस्ती की तो हमें अपना आपरेशन बंद करना होगा! प्रथम दृष्टया गंभीर खबर है यह! द इकॉनोमिक टाइ्म्स ने पहले पेज पर दूसरी लीड के साथ जिस विस्तार से टाटा संस, टाटा ट्रस्ट का 2013 से इनकम टैक्स का पंगा बताया है उससे पता पड़ता है कि भारत राष्ट्र-राज्य की व्यवस्था, नौकरशाही, उसके विभाग कैसे ठूंठ अंदाज में काम करते हैं। निसंदेह सिक्के के दो पहलू होते हैं। टाटा ग्रुप का पक्ष है तो इनकम टैक्स, सीएजी आदि का भी होगा। लेकिन मोटी बात यह है कि टाटा की कंपनियों, उसके ट्रस्टों का भारत में अच्छा मतलब माना जाना चाहिए। हो सकता हैं मैं गलत हूं लेकिन अपना मानना है कि टाटा के ट्रस्टों ने कारोबार, निवेश, शिक्षा, चिकित्सा, सार्वजनिक सेवा, समाज कल्याण, पारसियों के कल्याण आदि में जो धर्मांदा किया है, अपनी कमाई-मुनाफे से जो संस्थाएं बनाई, जो ब्रांड बनाए, वैसा भारत में किसी और औद्योगिक घराने या ट्रस्ट ने काम नहीं किया। अंबानी-अदानियों के क्रोनी पूंजीवाद में टाटा ट्रस्ट और टाटा कंपनियों की उपस्थिति साफ-सुथरेपन, प्रोफेशनलिज्म और वैश्विक मापदंडों पर भारत का निखरवाता एक विश्वास है।

फिर रतन टाटा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के यहां भी रसूख रखते हैं। टाटा ग्रुप, टाटा ट्रस्ट, टाटा संस के पास वे तमाम साधन, एकाउंटिग कंपनियां, एजेंसियां, लॉ फर्म भी होंगे जिससे सरकार को, इनकम टैक्स विभाग को समझाया जा सके, उनके आगे अपना पक्ष रखा जा सके। मतलब यदि टाटा संस, टाटा ट्रस्ट आयकर विभाग को नहीं समझा सकता है तो भारत में दूसरा कौन समझा सकता है? उस स्थिति में निष्कर्ष बनेगा कि या तो टाटा ट्रस्ट गलत है या आयकर विभाग गलत हैं? इस मुकाम पर फिर हकीकत उभरेगी कि भारत की नौकरशाही, सरकार के सिस्टम, इनकम टैक्स विभाग के आगे कौन जीत पाया है?भारत में काम करना न टाटा के ट्रस्टों के लिए आसान है और न चासंलर मर्केल की जर्मन कंपनियों के लिए आसान है!

अब जरा खबर की रूपरेखा जानी जाए। 31 अक्टूबर को मुंबई के प्रमुख आयकर आयुक्त ने टाटा के छह ट्रस्ट- जमेशदजी टाटा ट्रस्ट, आरडी टाटा ट्रस्ट, टाटा सोशल वेलफेयर ट्रस्ट, सार्वजनिक सेवा ट्रस्ट, नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट का रजिस्ट्रेशन इनकम टैक्स एक्ट के उल्लंघन के आरोप में रद्द किया। इस पर फिर इन छह ट्रस्टों की तरफ से जवाब है कि – इस बात का महत्व समझे कि ट्रस्ट बनाए गए धर्मादा कामों के लिए है। ट्रस्ट की धर्मादा पहचान आयकर विभाग के रजिस्ट्रेशन की बदौलत नहीं है। रजिस्ट्रेशन से महज कुछ लाभ मिलता है क्योंकि धर्मादा कर रहे हैं। … मगर यदि लंबे कानूनी विवाद के बाद हमें विभाग के निकाले बकाया के लिए मजबूर किया गया तो हमें बोरिया-बिस्तर बांधना होगा और वह देश के लिए नुकसान होगा!

सोचंे,हताशा के चरम वाले इस अंदाज पर! खबर अनुसार आयकर विभाग ने डिमांड नोटिस नहीं भेजा है लेकिन सूत्रों के अनुसार इन ट्रस्ट को इनकम टैक्स एपीलेट ट्राईब्यूनल (आईटीएजी) में अपील करने से पहले कोई बारह हजार करोड़ रू की निकाली डिमांड का बीस प्रतिशत तो जमा करना होगा। यह भी कयास है कि संभावी देनदारी में टाटा ट्रस्ट को भी अपने शेयर बेचने पड़े। ध्यान रहे यही टाटा ट्रस्ट फिर बाकि ट्रस्टों याकि टाटा संस अदि में 66 प्रतिशत शेयर लिए हुए है। रतन टाटा इसके अध्यक्ष हंै तो उनके साथ उनके ट्रस्टी।

