मंदिर ही है भारत की सच्चाई!

सुप्रीम कोर्ट का अयोध्या में राम मंदिर का फैसला न्याय नहीं, प्राकृतिक न्याय है। वह मनुष्य की प्रकृति का सत्य है! इंसान जिस स्थान जन्म लेता है, जिस घर, परिवेश, संस्कार, इतिहास में जीवन जीता है वहीं दिल-दिमाग में जन्मभूमि, पुण्यभूमि, मातृभूमि की श्रद्धा, पूजा, आस्था का रसायन होता है। उसे कोई राजा, कोई राजनीतिक व्यवस्था, राष्ट्र-राज्य की रचना याकि संविधान, न्याय का समकालीन पॉजिटिव खांचा व अवधारणाएं बदल नहीं सकती हैं। सोचें, बदलना संभव होता तो बाबर की तलवार से क्या सभी हिंदू तब मुसलमान नहीं हो गए होते जब तलवार का कानून था।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला भारत भूमि को जन्मभूमि, आस्थाभूमि, पुण्यभूमि, मातृभूमि मानने वाले हिंदुओं के साथ प्राकृतिक न्याय है। अयोध्या और राम जन्म स्थान की आस्था, उसका धर्म काल निरपेक्ष है। राजनीतिक व्यवस्था, संविधान, कानून, सरकार, अदालत के रूप, रंग वक्त अनुसार बदलते रहते हैं लेकिन स्थान विशेष की सामूहिक चेतना, आस्था, धर्म, उसके नैतिक मूल्य-मापदंड, जीने की पद्धति का अनुभव सनातनी सफर याकि इतिहास होता है।

उस सफर को 15 अगस्त 1947 के दिन गांधी-नेहरू-पटेल ने माना था तो जिन्ना ने भी माना था। तभी धर्म के आधार पर मुसलमानों के लिए पाकिस्तान, हिंदुओं के लिए हिंदुस्तान निर्माण था। पाकिस्तान ने इस्लामी झंडा अपनाया तो भारत में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा बार-बार लुटे गए सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ था। अयोध्या की बाबरी मस्जिद में रामलला की मूर्ति रखना, आस्था के गर्भ गृह का नवनिर्माण था। नेहरू-पंत व उनके आईसीएस अफसर नैयर ने तब मूर्ति हटाई नहीं। ताला लगाया और पूजा होने लगी। अंत में राजीव गांधी, अरूण नेहरू ने लोकल कोर्ट से फैसला करवा कर ताला खुलवाया और गर्भगृह फिर बतौर मंदिर यह आह्वान बनवा बैठा कि सौगंध राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे!

हां, सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले और मोदी सरकार के मौजूदा वक्त से बड़ा फैसला नेहरू के वक्त मस्जिद के बीच गुंबद के नीचे मूर्ति स्थापना का था। फिर राजीव गांधी के वक्त में रामलला की तालेबंदी से मुक्ति का था। यदि आजाद भारत की प्रथम सरकार मस्जिद में मूर्ति नहीं रखने देती और ताला नहीं लगता तो क्या हिंदू बनाम मुसलमान की आस्था की सियासी लड़ाई और मुकदमेबाजी होती? क्या पूरे देश में तब नारे लगते कि सौगंध राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगें!

मगर इन बातों का ज्यादा मतलब नहीं है कि किसने क्या किया और कब-कब, क्या-क्या हुआ? नेहरू, पंत, नैयर, राजीव गांधी, अरूण नेहरू (श्रेय वीर बहादुर सिंह को भी है) आडवाणी, नरेंद्र मोदी, फैजाबाद कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट याकि चेहरे और संस्थाएं तो उस मनोविश्व की निमित्त मात्र हैं, जिसमें जन्म भूमि पर राम और हिंदू स्थायी तौर पर विराजमान हैं!

तभी सुप्रीम कोर्ट के 1045 पेज के फैसले की कोर बात है कि स्थान का ध्यान कर हिंदू अगल-बगल सब तरफ से रामलला विराजमान की आस्था में पूजा करते रहे। बाबर ने मंदिर ध्वस्त किया, मीर बाकी ने मस्जिद बनाई मगर हिंदुओं का ध्यान, उनकी आस्था का पूजा केंद्र वहीं स्थल, वहीं गर्भ गृह था जो उनकी स्मृति-श्रुति में जन्म स्थान था। हिंदुओं की सामूहिक चेतना से, स्मृति से रामलला का स्थान अमिट था तभी गर्भगृह पर ध्यान केंद्रित कर, अगल-बगल के राम चबूतरे, सीता रसोई सब तरफ से हिंदू पूजा करते रहे। आस्था की लड़ाई लड़ते रहे। इसलिए प्राकृतिक न्याय यह है कि जिन हिंदुओं की जन्म भूमि है, मातृभूमि है उनके इतिहास की शुद्धि हो और मंदिर वहीं बने जहां मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनी थी। जाहिर है स्थान, गर्भगृह रामजी का, भगवान राम का सार्वभौम अधिकार क्षेत्र! सो मंदिर वहीं!

