यह लाख टके का सवाल है कि सुनेत्रा पवार की पार्टी एनसीपी का मामला कौन उलझा रहा है? वे एनडीए में हैं और उनकी पार्टी महाराष्ट्र की सरकार में शामिल है। भाजपा में किसी के साथ टकराव या किसी की नाराजगी का भी कोई मामला नहीं है क्योंकि वे अपने पति अजित पवार के निधन के बाद ही पार्टी के कामकाज में ज्यादा सक्रिय हुई हैं। फिर भी ऐसा लग रहा है कि उनको परेशान करने की राजनीति हो रही है। सामने से चेहरा उनकी पार्टी के बड़े नेता प्रफुल्ल पटेल का दिख रहा है लेकिन अकेले उनमें इतनी राजनीतिक ताकत नहीं है कि वे सुनेत्रा पवार को परेशान कर सकें। तभी सवाल है कि प्रफुल्ल पटेल को किसकी शह है? क्या भाजपा के किसी बड़े नेता का समर्थन उनको मिल रहा है या महाराष्ट्र में मराठा राजनीति पर एकछत्र कब्जा बनाने का प्रयास कर रहे एकनाथ शिंदे उनका साथ दे रहे हैं?
ये सवाल इसलिए हैं क्योंकि अजित पवार के निधन के छह महीने से भी कम समय में उनकी पार्टी पर कब्जा करने की दूसरी बार कोशिश हो रही है। पहली बार तो उनके निधन के अगले ही दिन चुनाव आयोग को एक पत्र भेजा गया था, जिसमें कहा गया था कि प्रफुल्ल पटेल पार्टी के अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर काम करेंगे। उस समय वे कार्यकारी अध्यक्ष थे। हालांकि बाद में सुनेत्रा पवार मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष दोनों हो गईं और चुनाव आयोग को चिट्ठी भेज कर पहले भेजी गई चिट्ठी को खारिज कर दिया था।
अब एक बार फिर पार्टी के सचिव और झारखंड प्रदेश एनसीपी के प्रमुख सच्चिदानंद सिंह ने सुनेत्रा पवार को नोटिस भेजा है। उन्होंने सुनेत्रा के अध्यक्ष चुने जाने के तौर तरीके पर सवाल उठाया है। उन्होंने चुनाव आयोग को भी इस बारे में लिखा है। इस बीच प्रफुल्ल पटेल ने भी कहा है कि पार्टी के कामकाज को व्यवस्थित करने या ठीक करने की जरुरत है। बताया जा रहा है कि सुनेत्रा पवार के बेटे पार्थ पवार की बढ़ती राजनीतिक ताकत से बाकी नेता नाराज हैं। दूसरी ओर अजित पवार के निधन और शरद पवार की विदाई बेला को देखते हुए एकनाथ शिंदे अकेले मराठा नेता बनने की हसरत पाले हुए हैं। अगर एनसीपी में प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे, छगन भुजबल आदि का कब्जा हो जाए तो वह भी गैर मराठा पार्टी हो जाएगी। अगर शिंदे मजबूत होते हैं तो उनके जरिए देवेंद्र फड़नवीस को को काबू में रखना आसान होगा। तभी इस पूरे मामले में दिल्ली की भूमिका भी देखी जा रही है।
