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भाजपा में चल नहीं पा रहे बाहरी नेता!

भारतीय जनता पार्टी की चुनावी रणनीति में दूसरी पार्टियों से आने वाले नेताओं का खास स्थान है। पार्टी हमेशा चुनाव से पहले राज्यों में विपक्षी पार्टियों को निशाना बनाती है और उनके नेताओं को तोड़ कर अपनी पार्टी से चुनाव लड़ाती है। शुरुआत में यह रणनीति सफल रही है। या कहा जा सकता है कि विधानसभा या लोकसभा का चुनाव जीतने में तो ऐसे नेता सफल रहे पर उनसे कोई बड़ा लक्ष्य हासिल नहीं हो सका। असम के हिमंता बिस्वा सरमा इसका अपवाद हैं। 

मिसाल के तौर पर कर्नाटक का जिक्र किया जा सकता है, जहां चुनाव से कुछ समय पहले भाजपा ने कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता एसएम कृष्णा को अपनी पार्टी में शामिल कराया था। वे राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं और विदेश मंत्री भी रहे हैं। वे राज्य के बड़े वोक्कालिगा नेता हैं। पर चुनाव में उनका कोई इस्तेमाल नहीं हुआ। भाजपा ने उनको सोशल मीडिया टीम में रखा था। वे देवगौड़ा परिवार के वोक्कालिगा वोट में जरा भी सेंध नहीं लगा पाए। 

दूसरी मिसाल मुकुल रॉय की है। भाजपा ने उनको भी बड़े जोश खरोश के साथ तृणमूल कांग्रेस छुड़वा पर अपनी पार्टी में शामिल कराया था। माना जा रहा था कि वे राज्य की राजनीति में ममता बनर्जी को बड़ा नुकसान पहुंचाएंगे क्योंकि तृणमूल का संगठन खड़ा करने में उनकी बड़ी भूमिका रही है। पर पिछले करीब एक साल की राजनीति में वे नाकाम ही साबित हुए हैं। 

तीसरी मिसाल नारायण राणे की है। उन्होंने कांग्रेस छोड़ कर अपनी पार्टी बनाई और बाद में भाजपा की टिकट से राज्यसभा का चुनाव लड़ कर जीते। लेकिन वे महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा के किसी काम नहीं आ रहे हैं। अगर भाजपा और शिवसेना का तालमेल हो जाता है, जैसी कि चर्चा चल रही है तो राणे की भूमिका और खत्म होगी क्योंकि उन्होंने जब से शिवसेना छोड़ी है तब से पार्टी ने उनको अछूत बनाया हुआ है। बहरहाल, हर राज्य में कुछ कुछ ऐसे नेता हैं, जिन्हें भाजपा दूसरी पार्टियों से लेकर आई है लेकिन वे पार्टी के लिए कोई बड़ी राजनीतिक उपलब्धि नहीं बन पाए हैं। 

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