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केंद्र में आए शिवराज, राजे और रमन!

आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तीन राज्यों के क्षत्रपों- शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे और रमन सिंह को केंद्र में ले आए। जब से मोदी प्रधानमंत्री बने तब से यह चर्चा थी कि वे उस समय के इन तीनों मुख्यमंत्रियों को केंद्र सरकार में मंत्री बनाना चाहते हैं। इन तीनों को मिलने वाले मंत्रालयों के नाम भी बताए जाने लगे थे। लेकिन तब ये तीनों अपने अपने राज्य में जमे रहे। पर मुख्यमंत्री पद से हटने के एक महीने के भीतर तीनों को भाजपा की केंद्रीय राजनीति में लाया गया। तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया।

भाजपा में उपाध्यक्ष का पद सजावटी होता है। कांग्रेस को छोड़ कर दूसरी पार्टियों में भी कमोबेश यहीं स्थिति होती है। तभी बिहार, यूपी की राजनीति में व्यंग्य में उपाध्यक्ष को चुपाध्यक्ष कहा जाता है। भाजपा के उपाध्यक्षों की सूची देख कर यह व्यंग्य सही साबित होता है। पार्टी संगठनव में असल ताकत अध्यक्ष के बाद महासचिवों के पास होती है। उपाध्यक्षों में कम ही होते हैं, जिनको किसी बड़े राज्य का प्रभार मिलता है। आमतौर पर वे छोटे राज्यों के या सिर्फ नाम के लिए प्रभारी होते हैं।

जैसे पार्टी उपाध्यक्ष अविनाश राय खन्ना जम्मू कश्मीर के प्रभारी हैं लेकिन वहां के सारे काम पार्टी महासचिव राम माधव करते हैं। इसी तरह एक दूसरे उपाध्यक्ष श्याम जाजू दिल्ली के प्रभारी हैं पर दिल्ली की राजनीति के फैसले या तो सीधे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के यहां होते हैं या अरुण जेटली के यहां। बिहार की रेणु देवी पार्टी उपाध्यक्ष हैं पर उनके पास संभवतः कोई जिम्मा नहीं है। एक खास जाति का प्रतिनिधित्व देने के लिए उनको राष्ट्रीय पद दे दिया गया है। भाजपा के सात उपाध्यक्षों में से सिर्फ तीन – ओम प्रकाश माथुर, प्रभात झा और विनय सहस्रबुद्धे ही सांसद हैं, जिनकी राष्ट्रीय पदाधिकारी के नाते कोई जिम्मेदारी है।  

बहरहाल, तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों को उपाध्यक्ष बनाने के बाद अटकलें लगाई जा रही हैं कि उनको क्या जिम्मा दिया जाएगा। उनको राष्ट्रीय भूमिका मिलने की तो चर्चा है पर वे काम क्या करेंगे यह तय नहीं है। यह भी देखना दिलचस्प होगा कि लोकसभा चुनाव में इनका इस्तेमाल अपने राज्य में होता है या इनके लिए कोई और भूमिका तय होती है। 

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