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येचुरी को निमंत्रण ठुकराने की जरुरत नहीं थी?

सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी को लेकर खबर आई है कि उन्होंने अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में रामलला की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम का निमंत्रण ठुकरा दिया है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की ओर से 22 जनवरी के कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता मिला था लेकिन येचुरी ने उसे ठुकरा दिया है। सीपीआई के महासचिव डी राजा को भी न्योता मिला है लेकिन वे भी नहीं जाएंगे। येचुरी भी चुपचाप नहीं जाते उनको न्योता ठुकराने और मीडिया में उसकी खबर बनवाने की क्या जरुरत थी? येचुरी ने अगर सचमुच न्योता ठुकराया है तो यह बड़ा राजनीतिक विवाद बनेगा और समूचे विपक्षी गठबंधन को इसका नुकसान उठाना पड़ेगा।

राम जन्मभूमि मंदिर का उद्घाटन और रामलला की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा हिंदू समाज के लिए धार्मिक के साथ साथ बड़ा सांस्कृतिक मामला भी है। इससे लोग स्वाभाविक रूप से जुड़ रहे हैं ठीक वैसे ही जैसे पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा से जुड़ते हैं। बंगाल में तो लेफ्ट के सारे नेता दुर्गापूजा के पंडालों में घूमते हैं उनको दिक्कत नहीं होती है लेकिन येचुरी को राममंदिर के कार्यक्रम में जाने में दिक्कत है! ध्यान रहे सनातन के विरोध में दिए गए बयान से उदयनिधि स्टालिन को तमिलनाडु में जो फायदा हो लेकिन पूरे उत्तर भारत में विपक्षी गठबंधन को इसका नुकसान हो रहा है। उसी तरह येचुरी के न्योता ठुकराने से केरल में जो फायदा हो लेकिन बाकी देश में उनके साथ साथ विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ का बड़ा नुकसान होगा। हर बार वे जब विपक्षी नेताओं के साथ दिखेंगे तो भाजपा को उनके बहाने बाकी नेताओं को हिंदू विरोधी बताने में आसानी होगी।

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