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नीतीश की बात मान रहे हैं मोदी!

एनडीए में भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी पार्टियों की संख्या 30 से ज्यादा है। पर इनमें सबसे खास बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। वे बेहद खास परिस्थितियों में भाजपा के साथ जुड़े हैं इसलिए भी उनकी अहमियत ज्यादा है। दूसरे क्षत्रपों की जीत में प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मे का हाथ है, जबकि वे मोदी के करिश्मे को फेल करने के बाद भाजपा के साथ आए हैं। इसलिए कहा जा रहा है कि भाजपा और केंद्र की सरकार में उनकी बातें सुनी जा रही हैं। हालांकि इसका भी पता तब चलेगा, जब बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के मामले में अंतिम फैसला होगा। 

बहरहाल, फिलहाल यह स्थिति है कि नीतीश कुमार जो चाह रहे हैं वह हो रहा है। ताजा मामला पार्टी के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव की राज्यसभा सदस्यता का है। नीतीश और उनकी पार्टी जल्दी से जल्दी उनकी सदस्यता खत्म कराना चाह रही है। खबर है कि उप राष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू उनकी सदस्यता पर जल्दी ही फैसला कर सकते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि सदस्यता के मामले को राज्यसभा की आचरण समिति के पास भेजने की बजाय सीधे उप सभापति ही फैसला करेंगे। इससे पहले बिहार के ही दो राज्यसभा सांसदों जयनारायण निषाद और उपेंद्र कुशवाहा का मामला ठीक ऐसे ही मामले में आचरण समिति को भेजा गया था। 

इसी तरह यह भी चर्चा है कि बिहार के नए राज्यपाल सत्यपाल मलिक की नियुक्ति के लिए भी नीतीश ने नरेंद्र मोदी से कहा था। ध्यान रहे मलिक भाजपा के बड़े नेताओं में शामिल नहीं हैं और न उनकी पुरानी संघ की पृष्ठभूमि है। फिर भी उनको बिहार जैसे अहम राज्य का राज्यपाल बनाया गया। वे समाजवादी राजनीति की पृष्ठभूमि से आते हैं और किसी जमाने में चौधरी चरण सिंह के करीबी रहे हैं। जब वे शपथ लेने पटना पहुंचे तो प्रोटोकॉल तोड़ कर उन्होंने नीतीश कुमार को सार्वजनिक रूप से गले लगाया। बिहार के पिछले राज्यपाल रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाने की सिफारिश करने वालों में भी नीतीश शामिल बताए जाते हैं।  

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को बड़े जोश खरोश के साथ एनडीए में लाया गया था। चर्चा थी कि वे राज्यपाल बनेंगे। लेकिन वे देखते रह गए और अतिपिछड़ा समाज से आने वाले बिहार भाजपा के नेता गंगा प्रसाद राज्यपाल बन गए। जानकार सूत्रों का कहना है कि मांझी के राजभवन जाने का रास्ता भी नीतीश कुमार ने रूकवाया। अब उनकी अगली कोशिश उपेंद्र कुशवाहा को सरकार से बाहर कराने और अपने दो या तीन सांसदों को मंत्री बनाने की होगी।

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