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क्षेत्रीय पार्टियों के लिए कर्नाटक का मैसेज!

कर्नाटक के विधानसभा चुनाव के नतीजों का कांग्रेस के लिए जो मैसेज है वह तो है ही पर क्षेत्रीय पार्टियों के लिए बड़ा मैसेज है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जेडीएस ने बहुत शानदार प्रदर्शन किया है। पिछले चुनाव का प्रदर्शन दोहराने की उम्मीद किसी को नहीं थी। सारे चुनाव पूर्व और चुनाव बाद के सर्वेक्षणों में जेडीएस को नुकसान होने का अंदाजा लगाया जा रहा था। इसके अलावा एक निष्कर्ष यह भी निकाला जा रहा था कि नुकसान के बावजूद जेडीएस किंगमेकर की भूमिका में हो सकती है। 

पर सर्वेक्षणों के दोनों अनुमान गलत हो गए। जेडीएस ने उम्मीद से अच्छा प्रदर्शन किया। उसके अकेले लड़ने से पिछली बार कांग्रेस को फायदा हुआ था और इस बार भाजपा को फायदा हो गया। यह कर्नाटक चुनाव का सबसे बड़ा निष्कर्ष है कि जेडीएस, बसपा के तालमेल और इसे मिले एमआईएम के समर्थन ने कांग्रेस को चुनाव हरा दिया। बेंगलुरू और मैसुरू के चुनाव नतीजों में इसकी झलक मिलती है। 

सो, देश की तमाम क्षेत्रीय पार्टियों के लिए इस नतीजे का दो तरह से मैसेज निकलता है। पहला मैसेज तो भाजपा के अजेय होने का है। यह कर्नाटक से स्थापित हुआ है कि भाजपा को हराना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। सो, इस वजह से देश भर की पार्टियों को सावधान हो जाना चाहिए। खास कर उन क्षत्रपों को जो भाजपा के इस अश्वमेध के बावजूद अपनी सत्ता बचाने में कामयाब रहे हैं। क्योंकि अगले चुनावों में भाजपा उनके राज्य छीनने के लिए लड़ेगी। खास तौर से आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल, ओड़िशा और पश्चिम बंगाल में। 

दूसरा मैसेज यह है कि अगर कांग्रेस और जेडीएस मिल कर लड़े होते या बसपा ने जेडीएस से तालमेल नहीं किया होता तो शायद कर्नाटक में ऐसे नतीजे नहीं आते। कांग्रेस का हारना थोड़े समय के लिए क्षत्रपों को संतोष और खुशी दे सकता है क्योंकि इससे उनके मोलभाव की ताकत बढ़ती है पर इसके बावजूद यह तय माना जाना चाहिए कि भाजपा को रोकने के लिए प्रादेशिक क्षत्रपों को मिल कर चुनाव लड़ना होगा। 

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