सोनिया गांधी को कौन समझाए!

कांग्रेस में दम लौटे, वह विकल्प बने, यह आज देश की नंबर एक जरूरत है। 130 करोड़ लोगों, 90 करोड़ मतदाताओं में यदि मोदी-शाह के नैरेटिव का विकल्प नहीं हुआ तो भविष्य में औवेसी जैसे जो विकल्प बनेंगे उसकी कल्पना ही दहलाने वाली है। सोचे औवेसी से नैरेटिव बने और कांग्रेस से नहीं तो देश का क्या बनेगा? और तथ्य है कि बिना नैरेटिव, बिना डुगडुगी के विकल्प बन सकना संभव नहीं। जनता लोकल, प्रादेशिक स्तर पर भले बिना विकल्प के गुस्सा निकाल भाजपा को झटका दे सकती है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर, हिंदू-मुस्लिम, पाकिस्तान की चिंताओ में मतदाताओं और खास कर हिंदू मानस के आगे विकल्प तभी होगा जब वैकल्पिक नैरेटिव और चेहरा अखिल भारतीय स्तर पर हो। लेकिन इन बातों को कौन सोनिया गांधी को समझाए? उन्हे कौन समझाए या पूछे कि शनिवार को भारत बचाओ रैली से उन्हे और उनकी कांग्रेस को क्या हासिल हुआ?सोचंे, अगले दिन क्या सुर्खियां छपी? क्या राहुल गांधी के बयान की यह सुर्खी नहीं कि वे सावरकर नहीं जो माफी मांगे! ऐसे ही रैली की कैसी तस्वीर, फुटेज दिखलाई दी? तो सोनिया, राहुल, प्रियंका के तीन विशाल हार्डिंग्स और तीनों के भाषणों की क्लिपिंग!

क्या इससे देश बचेगा और कांग्रेस देश का विकल्प बनेगी? यह तो उलटे प्रधानमंत्री मोदी-अमित शाह की हिंदू राजनीति, वंशवाद के खिलाफ उनके नैरेटिव को बढ़वाने वाला है। हिसाब से सोनिया गांधी को या गांधी परिवार को देश बचाने की नहीं बल्कि फिलहाल अपने को बनाने, कांग्रेस को बचाने की प्राथमिकता में चिंता करनी चाहिए। सोनिया गांधी को सोचना चाहिए कि यदि 2024 में भी कांग्रेस हारी तो फिर उनके परिवार और पार्टी का बचेगा क्या? और मौजूदा दशा में कांग्रेस के 2024 में भी बुरी तरह हारने के लक्षण गहरे हैं। कांग्रेस के पास है क्या जो वह देश को बचाने का नैरेटिव बनवा अपने विकल्प की हवा बनाए?कौन से चेहरे हैं, कौन सी विचारधारा है जो मोदी-शाह और हिंदू राष्ट्रवाद के आगे 2024 में हिट हो और हिंदुओं में कांग्रेस के विकल्प की हवा बने?

क्या राहुल गांधी या सोनिया-राहुल-प्रियंका की त्रिमूर्ति को लोग पूजेगे? क्या राहुल गांधी से वह जादू बनेगा जिससे पूरे देश में हवा बने कि वाह क्या नेता है!क्या लोग कभी सोच सकेंगे कि राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने से देश के अच्छे दिन लौटंेगे!

हां, कांग्रेस का, विपक्ष का संकट है जो नरेंद्र मोदी के आगे हिंदुओं के अखिल भारतीय पैमाने पर न राहुल क्लिक है और न पी चिंदबरम याअहमद पटेल या शरद पवार या मायावती, अखिलेश में कोई क्लिक हो सकता है।  उस नाते अपना तर्क है कि भारत अपने आप बचेगा या तभी बचेगा जब विपक्ष बचे! और विपक्ष तब बचेगा जब कांग्रेस बचे। और वह तब संभव है जब सोनिया, राहुल गांधी और अहमद पटेल समझंे! लेकिन ये तीनों नहीं समझेंगे। ये तीन नेता उस मोड में हंै जिसमें कांग्रेस न जिंदा होनी है और न मरनी है!  बात-बात में सौ टका सटीक वाक्य बना है कि पूरा संकट सोनिया, राहुल, अहमद पटेल की समझ का है। कांग्रेस बरबाद है, खत्म है, उठ नहीं पा रही है, विकल्प नहीं बन पाएगी तो पहली वजह सोनिया गांधी का राहुल व अहमद पटेल दोनों को छोड़ना नहीं है।और दोनो अनचाहे-अनजाने कांग्रेस की बरबादी का प्रण लिए हुए हंै।