मतलब न कब्जा सच्चा और न आज के कानून-कायदे वाजिब। और फैसला इतिहास के सत्य, आस्था की सच्चाई को प्रकट करता हुआ।

तब 15 अगस्त 1947 के पहले के इतिहास को मिटा कर क्लीन स्लेट पर बनी राजनीतिक व्यवस्था, उसके संविधान, सेकुलरवाद का क्या होगा? मतलब मुसलमानों का क्या होगा? यदि 2019 में भारत के लोगों (निश्चित ही बहुसंख्यक हिंदुओं) की सर्वोच्च सामूहिक चेतना में जन्म स्थान पर सार्वभौम अधिकार राम का घोषित हुआ है तो कृष्ण के जन्मस्थान मथुरा में मस्जिद और शिव की काशी नगरी के शिव मंदिर में मस्जिद का आगे क्या? क्यों नहीं शिव और कृष्ण के स्थान पर उनका सार्वभौम पूर्ण अधिकार?

इस सवाल में जो चिंता है उसके तर्क अपनी जगह वाजिब हैं। आखिर बहुत मुश्किल से, हजारों साल की गुलामी के बाद जो आधुनिक भारत राष्ट्र-राज्य मंदिर प्राप्त हुआ है, वह सर्वजन का हो या मंदिर बनाम मस्जिद के झगड़ों में बंटे? भविष्य बनाना है या इतिहास के खंडहरों में भटकना है? हिंदू बनाम मुसलमान का साझा हो या धर्म युद्ध हो?

संदेह नहीं मुसलमान नाराज हैं। मुस्लिम संगठनों के नेताओं और पदाधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जो टिप्पणी की है उसका सार है कि मन पराजित है और कोई बात नहीं वक्त का इंतजार है। दूसरी तरफ हिंदू खुश और संतुष्ट हैं तो मोदी-शाह, भाजपा, संघ का नया राजनीतिक रोडमैप तयशुदा है।

दोनों पक्ष, दोनों धर्म अपनी-अपनी सच्चाई, इतिहास की सच्चाई के व्यवहार में बंधे हुए हैं। तभी अपना मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी हकीकत में समझना चाहिए। उसी अनुसार हम लोगों को, हिंदू और मुसलमान दोनों को पाखंड, झूठ और ढोंग को छोड़ कर सच्चा व्यवहार करते हुए हकीकत का सम्मान करना चाहिए।

सच्चाई है कि भारत की सामूहिक चेतना हिंदू होने की, हिंदू राष्ट्र की है। अब सामूहिक चेतना का मतलब लोकतंत्र में बहुसंख्यक आबादी के सोचने, उसकी बुनावट से है। मुस्लिम व अल्पसंख्यक असहमति रखे तो इसका उन्हें हक है। अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन और फ्रांस यदि आजादी, समानता, न्याय की आधुनिक अवधारणाओं को अपनाते हुए भी अपने को क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक, ईसाईयत की आस्था, उसूलों की विरासत में जीते हुए गौरवान्वित होते हैं और बाकी धर्मावलंबी उनके बीच अपने अस्तित्व को बनाते हुए मजे से जी रहे हैं तो भला भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता?

हां, हिंदू आस्था की सार्वभौमता में गांधी-नेहरू-पटेल ने भारत को अपने अंदाज में बनाया तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह-संघ परिवार अपने अंदाज में बना रहे हैं। इन दोनों वक्त का कॉमन तथ्य, अंडरलाइन तो हिंदू की जन्मभूमि का है। फालतू बात है कि गांधी-नेहरू बनाम मोदी-शाह के हिंदूपने में फर्क है। वे ऐसे हिंदू नहीं और ये वैसे हिंदू नहीं का अंतर फालतू है। सेकुलर हिंदू और कम्युनल हिंदू, सेकुलर भारत और हिंदू भारत दोनों की अंतरात्मा हिंदू ही है। मुसलमान इसे जानते-मानते हैं। उन्हें यदि आजाद भारत के पाखंड, सेकुलर झूठ ने बरगलाया नहीं होता तो मुसलमान खुद आजादी के बाद ही अयोध्या, काशी, मथुरा का पुनर्निर्माण होने देते। दोषी हिंदू नेतृत्व था, जिसने हिंदुओं के लिए भारत निर्माण मानते हुए भी हिंदू आस्था व इतिहास को दरकिनार किया।