जुलाई में आयकर विभाग ने टाटा ट्रस्ट को नोटिस सर्व कर पुराने एसेसमेंट को खोलते हुए जवाब तलब किया था कि क्यों ट्रस्टों ने 2015 में रजिस्ट्रेशन सरेंडर किया? इसलिए रजिस्ट्रे्शन अब रद्द है तो फिर एक्ट के एक सेक्शन के अनुसार इकठ्ठा या एक्रीटेड आय अनुसार टैक्स अदा करें। कर विभाग ने दो आधार पर रजिस्ट्रेशन रद्द करने की कार्रवाई शुरू की थी। एक तो यह कि ट्रस्टों ने ग्रुप कंपनी में पैसा निवेश किया जिस पर 1971 से पाबंदी है। विभाग की दूसरी दलील थी कि ट्रस्ट अपने उद्देश्य अनुसार काम नहीं कर रहे थे जबकि टाटा ट्रस्ट का जवाब है कि सारे ट्रस्ट अपने-अपने मकसद, घोषणा, माफिक काम करते हैं।

दरअसल टाटा ट्रस्ट पर 2013 से सीएजी ने नजर लगाई हुई है। सीएजी ने दो ट्रस्टों द्वारा कोई तीन हजार करोड़ रू के गलत निवेश की बात निकाली। उस नाते उसने कहा कि आयकर विभाग ने इन ट्रस्टों को अनियमिति टैक्स छूट दी हुई है इससे सरकार को रेवेन्यू का नुकसान हुआ है। कुछ ट्रस्ट के पास टीसीएस याकि टाटा कंपनियों के शेयर हैं। सीएजी अपनी टिप्पणी के बाद आयकर विभाग से लगातार पूछता रहा कि क्या कार्रवाई हुई? 2015 तक मामला इनकम टैक्स की इग्ज़िम्प्शन विंग के पास था। इन ट्रस्टों ने छूट का लाईसेंस सरेंडर करने के बाद रिर्टन असेस्मैन्ट् विंग में देना शुरू किया। जून 2016 में एक्ट के नए प्रावधान अनुसार मान्य ‘ऐक्रीटेडइनकम’ क्योंकि 2015 में मान्य नहीं थी सो सीएजी ने उस बात को पकड़ इनकम टैक्स विभाग से कार्रवाई को कहा।

ट्रस्ट के पास ग्रुप कंपनी याकि टीसीएस आदि के शेयर होने पर टाटा की सफाई है कि ये कॉरपस डोनेशन से आए है। पैसा निवेश करके शेयर नहीं लिए हुए है। इससे मिलने वाला डिविडेंड ट्रस्ट के धर्मादे में लगता है।

लबोलुआब कि टाटा ट्रस्ट और उसके तमाम ट्रस्ट सीएजी और आयकर विभाग की नजर लगने से झगड़े में फंसे हैं। उन्हंे धर्मादा करना महंगा पड़ रहा है। हाकिमशाहों की नजर लगी तो ट्रस्ट को रजिस्ट्रेशन के साथ भी दिक्कत हुई और रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने के बाद भी परेशानी है। टाटा के टॉप मेनेजमेंट, भारी-भरकम विधीवेताओं की सलाह, लॉबिंग कोई काम नहीं आई। हैरानी का पहलू है कि सीएजी याकि राजीव महर्षि की टीम ने टाटा ट्रस्ट पर नजर गढ़ा कर, इनकम टैक्स को इस कदर मजबूर किस मकसद से किया जो ट्रस्टो ने रजिस्ट्रेशन सरेंडर किया और अब नौबत यह है कि टाटा ट्रस्ट अपने शेयर बेचने की शंका बनवा रहा है!

जो हो, टाटा ग्रुप और उसके ट्रस्ट बनाम भारत का सिस्टम, विभाग, नौकरशाह लंबी लड़ाई में समर्थ है। अंत में दस-बीस हजार करोड़ रू इधर से उधर ट्रांसफर हो जाएंगे। लेकिन यही तो आजाद भारत की अनंत कथा है। भारत के नौकरशाह, नौकरशाहों की संस्थाएं यह नहीं समझती कि यदि हजारों करोड़ रू का मामला है तो उसे एक-दो साल में तुरंत निपटाएं। ताकि कारोबार करने वाले तुरंत फैसला ले सके। तुरंत रीति-नीति बने। जैसे अभी सुप्रीम कोर्ट का फैसला हुआ कि दशक बाद टेलकॉम कंपनियों की देनदारी निर्णायत्मक बनी और उनका दीवाला निकलने वाला है या प्रणब मुखर्जी ने पिछली तारीख से टैक्स थौप विदेशी निवेशकों को भारत से भगाया और फिर सालों लोगों को आश्वस्त करने में बरबाद हुए।

तभी तो हम दुनिया के कंपीटिशन से भागे हुए हैं। याद करें अभी-अभी हम आरसीईपी से कैसे भागे हैं!

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