पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्र संघ चुनाव में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की छात्र ईकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी ने अध्यक्ष का चुनाव जीत लिया। एबीवीपी ने लगातार दूसरे साल पंजाब यूनिवर्सिटी छात्र संघ का चुनाव जीता है। यह पहली बार हुआ है कि उसने बैक टू बैक छात्र संघ के चुनाव में जीत हासिल की है। शिरोमणी अकाली दल ने इस चुनाव में एबीवीपी का साथ दिया था। एएसएपी और एनएसयूआई दोनों काफी पीछे रहे। कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन और ‘जेन जी’ की नाराजगी की खबरों के बीच यह छात्र संघ का पहला चुनाव था। तभी इस चुनाव नतीजे को एक यूनिवर्सिटी का चुनाव नतीजा कह कर खारिज नहीं किया जा सकता है। पंजाब की चुनावी राजनीति के हिसाब से इसे देखने की जरुरत है।
इस नतीजे के कई तरह के असर हो सकते हैं। पहला असर तो यह होगा कि भारतीय जनता पार्टी की मोलभाव की ताकत बढ़ेगी। वह अकाली दल के साथ सीट बंटवारे पर बात कर रही है। ध्यान रहे आखिरी बार दोनों पार्टियां 2017 में एक साथ लड़ी थीं। तब भाजपा सिर्फ 23 सीटों पर लड़ी थी। इस बार 117 सीटों में से भाजपा आधी सीटें लड़ना चाहती है। यहां तक खबर है कि भाजपा ने अकाली दल से ज्यादा सीटें मांगीं हैं और कहा है कि मुख्यमंत्री का फैसला चुनाव के बाद होगा। बहरहाल, पंजाब यूनिवर्सिटी छात्र संघ के चुनाव नतीजे का एक आकलन यह भी है कि शहरी इलाकों में भाजपा और अकाली गठबंधन ठीक काम कर रहा है। गौरतलब है कि पंजाब के शहरी इलाकों में भाजपा का आधार अपेक्षाकृत मजबूत है। शहरीकरण बढ़ने और कृषि कार्यों में शिथिलता आने के बाद पंजाब में लोगों का मतदान व्यवहार भी प्रभावित हुआ है। इसका एक संकेत यह भी है कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है या भाजपा बहुत मजबूत नहीं है वहां लोगों में उसे लेकर जिज्ञासा है और वहां छात्रों व युवाओं में भी बहुत नाराजगी नहीं है।
