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यूसीसी का इतना घुमावदार रास्ता क्यों?

New Delhi, Apr 16 (ANI): Prime Minister Narendra Modi speaks in Lok Sabha during the Budget Session (2026-27) of Parliament, in New Delhi on Thursday. (Sansad TV/ANI Video Grab)

भारतीय जनता पार्टी के गठन के बाद यानी छह अप्रैल 1980 से लेकर जितने भी चुनाव हुए उनमें तीन वादे जरूर होते थे। पहला जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करना। दूसरा, अयोध्या में राममंदिर का निर्माण और तीसरा, समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी। पहले दो वादे भाजपा ने पूरे कर दिए। 2019 के अगस्त में अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35 हटा दिया गया और इतना ही नहीं जम्मू कश्मीर का विभाजन करके दो राज्य बनाए गए और उसे केंद्र शासित प्रदेश भी बना दिया गया। अगस्त 2020 में राम जन्मभूमि मंदिर का शिलान्यास हुआ और जनवरी 2024 में उसका उद्घाटन भी हो गया। ये दोनों काम भाजपा ने डंके की चोट पर किए। राम मंदिर की जमीन का फैसला भले सुप्रीम कोर्ट ने किया लेकिन उसके बाद शिलान्यास और उद्घाटन दोनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत भी उनके साथ रहे। तभी सवाल है कि तीसरे वादे यानी यूसीसी लागू करने के लिए भाजपा की केंद्र सरकार सीधा रास्ता पकड़ने की बजाय क्यों इतना घुमावदार रास्ता ले रही है?

सरकार को जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने चुनौती दी है कि वह सीधे संसद से कानून बना कर पूरे देश में एक कानून लागू करे। पहले बात भी ऐसी ही हुई थी और वादा भी ऐसा ही था कि पूरे देश में एक कानून होना चाहिए। लेकिन पूरे देश के लिए एक समान नागरिक कानून बनाने की बजाय केंद्र सरकार ने राज्यों का रास्ता पकड़ा है। स्टेट रूट से वह एक समान कानून बनवा रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने खुद कानून बनाने के लिए संसद में बिल पेश करने की बजाय ऐलान किया है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले देश के 21 उन राज्यों में यूसीसी लागू हो जाएगी, जहां भाजपा और एनडीए की सरकार है। हालांकि यह सवाल अपनी जगह है कि अगले दो साल में 14 राज्यों में चुनाव होने वाले हैं और अगर भाजपा अपने शासन वाले कुछ राज्यों में हार गई तो क्या होगा या एनडीए के सहयोगी तैयार नहीं हुए तो क्या होगा?

बड़ा सवाल घुमावदार रास्ता पकड़ने को लेकर है। जानकार सूत्रों का कहना है कि सरकार की तैयारी केंद्रीय कानून बनाने की ही थी। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों से सारा मामला बिगाड़ दिया। बताया जा रहा है कि उत्तराखंड में जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई कमेटी बनवा कर प्रायोगिक तौर पर इसे लागू करना था और उसके बाद उस कमेटी की सिफारिशों पर बने कानून को पूरे देश में लागू करने की योजना थी। लेकिन संसद में सरकार के पास दो तिहाई बहुमत नहीं है। ऊपर से महिला आरक्षण विधेयक के मामले में सरकार एक बार मात खा चुकी है। सरकार ने विशेष सत्र बुला कर इस कानून में संशोधन का प्रस्ताव रखा था लेकिन सरकार का बिल पास नहीं हो सका। हालांकि समान नागरिक संहिता के मामले में केंद्र सरकार ने राज्यों का रास्ता पहले ही पकड़ लिया था। जून 2024 के बाद ही भाजपा शासित राज्यों को कह दिया गया था कि वे समान नागरिक कानून का मसौदा तैयार कराएं। इसके लिए उत्तराखंड का कानून टेम्पलेट बना। उसमें थोड़ा बहुत बदलाव करके अलग अलग राज्यों में लागू किया जा रहा है। गुजरात, मध्य प्रदेश और असम ने विधानसभा से विधेयक पास करा लिया है। जल्दी ही अन्य राज्यों में भी इसे पास कराया जाएगा। हालांकि गोवा में खुद भाजपा ने इस बिल पर ब्रेक लगा दिया। सारी तैयारी के बावजूद फैसला किया गया कि चुनाव के बाद बिल पास कराया जाएगा।

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