यही कांग्रेस की, पूरे विपक्ष के बरबाद रहने की अंदरूनी कथा का सत्व-तत्व है। देश और विपक्ष का दुर्भाग्य, मोदी-शाह का भाग्य जो फिर चर्चा है कि मार्च में राहुल गांधी री-लांच हो रहे हंै। सोनिया गांधी बतौर मां दिल और दिमाग से मजबूर हैं जो वारिस राहुल गांधी ही। राहुल गांधी ही उत्तराधिकारी, प्रियंका नहीं।

सो सोनिया गांधी की पहली जिद्द राहुल गांधी है। तो राहुल गांधी भी अपनी जिद्द लिए हुए हैं। कुछ वैसे ही  जैसे संपन्न परिवारों की तीसरी पीढ़ी के बच्चे करते हंै। 2008 से 2019 के बीच राहुल गांधी का पूरा व्यवहार जिद्दी रहा। तभी वे न मंत्री बने, न प्रधानमंत्री बने न समय पर कांग्रेस अध्यक्ष। उन्होने काबिल बनने-दिखलाने के बजाय पूरा वक्त कांग्रेस के भीतर, सोनिया गांधी से लड़ते हुए, अहमद पटेल की कमान के पुराने कांग्रेसियों को बेईमान-बेकार मानते हुए अपने अंदाज में पार्टी को, यूथ कांग्रेस, एनएसयूआई को बनाने के फितूर में पार्टी और खुद दोनों को बरबाद किया।मतलब मैं ही समझदार, मुझे ही टीम बनानी, मेरे साथी लड़के ही ईमानदार-सच्चे और वफादार! सचमुच राहुल गांधी उस नौजवान पीढ़ी के प्रतिनिधि है जिसने संर्घष नहीं किया, जिसने पढ़ा-समझा नहीं, जिसने अपने आपको प्रभावी वक्ता, धेर्य से सुनने वाला, धर्म और जाति की बारीकियों को बूझ सकने में समर्थ, वक्त की नजाकत समझने वाली समझदारी बनाने- सीखने की लगन नहीं बनाई। इसके बजाय मां के आगे ठुनकते हुए जिद्द में चले कि कांग्रेस चलाऊंगा तो अपने हिसाब से! मैं और मेरे वेणूगोपाल, मिलिंद तेवड़ा, तंवर, सचिन, सिंधिया, राजू, प्रवीण, अंकल पित्रोदाजैसे ही  कांग्रेस के जमीनी नेता और उन्ही से कांग्रेस जीतेगी।

तो सोनिया गांधी की जिद्द, राहुल गांधी की जिद्द और फिर अहमद पटेल की जिद्द। हां, कांग्रेस के मौजूदा मुकाम में पहुंचने और अटकने में अहमद पटेल का रोल मामूली नहीं है। अपना मानना है कि आजादी के बाद कांग्रेस की बरबादी में इंदिरा गांधी का नेतृत्व एक फेज था। दूसरा फेज राजीव गांधी की दून स्कूल की छाप से था। तीसरा फेज सोनिया गांधी की अध्यक्षता, मनमोहनसिंह सरकार के दस सालों में अहमद पटेल की मैनेजरी  का है। अहमद पटेल ने सोनिया गांधी को ऐसी राजनैतिक सलाह दी कि न पुराने जमीनी नेता बचे और न नए जमीनी तैयार हुए। सत्ता-संगठन में ऐसे मैनेजर बैठाए-बढाए जिससे नेता अरबपति हुए लेकिन पार्टी कंगाल। सीताराम केसरी तक पार्टी पैसे के मामले में, नेताओं की नई पौध बनने-बढ़ने में सेहतमंद थी। न ही मुस्लिम तुष्टीकरण में बरबाद थी लेकिन सोनिया गांधी पर अहमद पटेल का शुरू से ही ऐसा मायावी जादू हुआ जो पार्टी सूखी, कंगली हुईतो मुस्लिमपरस्त भी!

