एक समय था, जब निजीकरण को लेकर भारत में बहुत शोर मचता था। सरकार कोई भी कंपनी या किसी कंपनी में हिस्सेदारी बेचती थी तो बड़ा विवाद होता था। अब ऐसा नहीं होता है। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने भारत की सबसे मूल्यवान कंपनियों में से एक भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी का करीब छह फीसदी हिस्सा बेचा। लेकिन कोई शोर शराबा नहीं हुआ। अब सरकार निजीकरण का एक नया म़डल ले आई है। इस मॉडल से ऐसा लग रहा है कि भारत की सामरिक और अंतरिक्ष क्षेत्र की दोनों प्रीमियम संस्थाओं का काम तमाम होगा। एक इसरो निशाने पर है और दूसरा डीआरडीओ। इसरो के कर्मचारियों ने तो संभावित निजीकरण का विरोध भी शुरू कर दिया है।
भारत सरकार जो मॉडल ले आई है वह अनोखा है। दुनिया में शायद कहीं ऐसा मॉडल नहीं होगा। भारत सरकार कह रही है कि अंतरिक्ष से संबंधित तमाम अनुसंधान व विकास का काम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो करेगा और सेटेलाइट बनाने, लॉन्च करने का काम निजी कंपनियां करेंगी। सोचें, अनुसंधान व विकास यानी आरएंडडी पर निजी कंपनियां खर्च नहीं करेंगी। वह खर्च आम आदमी के टैक्स के पैसे से सरकार करेगी और उसके बाद सेटेलाइट बनाने व लॉन्च करने का यानी मुनाफा कमाने का काम निजी कंपनियां करेंगी। यही मॉडल डीआरडीओ में भी लागू होगा। शोध व विकास का काम डीआरडीओ में होगा और उस तकनीक पर आधारित रक्षा उपकरण बनाने का काम निजी कंपनियां करेंगी। कुछ खास कारोबारी समूहों को फायद पहुंचाने वाली इस योजना को यह कह कर प्रचारित किया जा रहा है कि इसरो और डीआरडीओ रिसर्च करने वाले प्रीमियम संस्थान बनेंगे। सवाल है कि सरकार इसी प्रक्रिया को उलट क्यों नहीं दे रही है? अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में रिसर्च का काम निजी कंपनियां करें और उत्पाद बनाने का काम इसरो व डीआरडीओ के पास रहे!
