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भाजपा संगठन में भी गिनती के दलित!

भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार और राज्यों की सरकारों में दलितों की संख्या गिनी चुनी है और वहीं स्थिति पार्टी संगठन में भी है। भाजपा के संगठन में गिनती के ही दलित हैं, जिनको सिर्फ खानापूर्ति के लिए रखा गया है। भाजपा की सबसे बड़ी फैसला करने वाली ईकाई पार्टी संसदीय बोर्ड है। हालांकि यह भी सिर्फ दिखावे के लिए फैसला करने वाली बॉडी है। फैसले आमतौर पर प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष करते हैं, जिन पर संसदीय बोर्ड में मुहर लगाई जाती है। इस संसदीय बोर्ड के 11 सदस्यों में से सिर्फ एक थावरचंद गहलोत दलित हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के रूप में दो पिछड़े चेहरे हैं। संसदीय बोर्ड के 11 सदस्यों में से पांच ब्राह्मण, एक राजपूत और एक वैश्य समुदाय के हैं। संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष अमित शाह भी अगड़ी जाति से आते हैं। इसके बाद पार्टी के उपाध्यक्षों, महासचिवों और प्रवक्ताओं की बारी आती है। भाजपा के कुल छह उपाध्यक्ष हैं, जिनमें एक भी दलित नहीं है। एकमात्र पिछड़ा चेहरा रेणु देवी का है और बाकी पांच उपाध्यक्ष अगड़ी जाति से आते हैं।

पार्टी के आठ महासचिव हैं, जिनमें से एक भी दलित नहीं है। इन आठ महासचिवों में तीन ब्राह्मण, एक राजपूत, दो वैश्य, एक जैन और भूपेंद्र यादव पिछड़ी जाति के हैं। पार्टी के चार संयुक्त महासचिवों में भी कोई दलित नहीं है। इसके बाद पार्टी के 11 सचिव हैं, जिनमें पार्टी की सांसद ज्योति ध्रुवे एकमात्र सचिव हैं, जो दलित समुदाय से आती हैं। बाकी दस सचिव अगड़ी या पिछड़ी जाति के हैं।

भाजपा के प्रवक्ताओं की संख्या दस है, जिनमें से ज्यादातर अगड़ी जाति से आते हैं। इसमें एकमात्र दलित प्रवक्ता विजय सोनकर शास्त्री हैं। इनके अलावा एक मुस्लिम चेहरा सैयद शाहनवाज का है बाकी सब अगड़ी या पिछड़ी जाति से आते हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी के लगभग सारे प्रकोष्ठ भंग कर दिए हैं। अभी पार्टी के सिर्फ सात मोर्च काम कर रहे हैं, जिनमें एक एससी मोर्चा भी है, जिसके अध्यक्ष विनोद सोनकर हैं। पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति के 14 सदस्यों में से एक दलित चेहरा थावरचंद गहलोत और एक आदिवासी चेहरा जुएल उरांव का है।

केंद्रीय संगठन की जैसी स्थिति है, वैसी ही स्थिति प्रदेश संगठनों की भी है। देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अध्यक्षों की सूची पर नजर डालने पर दलित नदारद दिखते हैं। खास कर देश के बड़े राज्यों में है। जिन राज्यों में भाजपा का आधार रहा है या नए सिरे से भाजपा ने अपना विस्तार किया है, उनमें कहीं भी दलित प्रदेश अध्यक्ष नहीं है।

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