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अविश्वास प्रस्ताव से विपक्ष घाटे में

विपक्षी पार्टियों द्वारा नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करने से क्या हासिल होगा? विपक्षी पार्टियां कह रही हैं कि प्रधानमंत्री को मणिपुर के मसले पर संसद में बयान देने के लिए बाध्य करने का यही एक तरीका था। पहला सवाल तो यह है कि प्रधानमंत्री को संसद में बोलने के लिए बाध्य करना क्यों जरूरी है? संसद में बोलने या नहीं बोलने से मणिपुर की स्थिति पर क्या फर्क पड़ने वाला है? क्या संसद में बोलने पर यह अनिवार्यता हो जाएगी कि प्रधानमंत्री मणिपुर के मुख्यमंत्री पर कोई कार्रवाई करें या संसद में उनके बोल देने से मणिपुर में शांति बहाली हो जाएगी? यह सही बात है कि प्रधानमंत्री को मणिपुर पर बोलना चाहिए और संसद में बोलें तो और भी बेहतर है। लेकिन अगर वे नहीं बोलना चाहते तो उनसे जबरदस्ती बुलवा कर विपक्ष को कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है।

दूसरी बात यह है कि मणिपुर के मसले पर जितने भी नेता संसद में मुखर दिख रहे हैं उनमें से कोई भी अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान नहीं बोल पाएगा। अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा सिर्फ लोकसभा में होती है और वहां न मल्लिकार्जुन खड़गे हैं, न मनोज झा हैं, न संजय सिंह हैं, न राघव चड्ढा हैं। पी चिदंबरम और जयराम रमेश भी नहीं है। कांग्रेस के पास राहुल गांधी का विकल्प है। अधीर रंजन चौधरी जब भी बोलते हैं तो उसमें सेल्फ गोल की संभावना हमेशा रहती है। दूसरी ओर भाजपा के सारे दिग्गज लोकसभा में हैं और वहां उसका प्रचंड बहुमत है। सो, मुकाबला एकतरफा हो जाएगा। इससे बेहतर होता कि नियम 176 के तहत ही चर्चा हो जाती तो इतना टकराव नहीं होता और शांति से कामकाज हो रहा होता।

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