सुरजेवाला ने क्यों लिया जोखिम

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला हरियाणा की जींद विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ रहे हैं। वे कैथल से विधायक हैं और इससे पहले भी लगातार दस साल जीते थे और भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार में मंत्री थे। वे कांग्रेस के मीडिया प्रभारी हैं, राहुल गांधी के करीबी हैं और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य हैं। ऐसे में उनके विधायक रहते फिर से विधायक का चुनाव लड़ना कई लोगों के गले नहीं उतर रहा है। पर इतना जरूर हुआ है कि इससे हरियाणा की राजनीति में एकदम से हलचल मच गई है। माना जा रहा है कि सुरजेवाला ने बहुत सोच समझ कर जोखिम लिया है। अगर वे यह चुनाव जीत जाते हैं तो वे स्वाभाविक रूप से हरियाणा के जाट नेता के तौर पर स्थापित होंगे और अगले चुनाव में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के दावेदार होंगे। 

यह इलाका जाट असर वाला है और इस सीट पर अजय सिंह चौटाला के बेटे दिग्विजय चौटाला मैदान में उतरे हैं। चारकोणीय मुकाबले की वजह से लड़ाई ज्यादा दिलचस्प हो गई है। सुरजेवाला का नामांकन कराने कुलदीप बिश्नोई, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, अशोक तंवर और किरण चौधरी चारों गए थे। यह एक तरह से सुरजेवाला की ताजपोशी की तरह का नामांकन था। लेकिन बड़ा सवाल है कि अगर सुरजेवाला नहीं जीते तो क्या होगा? ज्यादातर जानकार मुकाबला कड़ा बता रहे हैं। असल में राज्य में नौ महीने बाद विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और ऊपर से मुकाबला कड़ा है इसलिए कोई नेता उपचुनाव लड़ने को तैयार नहीं था। इसलिए सुरजेवाला ने अपने को दांव पर लगाया। अगर जीत गए तो सीएम के दावेदार होंगे और हारे तब कहा जाएगा कि हुड्डा, तंवर आदि सबने मिल कर हरवा दिया।

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