ऐसा पाकिस्तान याकि इस्लाम और इस्लामी देश में कभी नहीं हुआ। मुसलमान अपने दीन-ईमान और धर्म में पक्का, सच्चा व बेबाक है। वह अपनी आस्थाओं का आग्रह लिए होता है। सोचें, यदि अयोध्या जैसा ही कोई प्रकरण पाकिस्तान में हुआ होता तो वहां क्या बात सुप्रीम कोर्ट तक जाती? क्या फैसले में 72 वर्ष लगते?

सो, मानें कि भारत हिंदू है और है तो है! उसकी जन्मभूमि, मातृभूमि, पुण्यभूमि भारत है तो है! वक्त अनुसार इन बातों का रूप, इनकी मुखरता अलग रंग-ढंग, कथनी-करनी में प्रकट होती है। उस नाते बतौर मुसलमान ओवैसी को यह चिंता नहीं करनी चाहिए कि भारत हिंदू राष्ट्र बन रहा है। जब गांधी-नेहरू-पटेल के वक्त में सोमनाथ बना तो क्या वह हिंदू राष्ट्र होना नहीं था जो अब राममंदिर बन रहा है तो गलत मान रहे है!

मुसलमान सच्चाई में जीता है। वह आस्था, धर्म को ज्यादा सघनता से जीता है। उसमें यह कहने की हिम्मत-सच्चाई है कि उसकी धर्म भूमि, पुण्य भूमि, मातृभूमि मक्का-मदीना है इसलिए उसे वंदे मातरम् के गायन में दिक्कत है। गड़बड़ हिंदुओं की सामूहिक चेतना में वक्त-बेवक्त आए बवंडरों के झूठ व पाखंड से है, जिसमें कभी हम सुर से सुर मिलाते हैं तो कभी सौंगध राम की खाते हैं! दो धर्म, दो कौम का एक म्यान का प्रयोग बनता नहीं है और माना हुआ है कि मुसलमान के लिए पाकिस्तान व हिंदुओं के लिए हिंदुस्तान हैं बावजूद इसके भारत को हिंदू राष्ट्र नहीं समझते। मोहम्मद अली जिन्ना को दिल्ली में प्रधानमंत्री मान नहीं पाते हैं, जबकि बात करते हैं धर्मनिरपेक्षता की!

उस नाते सुप्रीम कोर्ट को इधर-उधर की बातों की बजाय फैसले में दो टूक अंदाज में कहना था कि देश की, हिंदुओं की सामूहिक चेतना की आस्था का मंदिर बनना राष्ट्र-राज्य की नैसर्गिक आवश्यकता है। हिंदुओं का उनकी देवभूमि, जन्मभूमि, मातृभूमि, पुण्यभूमि में यह नैसर्गिक अधिकार है।

सचमुच क्या वक्त नहीं जो हम ऐसी सीधी, सच्ची एप्रोच अपनाएं! इसके खिलाफ जितने तर्क हैं वे तर्क नहीं हैं, बल्कि इतिहासजन्य हमलों, गुलामी और भय से जनित कुतर्क हैं। कोई हजार साल हम इतने डर कर जीये हैं कि 15 अगस्त 1947 से आज तक हम इस सोच में हैं कि संभल कर, मध्य मार्ग से नहीं चले तो आजादी फिर गंवा बैठेंगें! भय के चलते ही दोहरापन बनता है और झूठ व पाखंड में बात करते हैं!

लब्बोलुआब में अपना तर्क है कि दुनिया की आंख में आंख डाल कर बताने का वक्त है कि भारत हिंदुओं का था, है, और रहेगा। जब सऊदी अरब से ले कर अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस अपने -अपने धर्म के आग्रह (अलग-अलग रूप, भाव में ही सही) लिए हुए हैं तो भारत राष्ट्र-राज्य क्यों ऐसे फैसले करने में सदियों, दशकों लगाए जो दिल-दिमाग इन सांप्रदायिक मनमुटावों में उलझा रहे कि मूल, सामूहिक चेतना में मंदिर बनेगा या मस्जिद बनी रहेगी!

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