बूढ़ी अम्माओं का धरना!

कई दिनों से जहन में दिल्ली के शाहीन बाग में धरने पर बैठी 75 सालानूर-उन-निसांसहित उन बुजुर्ग महिलाओं के चेहरे घूम रहे हैं, जो कड़कड़ाती ठंड-सर्द रातकी परवाह न करते हुए इस ख्याल में हैं कि-ये हमारे उड़ने का समय है। हम शाहीन हैं! शनिवार को उनके बीच अरूंधति रॉय को देखा और वह खबर भी देखी कि संशोधित नागरिकता कानून का नोटिफिकेशन हो गया है। मतलब सीएए बाकायदा अस्तित्व में! क्या निष्कर्ष निकालें? क्या यह नहीं कि एक तरफ अहंकार और दूसरी तरफ अम्माओं का मोहरा बनना! भारत माता की त्रासदी है, जो सत्ता की राजनीति में बूढ़ी अम्मा के उपयोग से भी नहीं हिचका जाता! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी अम्मा के साथ फोटो शूट की सियासी मैसेजिंग से नहीं हिचकते हैं तो विरोधी जन बूढ़ी अम्माओं को ऊंचाई पर उड़ते हुए शिकार करने वाला सफेद बाज उर्फ शाहीन बना गौरवान्वित महसूस करते हैं। कोई कह रहा है शानदार आंदोलन तो कोई कह रहा है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल, इतिहास रच रही हैं ये औरतें!

मुझे विश्व के सबसे लंबे, कोई 16 साल अनशन करने वाली मणिपुर की इरोम चानू शर्मिला का, नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर का चेहरा याद हो आया!इनके अनशन-धरने का वक्त कांग्रेस-सेकुलर सरकारों का था तो आज वक्त हिंदू सत्ता का है। पर नियति में तब-अब का फर्क नहीं आना है। बहुत संभव है शाहीन बाग में महिलाएं अपने बच्चों के साथ धरने पर महीनों-सालों बैठी रहें। पर भारत राष्ट्र-राज्य, नरेंद्र मोदी और अमित शाह एक इंच पीछे नहीं हटने हैं! हां, मैं भारत राष्ट्र-राज्य की बात कर रहा हूं। मतलब यदि दिल्ली में कभी आगे कांग्रेस-सेकुलर-लेफ्ट सरकार बनी तो वह भी मोदी सरकार के नागरिकता संशोधन कानून को संसद से यह कहते हुए नहीं बदलवा सकेगी कि आगे से मुसलमान शरणार्थियों को भारत वैसे ही नागरिकता देने का फैसला करता है, जैसे हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध आदि मतावलंबियों को नेचुरल तौर पर देने का मोदी सरकार का बनवाया कानून है। क्या कांग्रेस में, ममता बनर्जी में ऐसा करते हुए अगला लोकसभा चुनाव लड़ने की हिम्मत है? क्या कांग्रेस में, ममता, मायावती, अखिलेश आदि में हिम्मत है कि मोदी-शाह ने अपने एजेंडे के हवाले जो-जो कथित पाप किए हैं उन्हें वे मिटाने का वायदा चुनाव घोषणापत्र में करेंगे? क्या ये जम्मू-कश्मीर को वापस पहले जैसा सेकुलर प्रयोग बनाएंगे, अनुच्छेद-370 को बहाल करेंगे, अयोध्या में मंदिर रूकेगा या तीन तलाक कानून रद्द होगा या असम की एनआरसी को कूड़ेदानी में फेकेंगे?

अरूंधति रॉय ने शाहीन बाग में कहा कि ‘पूरा देश आपके साथ है।आप अपनी लड़ाई जारी रखें।’ सोचें, क्या ऐसा कहना झूठ, बरगलाना नहीं है? और झूठ भयावह है। बूढ़ी अम्माओं के साथ, महिलाओं के साथ, मुसलमानों के साथ, कौम के साथ, राष्ट्र-राज्य सबसे झूठ है। क्योंकि सत्य है कि जो कुछ है या हुआ है वह भारत के संविधान के दायरे में है। पूरा देश यदि शाहीन बाग के साथ होता तो नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बने होते। भाजपा की सरकार नहीं होती। अमित शाह संसद से नागरिकता संशोधन बिल पास नहीं करवा पाते। भारत का जो संविधान है वह लोकतंत्र, चुनाव की व्यवस्था लिए हुए है। चुनाव वहीं जीतता है, जो बहुसंख्यक वोट पाता है। और बहुसंख्यक वोटों से जीती सरकार को संविधान में संशोधन-परिवर्तन का अधिकार है। पहले भारत के संविधान में सेकुलर शब्द नहीं था, इमरजेंसी में संसद में अपने बहुमत से इंदिरा गांधी ने वह शब्द डलवाया तो ऐसा करना संविधान सम्मत था तो मोदी-शाह सरकार को भी वैसे ही संविधान संशोधन का अधिकार है, जैसे इंदिरा गांधी को है। ऐसे ही यदि आगे कांग्रेस-लेफ्ट-विपक्ष की कभी सरकार बनी तो वह अपने बहुमत से सीएए, एनआरसी, नागरिकता कानून में संशोधन ला कर इन्हें खत्म भी कर सकती हैं। लेकिन क्या शाहीन बाग की बूढ़ी अम्माओं को कोई ऐसे समझा रहा है?

