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पटनायक की चित भी मेरी पट भी मेरी

नवीन पटनायक की पार्टी ओड़िशा में प्रचार कर रही है कि अगले साल वे अपनी आखिरी राजनीतिक पारी खेलेंगे और उसके बाद पार्टी की कमान नए नेता को सौंप दी जाएगी। इस आखिरी पारी में उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है। भाजपा इस बार बहुत आक्रामक तरीके से चुनाव लड़ रही है और उसने लोकसभा चुनाव में 10 से ज्यादा और विधानसभा में 60 से ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। 

पर पटनायक अपनी पुरानी सहयोगी भाजपा के प्रति कोई आक्रामकता नहीं दिखा रहे हैं उलटे उसके प्रति सद्भाव दिखा रहे हैं। उन्होंने विपक्ष की ओर से लाए अविश्वास प्रस्ताव पर केंद्र सरकार का साथ दिया और राज्यसभा के उप सभापति के चुनाव में भी केंद्र सरकार का साथ दिया है। खबर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद उनसे बात की थी। अविश्वास प्रस्ताव से पहले ही प्रधानमंत्री ने उनसे बात की थी और उसी समय उप सभापति के चुनाव में भी उनका समर्थन मांगा था। तब उन्होंने कहा था कि गैर भाजपा उम्मीदवार को समर्थन देने में उनको कोई दिक्कत नहीं होगी। 

सवाल है कि जब नवीन पटनायक ओड़िशा में भाजपा से लड़ रहे हैं तो दिल्ली में उसका समर्थन क्यों कर रहे हैं? उनकी पार्टी के एक संसदीय नेता ने बताया कि असल में बीजू जनता दल किसी हाल में विपक्ष के साथ नहीं दिखना चाहता है। इसका कारण यह है कि उनको लग रहा है कि विपक्ष की छवि अच्छी नहीं है और उसके साथ दिखने का नुकसान होगा। इसका दूसरा कारण यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि आम मतदाता में खराब नहीं है। सो, बीजू जनता दल यह मैसेज नहीं जाने देना चाहती है कि उसका कोई निजी झगड़ा है, जैसा कि दूसरे प्रादेशिक क्षत्रपों ने मैसेज दिया है। 

ओड़िशा में वैसे भी मुस्लिम वोट बहुत कम हैं। इसलिए मोदी विरोध से कोई बड़ा राजनीतिक फायदा नवीन पटनायक को नहीं होने वाला है। तभी उन्होंने दिल्ली में सरकार का समर्थन कर दिया है। इसके जरिए ओड़िशा के शहरी, मध्य वर्ग में उन्होंने यह मैसेज दिया है कि वे भाजपा से दूर नहीं हैं और जरूरत पड़ने पर साथ आ सकते हैं। चित भी मेरी, पट भी मेरी की राजनीति उनको फायदा पहुंचा सकती है पर भाजपा के लिए नुकसानदेह है। भाजपा के प्रदेश के नेता इसे समझ रहे हैं पर दिल्ली में विपक्ष को काबू में रखने के लिए ऐसा होने दे रहे हैं। 
 

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