संसद का मानसून सत्र समाप्त हुए डेढ़ महीने से ज्यादा हो गए। सत्र 13 अगस्त को स्थगित हुआ था। लेकिन अभी तक सत्रावसान नहीं किया गया है। संसद स्थघित हुए 47 दिन हो गए हैं। आमतौर पर अनिश्चितकाल तक के लिए स्थगित होने के एक हफ्ते में सत्रावसान कर दिया जाता है। उसके बाद जब भी सत्र आहूत करना होता है तो राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति तय करती है और राष्ट्रपति से सत्र बुलाने का अनुरोध करती है। अगर सत्रावसान नहीं होता है तो सरकार जब चाहे फिर सत्र चालू कर सकती है। तभी हैरानी की बात है कि अगर सत्रावसान हो भी जाता है तो सरकार को नया सत्र बुलाने में कोई परेशानी नहीं होगी। फिर भी सत्रावसान नहीं किया जा रहा है। पहले कहा जा रहा था कि सरकार दो तिहाई बहुमत जुटाने में लगी है इसलिए सत्रावसान नहीं किया जा रहा है। उसे महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पास कराना है।
लेकिन अगर बहुमत का जुगाड़ नहीं हो पा रहा है तो सत्र का सत्रावसान कर दिया जाए, जब जुगाड़ हो जाएगा तो सरकार आराम से सत्र बुला सकती है। वैसे भी अब दो महीने से कम समय में संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होगा। तभी यह समझ में नहीं आ रहा है कि क्यों सत्रावसान नहीं किया जा रहा है। क्या नरेंद्र मोदी की सरकार इस मामले में भी कांग्रेस की सरकारों का रिकॉर्ड तोड़ना चाहती है? गौरतलब है कि कांग्रेस की राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने 12 मई से 27 जुलाई 1987 तक सत्रावसान नहीं किया था। इसके बाद 1989 में एक मौका आया था जब 61 दिन तक सत्रावसान नहीं हुआ था। तीसरा सबसे ज्यादा दिन तक सत्रावसान नहीं करने का रिकॉर्ड पंडित नेहरू का था। 22 दिसंबर 1950 से पांच फरवरी 1951 तक सत्रावसान नहीं हुआ था। नरेंद्र मोदी की सरकार ने उस रिकॉर्ड को तोड़ दिया है। क्या अब राजीव गांधी की सरकार के समय बना दोनों रिकॉर्ड तोड़ना है?
