राजधानी दिल्ली में छह से नौ अक्टूबर तक विपक्षी पार्टियों ने प्रदर्शन किया। राहुल गांधी के साथ 19 विपक्षी पार्टियों के 178 लोकसभा सदस्य और 62 राज्यसभा सदस्य प्रदर्शन कर रहे थे। विपक्ष ने 30 सितंबर को साझा बैठक करके तय किया था कि छह अक्टूबर को चुनाव आयोग के मुख्यालय निर्वाचन सदन का घेराव करेंगे। इसके बावजूद न तो निर्वाचन सदन को सुरक्षित रखने के लिए देश भर से अर्धसैनिक बुलाए गए और न विपक्ष को रोकने के लिए उनके लोगों को घरों में नजरबंद किया गया। सुरक्षा बलों ने किसी को नहीं रोका। संसद भवन से मार्च शुरू हुआ तो नीति आयोग के सामने उसे रोक दिया गया। उसके बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने थोड़ी उछलकूद की, राहुल बैरिकेड पर चढ़े और फिर आकाशवाणी परिसर में धरने पर बैठ गए, जहां से करीब आठ घंटे बाद उनको हटा दिया गया। दूसरे दिन भी इसी तरह का प्रदर्शन हुआ। विपक्षी सांसद जंतर मंतर की ओर बढ़े। पुलिस ने उन्हें दो सौ मीटर पहले रोक दिया। वहां प्रियंका गांधी वाड्रा जमीन पर लेट गईं, लेकिन पुलिस सबको उठा ले गई और दो घंटे में छोड़ दिया। उसके अगले दिन राजघाट और फिर राष्ट्रपति भवन तक मार्च हुआ। किसी को रोकने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं हुआ।
लेकिन 10 अक्टूबर के कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन को रोकने के लिए देश के अलग अलग राज्यों से अर्धसैनिक बलों की 221 टुकड़ियां दिल्ली बुलाई गईं। आठ से 12 अक्टूबर तक उनको दिल्ली में तैनात किया गया। दिल्ली पुलिस के जवानों, अधिकारियों की छुट्टी रद्द कर दी गई। 15 हजार जवान तैनात किए गए। ड्रोन से निगरानी शुरू हुई। मेट्रो स्टेशन बंद किए गए। ट्रेनें रद्द की गईं। कनॉट प्लेस और आसपास की दुकानें बंद करा दी गईं। इंटरनेट बंद करा दिया गया। दो दिन शराब की दुकानें बंद रहीं। सीजेपी के समर्थकों को उनके घरों से गिरफ्तार किया गया। पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने शनिवार को पूरी दुनिया के जंग का मैदान बना दिया। सेंट्रल दिल्ली से बहुत दूर के इलाकों में भी बैरिकेडिंग थी, चेकिंग हो रही थी और लोग पकड़े जा रहे थे।