इसे राहुल गांधी ने समझा। तभी अहमद पटेल से नफरत पाली और मैनेजरों से पार्टी को मुक्त कराने, अहमद पटेल को काटने, उनके सेटअप की जगह सीपी जोशी, मोहनप्रकाश, दिग्विजयसिंह जैसे जमीनी समझदारों को महासचिव बनाने से शुरूआत की लेकिन अहमद पटेल ने इन सबको फेल बनाया। ये फेल तो राहुल गांधी भी फेल। हकीकत है कि मोदी-शाह ने राहुल गांधी को उतना फेल नहीं बनाया जितना कांग्रेस के भीतर अहमद पटेल की पेंतरेबाजी से वे फेल हुए।

सचमुच कांग्रेस के हर जानकार नेता को पता है कि राहुल और अहमद पटेल में कैसे परस्पर संबंध रहे है। लेकिन दोनों ही सोनिया गांधी की मजबूरी। सोनिया गांधी ने यह जानते हुए भी कि राहुल गांधी को उनके रहते आजादी नहीं है अहमद पटेल को नहीं हटाया। मतलब उनका राहुल को बनाना भी और अहमद पटेल का पॉवर सेंटर भी बनाए रखना। उधर अहमद पटेल की जिद्द की राहुल भले फेल हो उनका प़ॉवर सेंटर रहेगा। वे रिटायर नहीं होंगे। तभी कांग्रेस की नियति तय है। वह न पनपेगी और न मरेगी!

दोषी कौन? अपना मानना है सोनिया गांधी। वक्त का तकाजा है कि सोनिया गांधी को राहुल और अहमद पटेल दोनों से मुक्ति पा कर या तो प्रियंका गांधी को अध्यक्ष बनाना चाहिए या अंतरिम तौर पर दिग्विजयसिंह, सीपी जोशी जैसे किसी उस नेता को अध्यक्ष बनाए जो जमीनी राजनीति समझता हो, उत्तर भारतीय हिंदू हो और राहुल-प्रियंका के यहां स्वीकार्य हो। लेकिन फिर राहुल गांधी रि-लांच होंगे। वे अपनी शर्त पर कमान संभालेंगे, अहमद पटेल, उनकी मैनेजर टीम को हटाएंगे (पहले की तरह हटा भी शायद न पाए)। प्रदेशों में नौजवान लंगूरों को कमान देंगे और कांग्रेस अंदर ही अंदर और छिन्न-भिन्न होगी। बिखरती, बेजान होती जाएगी। अपना मानना है कि वक्त के तकाजे में अहमद पटेल फिर भी सियासी तौर परसाक्षर हुए है। शिवसेना से तालमेल में सरकार बनवाने की समझ दिखाई है लेकिन राहुल गांधी को हिंदू मंदिरों, तीर्थों की यात्रा करके भी समझ में नहीं आया है कि सावरकर हिंदूओं की एक मूर्ति है। उन्होने जबरदस्ती आज बैल मुझे मार के अंदाज में सावरकर पर टिप्पणी कर डाली। शिवसेना की तारीफ करनी होगी जोउसने समझदारी से कहा कि वह कांग्रेस के गांधी, नेहरू का सम्मान करती है तो कांग्रेस को भी हमारे सावरकर का सम्मान करना चाहिए।

बात सावरकर की नहीं है। हिंदू मनोभाव की है जिसे जीते बिना कांग्रेस खडी नहीं हो सकती है। देश के पचहतर करोड हिंदू वोटों के मन में सावरकर का अपमान करके कांग्रेस अपना अछूतपना खत्म नहीं कर सकती है। देश और कांग्रेस तभी बचेंगे कि जब राहुल शिवसेना से नाता रखंे, वे शिवसेना के बाल ठाकरे, सावरकर का सम्मान करें। कांग्रेस और राहुल गांधी को जान लेना चाहिए कि उनका शिवसेना पर नहीं बल्कि शिवसेना का कांग्रेस पर अहसान है जो वह उस पर हाथ रख उसमें हिंदू होने की प्राण प्रतिष्ठा कर रही है।

सोचें, कैसे कोई राहुल गांधी को यह समझा सकता है? कैसे अहमद पटेल को समझाया जा सकता है और सबसे अंहम बात सोनिया गांधी को कौन समझाए?

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