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जेल से लड़ना और जीतना आसान

यह भारतीय लोकतंत्र की कमाल की विडम्बना है कि जेल में बंद व्यक्ति वोट नहीं दे सकता है लेकिन चुनाव लड़ सकता है। पिछले लोकसभा चुनाव में जेल में बंद जिन लोगों ने चुनाव लड़ा और उनमें से दो लोग सांसद बने। पंजाब की खदूर साहिब सीट से अमृतपाल सिंह और जम्मू कश्मीर की बारामूला सीट से इंजीनियर राशिद। दोनों देशद्रोह जैसे गंभीर आरोप में जेल में बंद हैं लेकिन चुनाव लड़ने के संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करके वे लड़े और जीते। हालांकि बाद में राशिद ने जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में भी अपनी पार्टी को लड़ाया, जिसके लिए उसे पैरोल भी मिली लेकिन कामयाबी नहीं मिल पाई। बहरहाल, अमृतपाल और राशिद की सफलता से प्रभावित होकर अब जेल में बंद शरजील इमाम ने भी चुनाव लड़ने का फैसला किया है।

दिल्ली के 2020 के दंगों की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार शरजील इमाम चाहता है कि बिहार से चुनाव लड़ने के लिए उसे अंतरिम जमानत दी जाए। उसने कहा है कि उसे निर्दलीय लड़ना है इसलिए नामांकन से लेकर प्रचार का सारा काम उसे ही करना होगा। उसके पास पार्टी का सेटअप नहीं है। इसलिए जमानत दी जाए। वह बिहार के मुस्लिम बहुल सीमांचल की बहादुरगंज सीट से लड़ना चाहता है, जो किशनगंज लोकसभा के तहत के आती है। मुस्लिम बहुल सीट है, जहां मुस्लिम आबादी करीब 70 फीसदी है। दो बार से असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के अंजर नईमी इस सीट पर जीत रहे हैं। शरजील इमाम के इस सीट पर निर्दलीय लड़ने से ओवैसी की पार्टी को मुश्किल हो सकती है। सोशल मीडिया में शरजील के लिए बड़ी सहानुभूति है और उसे इस रूप में पेश किया जा रहा है, जैसे वह भाजपा से प्रताड़ित मुस्लिम का प्रतिनिधि चेहरा हो। उसका लड़ना ‘इंडिया’ ब्लॉक और ओवैसी दोनों का समीकरण बिगाड़ सकता है। एनडीए इसमें फायदा उठाने की कोशिश करेगा।

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