भारतीय जनता पार्टी को जब ममता बनर्जी बाहरी बता रही थीं और बांग्ला संस्कृति के लिए खतरा बता कर प्रचार कर रही थीं तब भाजपा ने दावा किया था कि वह बांग्ला संस्कृति पर आंच नहीं आने देगी। लेकिन सरकार बनने के बाद ऐसा लग रहा है कि बंगाली लोगों के खान पान के बाद अब उनकी पढ़ने लिखने की संस्कृति पर हमले हो रहे हैं। लेफ्ट और तृणमूल कांग्रेस के समय जो राजनीतिक संस्कृति बनी थी वह नहीं बदली है। अब भी पहले के जैसे ही नेताओं पर हमले हो रहे हैं। विपक्षी पार्टी के कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है और वसूली का पुराना सिस्टम चल रहा है। बस चेहरे बदल गए हैं।
हैरानी की बात है कि भाजपा की सरकार बनने के बाद भी राजनीतिक संस्कृति जस की तस है और संस्कृति खतरे में आ गई। इस बार दुर्गापूजा को लेकर खबर है कि सीपीएम के कई बुक स्टॉल्स पर हमला हुआ। दूसरी जगह के लोगों को शायद पता नहीं हो लेकिन पश्चिम बंगाल यह संस्कृति रही है कि दुर्गापूजा के दौरान पंडालों के बाहर और जगह जगह पर किताबों की दुकानें लगाई जाती हैं। राजनीतिक दल भी किताबों के स्टॉल लगाते हैं। लोग किताबें खरीदते हैं। यह उनकी संस्कृति का हिस्सा है। लेकिन जाधवपुर यूनिवर्सिटी के बाहर से लेकर दूसरे कई हिस्सों में सीपीएम के बुक स्टॉल्स पर हमले हुए हैं। भाजपा के नेता इस तरह की घटनाओं से पल्ला झाड़ रहे हैं लेकिन यह सरकार के ऊपर बड़ा सवाल है। कुछ दिन पहले लोगों ने देखा ही कि कैसे दुर्गापूजा के दौरान मांस, मछली नहीं खाने की अपील कराई गई। जब इस पर विवाद हुआ तो भाजपा के नेता मंदिरों में बैठ कर मछली खाने लगे।
