बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्त्री और पुरुष के यौन संबंधों के बारे में जिस ग्राफिक्स डिटेल के साथ विधानसभा और फिर विधान परिषद में अपनी बात कही उसके बाद उनको लेकर आम लोगों में धारणा बदलने लगी है। अपने इस भाषण से उन्होंने अपना सबसे प्रतिबद्ध मतदाता समूह खो दिया है। बिहार की महिलाएं उनमें अपना मसीहा देखती थीं। वे हर स्थिति में उनको वोट देती थीं। नीतीश में अपनी सुरक्षा देखती थीं। आखिर नीतीश कुमार ने सबसे पहले बिहार में स्थानीय निकायों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण दिया। देश के किसी भी राज्य के मुकाबले बिहार में ज्यादा महिलाएं पुलिस में भर्ती हैं। शिक्षा मित्र में भी बड़ी संख्या में महिलाओं की बहाली हुई। स्कूली छात्राओं को साइकिल और पोशाक की योजना ने नीतीश कुमार को घर घर में स्थापित किया। लेकिन अपने एक भाषण से वे महिलाओं में बुरी तरह से अलोकप्रिय हुए हैं।
इसके अलावा उनके भूलने की बीमारी, कुछ भी बोलने, कहीं भी चले जाने आदि की जो चर्चा है उससे जनता दल यू के नेताओं में परेशानी है। उनको समझ में नहीं आ रहा है कि आगे नीतीश कुमार क्या करेंगे। वे राजद और कांग्रेस के साथ रहेंगे या भाजपा के साथ चले जाएंगे। यह भी आशंका है कि कहीं वे अपनी पार्टी का विलय तो राजद में नहीं कर देंगे। इस अनिश्चितता की वजह से जदयू की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। ध्यान रहे जदयू का मतलब नीतीश कुमार है। उनके अलावा पार्टी में कुछ नहीं है। उनके मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जिस तरह की चर्चाएं हैं और वे जिस तरह का आचरण कर रहे हैं उसे देखते हुए लगता है कि अब जदयू का सर्वाइवल बहुत मुश्किल है। इससे भाजपा को मुराद पूरी हो रही है। बिहार में भाजपा के सत्ता में आने में रास्ते में एकमात्र बाधा नीतीश कुमार हैं। अगर वह बाध खत्म होती और भाजपा का मुकाबला राजद से होता है तो घर बैठे भाजपा बिहार की सत्ता हासिल कर लेगी।