संदेह नहीं समझाने का पहला दायित्व सरकार का, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का है। लेकिन वे समझाने के बजाय एक इंच पीछे नहीं हटने, विपक्ष के गुमराह करने, विपक्ष को चुनौती देने की एप्रोच लिए हुए हैं तो इसलिए कि अरूंधती रॉय, कन्हैया, लेफ्ट और मुस्लिम विरोध की आकाश में जितनी उड़ती हुई शाहीन दिखेगी, जितना लंबा और घना हल्ला और विरोध होगा उतने कांग्रेस, अखिलेश, मायावती याकि पूरा विपक्ष बहुसंख्यक वोटों से दूर होता जाएगा! मोदी-शाह को अशांति से रत्ती भर घबराहट नहीं है। जामिया में, जेएनयू में ठुकाई-पिटाई भी इस बात का प्रमाण है कि जितना गुस्सा, नाराजगी, विरोध बनेगा उतनी सत्ता पक्ष की बांछें खिलेंगी!

हां, यह सत्य, दो टूक सत्य है! तभी शाहीन बाग का धरना या मुसलमानों का विरोध-प्रदर्शन अपने हाथों अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारना है। पर ऐसे मुसलमान, वामपंथी-प्रगतिशील और वह सेकुलर जमात नहीं सोचती है, जो शाहीन बाग से विरोध की शानदार तस्वीर, फुटेज और नया ब्रांड खिलता हुआ पा रही है। किसी को यह चिंता नहीं है कि इससे अंततः क्या हासिल होगा?

क्या हासिल होने का मेरा सवाल राष्ट्र-राज्य के संदर्भ में है तो मुस्लिम समाज व हिंदू बनाम मुसलमान याकि नागरिकों में परस्पर सबंधों के संदर्भ में भी है। मैं शाहीन बाग में बैठी बूढ़ी अम्माओं और जुम्मे की नमाज के बाद सड़कों पर उतर आते लोगों के चेहरों व अच्छे-खासे पढ़े-लिखे मुसलमानों की अभिव्यक्तियों में यह मसला बनते बूझ रहा हूं किमानो ये मान रहे हों कि अब तो आर-पार की लड़ाई लड़नी ही है। निश्चित ही इसके पीछे नागरिकता का डर निर्णायक तौर पर बहुत गहरा और गंभीर है। बूढ़ी अम्माओं, महिलाओं के चेहरों के पीछे की चिंता और दर्द में नागरिकता कानून से नींद उड़ने का सत्य निर्विवाद है।

इसलिए मेरा, आपका, सरकार का, हर नागरिक और खासकर राष्ट्रवादियों, हिंदू राष्ट्रवादियों का कर्तव्य है कि बूढ़ी अम्माओं को, शाहीन बाग की महिलाओं को बताएं, समझाएं कि उनकी नागरिकता को, इस देश में उनके जीने को इंच भर, सूत भर खतरा नहीं है। कह सकते हैं कि भारत राष्ट्र-राज्य का हाल-फिलहाल नंबर एक संकट है, जो मीडिया का शोर मुसलमान की चिंता को चौतरफा सुलगा रहा है, जिसके असर में बूढ़ी अम्मा या पढ़ा-लिखा अंग्रेजीदां मुसलमान सब मान रहे हैं कि मोदी-शाह सरकार जो कर रही है और बहुसंख्यक हिंदू जैसा सोच रहा है वह भारत को वैसा पाकिस्तान बनवा देने वाला है, जिसमें दूसरे धर्म का और खास कर इस्लाम का मतावलंबी चैन से नहीं रह सकता।

अम्मी जान, इस तरह की छोड़ोचिंता। जरूरत नहीं है सफेद बाज उर्फ शाहीन बन कर उड़ने की। बल्कि जमीन पर ही रहते हुए इस सत्य में जीना है कि जीना यहां मरना यहां। हिंदू यदि अपना हिंदू राष्ट्र बना रहे हैं तो वह मुसलमान को साथ ले कर है। वैसे ही जैसे मलेशिया इस्लामी राष्ट्र होते हुए भी सेकुलर देश बना हुआ है। नागरिकता संशोधन कानून से किसी की नागरिकता खत्म नहीं होगी और यदि आगे एनआरसी भी आया तो हिंदू भी लाइन में लग कर दस्तावेज देगा तो मुसलमान भी देगा। उसकी भगदड़ में हिंदू ज्यादा लावारिस की तरह घूमता मिलेगा, जबकि बूढ़ी अम्मा हो या मदरसाई बच्चे उन सबको कौम की सामुदायिकता का सहारा होगा। सीएए, एनपीआर, एनआरसी या तमाम हिंदू एजेंडे पर मोदी-शाह पूरी तरह यदि फैसले कर भी लें तब भी भारत का चरित्र पाकिस्तान जैसे धर्मांध देश वाला नहीं बनेगा। भारत वहीं रहेगा जो नेहरू के वक्त से चला आ रहा है, वह मलेशिया जैसा भी नहीं बन सकता है, जो अपने को कहता सेकुलर है मगर है आधिकारिक धर्म इस्लाम को लिए हुए है! क्या यह बात शाहीन बाग में धरने पर बैठी बूढ़ी अम्माओं और महिलाओं को कोई समझाएगा? क्या इस अंदाज में बेसिक सत्य नरेंद्र मोदी और अमित शाह अपनी प्रजा को नहीं समझा सकते है?(जारी)

One thought on “बूढ़ी अम्माओं का धरना!

  1. They know that their citizen ship is not in danger. They are fighting with MODI govt to defame and they are fighting that how Hindus can come to india from neighbouring countries when their brothern are now being denied. They are asserting for their right to migration of bangladeshis.

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