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राहुल का क्यों अकेले प्रचार!

राहुल गांधी के हिमाचल प्रदेश के प्रचार से दूर रहने और गुजरात में अकेले प्रचार करने को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। कांग्रेस नेता हैरान परेशान हैं कि आखिर क्यों दूसरे नेताओं को प्रचार में नहीं भेजा जा रहा है। गुजरात प्रदेश के नेताओं और प्रभारी महासचिव अशोक गहलोत को लेकर राहुल अकेले प्रचार कर रहे हैं। चार चरण की नवसर्जन यात्रा में पार्टी का कोई दूसरा चेहरा नहीं दिखा। राहुल के करीबी और पार्टी के मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने गुजरात जाकर प्रेस कांफ्रेंस जरूर की, लेकिन राहुल के साथ प्रचार में नहीं गए। एक तरफ भाजपा के सारे नेता और दर्जनों केंद्रीय मंत्री गुजरात में प्रचार कर रहे हैं तो दूसरी ओर कांग्रेस ने अपने नेताओं को घरों में बैठा रखा है और अकेले राहुल प्रचार कर रहे हैं।

इसके उलट हिमाचल प्रदेश में राहुल ने बहुत कम प्रचार किया। सात नवंबर को प्रचार बंद होने से एक दिन पहले वे वहां गए और रैली करके चले आए। तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में कहा था कि कांग्रेस ने पहले ही हार मान ली है इसलिए उसके नेता प्रचार नहीं कर रहे हैं। कांग्रेस के दूसरे नेता भी अब यह बात कहने लगे हैं। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा है कि राहुल को हार के डर से हिमाचल से दूर रखा गया और जीत की उम्मीद में गुजरात में दौड़ाया जा रहा है।

कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक पार्टी के अंदरूनी सर्वेक्षणों में हिमाचल हारने का अनुमान जताया गया है और गुजरात जीतने की पक्की संभावना बताई गई है। तभी राहुल हिमाचल में प्रचार के लिए नहीं गए और यह तय हुआ कि पार्टी हारती है तो उसका ठीकरा वीरभद्र सिंह के सर फूटने दिया जाए। वैसे भी पार्टी ने उम्मीदवारों के फैसले से लेकर प्रचार तक का सारा जिम्मा उनको पहले से दे रखा था।

दूसरी ओर गुजरात में कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पद का दावेदार नहीं घोषित किया और एक प्रदेश अध्यक्ष के साथ साथ चार कार्यकारी अध्यक्ष बना दिए। उसके बाद अकेले राहुल का चेहरा दिखाया जा रहा है। इसका मकसद यह है कि अगर कांग्रेस जीते तो उसका पूरा श्रेय अकेले राहुल को मिले। यह प्रचार हो कि राहुल ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह को अकेले उनके गढ़ में हरा दिया। इसी वजह से राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने का फैसला भी टला हुआ है।

उनके करीबी नेता चाहते हैं कि वे गुजरात की बड़ी जीत के बाद अध्यक्ष बनें और स्वाभाविक रूप से विपक्षी गठबंधन के नेता बनें। तभी कहा जा रहा है कि आगे के प्रचार में भी अकेले राहुल गांधी का ही चेहरा दिखेगा। पर खतरा यह है कि अगर कांग्रेस का अनुमान गलत हुआ और पार्टी नहीं जीती तो इस हार का ठीकरा भी अकेले राहुल पर ही फूटेगा और उससे उबर पाना आसान नहीं होगा।

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