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सहयोगियों की जरूरत समझ रही है भाजपा!

भारतीय जनता पार्टी ऐसा लग रहा है कि अपने सहयोगियों के प्रति सद्भाव दिखा रही है। उसने खासतौर से शिवसेना और जनता दल यू के प्रति सद्भाव दिखाया है। महाराष्ट्र में शिवसेना की जरूरत को समझते हुए भाजपा ने कांग्रेस छोड़ने वाले पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे को विधान परिषद का उम्मीदवार नहीं बनाया और इसी तरह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भावना को समझते हुए आनन फानन में शरद यादव की राज्यसभा सदस्यता खत्म कर दी। 

पहले लग रहा था कि नीतीश पर दबाव बनाने के लिए भाजपा शायद शरद यादव की सदस्यता इतनी जल्दी खत्म नहीं करेगी। दूसरे बागी नेता अली अनवर की सदस्यता तो खत्म करने की जरूरत भी नहीं थी क्योंकि उनकी सदस्यता अपने आप अगले साल अप्रैल में खत्म हो रही थी। उनकी सीट खाली हो जाती है तो अभी उस पर उपचुनाव भी नहीं होगा। फिर भी राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू ने शरद यादव और अली अनवर की सदस्यता खत्म की। उन्होंने सामान्य परंपरा का पालन करते हुए मामले को आचरण समिति के पास भी नहीं भेजा और न इस बात पर ध्यान दिया कि अभी तक जनता दल यू के चुनाव चिन्ह का मामला भी नहीं सुलझा है। चुनाव आयोग ने जरूर पार्टी का चुनाव चिन्ह नीतीश कुमार खेमे को दे दिया है, पर शरद यादव गुट ने इस फैसले को चुनौती दी है। सो, सामान्य तरीके से भी सदस्यता का मामला टल सकता था। 

पर ऐसा लग रहा है कि नीतीश कुमार को खुश करने के लिए आनन फानन में यह फैसला किया गया। यह भी कहा जा रहा है कि अगर शरद यादव की जगह जदयू का दूसरा सांसद आएगा तो राज्यसभा में भाजपा को उसका फायदा होगा। राज्यसभा में शरद यादव की मौजूदगी सरकार के लिए मुश्किल पैदा करने वाली है। बहरहाल, भाजपा के जानकार सूत्रों का कहना है कि गुजरात में कांग्रेस को मिल रहे रिस्पांस से भाजपा की चिंता बढ़ी है। उसे लगने लगा है कि गले चुनाव तक हालात बदल सकते हैं। तभी उसने सहयोगियों के प्रति अपना नजरिया बदला है। उद्धव ठाकरे से लेकर नीतीश कुमार तक सबको खुश रखने वाले फैसले किए जा रहे हैं।

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