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संसद सत्र का गतिरोध कैसे टूटेगा?

भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार के संसदीय प्रबंधक दावा कर रहे हैं सोमवार से शुरू होने वाले बजट सत्र के दूसरे हफ्ते में सब कुछ सामान्य हो जाएगा और संसद में कामकाज ठीक तरीके से होने लगेगा। पर इस बात की संभावना बहुत कम लगती है कि दूसरे हफ्ते में भी कामकाज हो पाएगा। गौरतलब है कि पहला पूरा हफ्ता बेकार गया है। पांच कामकाजी दिनों में संसद के दोनों सदनों में कोई कामकाज नहीं हुआ। विपक्षी कांग्रेस और सत्तापक्ष की सहयोगी पार्टियों के हंगामे की वजह से कामकाज बाधित रहा। 

कांग्रेस के नेता मान रहे हैं कि सरकार खुद ही संसद के दोनों सदनों को चलने देना नहीं चाहती है इसलिए उम्मीद कम है कि दूसरे हफ्ते में भी कामकाज हो पाएगा। असल में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी, लेफ्ट आदि पार्टियां चाहती हैं कि पंजाब नेशनल बैंक और दूसरे सरकारी बैंकों में हुए घोटाले और एनपीए के मसले पर विस्तार से चर्चा हो और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पर जवाब दें। सरकार के प्रबंधकों को पता है कि ऐसा हुआ तो सरकार घिरेगी और बैंकिंग घोटाला एक बार फिर मीडिया में मुख्य मुद्दा बनेगा। 

तभी यह स्थिति सरकार के अनुकूल है कि चर्चा न हो, गतिरोध बना रहे है और इस हंगामे में ही बजट पास करा लिया जाए। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का मानना है कि अगर सरकार चाहती तो संसद चल सकती थी। पहले भी विपक्ष के सांसद हंगामा करते रहे हैं लेकिन तब इस तरह संसद की कार्यवाही स्थगित नहीं होती थी। विपक्षी पार्टियां यह भी कह रही हैं कि सरकार की सहयोगी तेलुगू देशम पार्टी और शिवसेना का विरोध दिखावा है। अन्ना डीएमके के विरोध को भी विपक्ष दिखावा मान रहा है। उनका कहना है कि सरकार के इशारे पर यह विरोध चल रहा है ताकि बैंकिंग घोटाले को दबाया जा सके और उस पर चर्चा न करानी पड़े। 

पर असल में ऐसा लग नहीं रहा है कि सरकार टीडीपी और शिवसेना को हैंडल कर रही है। दोनों पार्टियां अपनी घरेलू राजनीति के कारण सरकार का विरोध कर रही हैं। टीडीपी को आंध्र प्रदेश में लोगों को जवाब देना है। विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिलने और अतिरिक्त फंड नहीं मिलने से कई काम अटके पड़े हैं। तभी चंद्रबाबू नायडू इसका ठीकरा केंद्र की भाजपा सरकार पर फोड़ रहे हैं। उनकी देखा देखी वाईएसआर कांग्रेस भी यहीं काम कर रही है। शिवसेना को भी दोहरी एंटी इन्कंबैंसी कम करने के लिए भाजपा से दूरी दिखानी है। तभी इस बात की संभावना कम लग रही है कि ये पार्टियां सरकार के संसदीय प्रबंधकों की बात मान कर अपना विरोध खत्म करेंगी। अगर एनडीए में बिल्कुल शीर्ष स्तर से बात हो तब कुछ बात बन सकती है नहीं तो गतिरोध जारी रहेगा।  

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