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कितनी बढ़ गई प्रतीकों की राजनीति!

पिछले साढ़े तीन साल में प्रतीकों की राजनीति में जबरदस्त इजाफा हुआ है। हालांकि इनसे वास्तविक हालात में कोई बदलाव नहीं आया है, फिर भी हर दिन कोई न कोई नई प्रतीकात्मक पहल शुरू हो जाती है। मिसाल के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद कहा कि लोगों को चाहिए कि वे किसी के जन्मदिन पर जाएं तो तोहफे में गुलदस्ते की जगह किताब दें। लेकिन पिछले दिनों वे खुद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को उनके जन्मदिन की बधाई देने गुलदस्ता लेकर गए थे। सोशल मीडिया मे इसकी खूब चर्चा भी हुई। 

बहरहाल, उनकी सरकार के सभी मंत्रियों और अधिकारियों ने झाड़ू हाथ में लेकर फोटो खिंचवाई, लेकिन हकीकत यह है कि स्वच्छता अभियान राष्ट्रीय राजधानी में ही दम तोड़ चुका है। फिर भी यह सिलसिला जारी है। पहले राष्ट्रीय त्योहारों के मौके पर रायसीना की पहाड़ियों पर बनी सरकारी इमारतों को लाइट से सजाया जाता था। मोदी की सरकार ने इसका विस्तार किया और सभी सरकारी इमारतों को सजाने का आदेश दिया। अब खबर है कि सरकार चाहती है कि सभी सरकारी इमारतें पूरे साल बिजली से सजी रहें। पिछले दिनों पूर्वोत्तर में एक हेलीकॉप्टर गिरने से सात सैनिकों के मारे जाने की खबर आई थी। इसके साथ ही तस्वीरें आईं थीं कि उनके शव कार्ड बोर्ड और गत्ते के बक्से में लपेट कर लाए गए थे। इसके तुरंत बाद यह प्रस्ताव आया है कि शहीद सैनिकों के शव जिस विमान में लाए जाएंगे, उसमें यात्रियों से 30 सेकेंड का मौन रखने को कहा जाएगा। माना जा रहा है कि इससे लोगों में देशभक्ति बढ़ेगी, जैसे सुप्रीम कोर्ट ने देशभक्ति बढ़ाने के लिए सिनेमा हॉल में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्र गान की धुन पर खड़ा होना अनिवार्य किया है। बहरहाल, अब उत्तर प्रदेश सरकार सरयू के किनारे भगवान राम की सौ मीटर ऊंची मूर्ति लगाने जा रही है। राम मंदिर, रामायण म्यूजियम और अब राम की मूर्ति! पर लोग यह भी पूछ रहे हैं कि भगवान राम की मूर्ति सरदार पटेल और शिवाजी महाराज से छोटी क्यों होगी?

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