यूपी में क्यों देरी कर रही कांग्रेस?

कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में अध्यक्ष नियुक्त करने में देरी कर रही है। कांग्रेस का महाधिवेशन खत्म होने के बाद 18 मार्च को कहा जा रहा था कि दो से तीन दिन में नए अध्यक्ष की नियुक्ति हो जाएगी। नए प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर जितिन प्रसाद का नाम भी तय माना जा रहा था। पर अचानक राज्यसभा से रिटायर हो रहे प्रमोद तिवारी के नाम की चर्चा हो गई और फिर दो और ब्राह्मण नाम राजेश मिश्रा व ललितेश पति त्रिपाठी का आ गया। 

राज बब्बर के इस्तीफा देने की भी पुष्ट खबर थी, पर उस पर भी चर्चा रूक गई। तभी सवाल है कि कांग्रेस आखिर क्यों देरी कर रही है? जब उसने तय कर लिया है कि राज बब्बर की जगह नया अध्यक्ष बनाया जाएगा तो देरी करने कारण समझ में नहीं आ रहा है। कांग्रेस के एक जानकार नेता का कहना है कि समाजवादी पार्टी और बसपा के बीच तालमेल को लेकर कुछ बात हो रही है और उस हिसाब से फिर कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया जाएगा। कांग्रेस ऐसा अध्यक्ष नियुक्त करेगी, जो सपा, बसपा और कांग्रेस एलायंस के समीकरण को मजबूती दे। 

दूसरी चर्चा यह भी है कि कांग्रेस गुजरात मॉडल पर चलते हुए एक से ज्यादा प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर सकती है। वहां प्रदेश अध्यक्ष के साथ साथ चार कार्यकारी अध्यक्ष बना दिए गए थे। उत्तर प्रदेश के आकार और जातीय भिन्नत को देखते हुए यह फार्मूला भी अपनाया जा सकता है। ब्राह्मण अध्यक्ष बनाने और चार कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के अलावा तीसरा फार्मूला यह भी है कि प्रदेश को चार हिस्सों में बांट कर चार लोगों को इसकी जिम्मेदारी दी जाए।  वैसे भी उत्तर प्रदेश का अघोषित विभाजन चार हिस्सों में है। पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलावा बुंदेलखंड और अवध के इलाके में मोटे तौर पर विभाजन है। पांचवां इलाका रूहेलखंड का है। सो, कांग्रेस के कुछ नेता सभी इलाकों के लिए अध्यक्ष बनाने की सलाह दे रहे हैं। यह संभव है कि एक अध्यक्ष बना कर कुछ कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाएं और उनको इन इलाकों का जिम्मा दिया जाए। इससे कांग्रेस को जातीय समीकरण साधने में भी आसानी होगी। 

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