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लालू प्रसाद के नेताओं का अफसोस!

बिहार में लालू प्रसाद की पार्टी राजद के नेता इस बात का अफसोस कर रहे हैं कि 2015 में महागठबंधन के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद लालू प्रसाद ने अपने दोनों बेटों को मंत्री बनाने और उप मुख्यमंत्री की कुर्सी लेने की बजाय स्पीकर का पद लिए होते तो आज स्थिति अलग होती। राजद के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि राजद और जदयू के बीच हुए मौजूदा घमासान में जदयू के पास सबसे बड़ी रणनीतिक बढ़त यह है कि विधानसभा में स्पीकर उसका है। नीतीश ने जीतन राम मांझी प्रकरण से प्रेरणा लेकर अपने सबसे भरोसे के नेता विजय चौधरी को स्पीकर बनाया है। इसलिए राजद के नेता मान रहे हैं कि अगर जदयू में तोड़ फोड़ की स्थिति आती है तो स्पीकर उसे रोक देंगे। 

यह भी माना जा रहा है कि राजद ने अगर कांग्रेस, निर्दलीय, सीपीआई एमएल और जदयू के कुछ विधायकों की मदद से वैकल्पिक सरकार बनाने का प्रयास किया तो स्पीकर इसे सफल नहीं होन देंगे। जदयू के स्पीकर और भाजपा के नियुक्त किए राज्यपाल की वजह से राजद बैकफुट पर है। राजद के जानकार नेताओं का कहना है कि जदयू के दो दर्जन विधायक पाला बदल सकते हैं। बताया जा रहा है कि उसके यादव और मुस्लिम विधायक नहीं चाहते हैं कि नीतीश कुमार फिर से भाजपा से संबंध जोड़ें। वे इस महागठबंधन को बनाए रखना चाहते हैं। अगर गठबंधन टूटता है तो वे राजद में जाने को तरजीह देंगे। 

यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी नेताओं के एक बड़े समूह पर पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव का असर है और वे भी इस समय गठबंधन तोड़ कर भाजपा के साथ जाने के पक्ष में नहीं हैं। लेकिन चाहे यादव और मुस्लिम विधायक हों या शरद यादव के समर्थक हों, सबकी मजबूरी है कि राज्यपाल और स्पीकर दोनों अपने नहीं हैं। किसी भी टूट फूट की स्थिति में स्पीकर विधायकों की मान्यता रद्द कर सकता है या मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल विधानसभा भंग कर सकता है। तभी राजद और कांग्रेस के नेता फूंक फूंक कर कदम उठा रहे हैं। उनके सामने नीतीश कुमार के अगले कदम का इंतजार करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। वैसे नीतीश ने भी अपने को जिस स्थिति में डाल लिया है, उनके पास भी ज्यादा विकल्प नहीं हैं। 

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