किसी भी मामले की विशेष जांच टीम यानी एसआईटी से जांच कराने से कुछ भी हासिल नहीं होता है। किसी अपराध की जांच के लिए जिस विशेषज्ञता की जरुरत होती है, जैसे उपकरण चाहिए होते हैं, जिस तरह की टीम और जितना समय चाहिए होता है वह एसआईटी के पास नहीं होती है। इसलिए एसआईटी सिर्फ लोगों के गुस्से को तत्काल ठंडा करने के लिए बनाया जाता है। यह अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के चढ़ावा चोरी मामले में बनाई गई एसआईटी की जांच से भी पता चला है। एसआईटी ने एक हफ्ते तक जांच की और रिपोर्ट राज्य के गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय प्रसाद को अपनी रिपोर्ट सौंपी। संजय प्रसाद मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव भी हैं। वे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पदेन सदस्य भी हैं। सोचें, जो ट्रस्ट सवालों के घेरे में है और जिसकी संदिग्ध भूमिका की जांच होनी है उसी के एक सदस्य को एसआईटी रिपोर्ट सौंप रही है तो इसकी शुचिता के बारे में क्या कहा जा सकता है?
इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि एसआईटी बनने से पहले मंदिर प्रशासन गुचपुच तरीके से जांच करा रहा था, जिसमें स्थानीय पुलिस शामिल थी। दो करोड़ रुपए की कथित बरामदगी एसआईटी ने नहीं की है, बल्कि इसी गुपचुप जांच के दौरान यह बरामदगी होने की खबर है। इसका अर्थ है कि मामला काफी पहले से चल रहा है। न पहले गुपचुप जांच फॉरेंसिक तरीके से हुई है और न एसआईटी की जांच हुई है। कहा जा रहा है कि एसआईटी ने एफाआईआर करने की सिफारिश की है। सोचें, घटना सामने आने के तीन हफ्ते के बाद एफआईआर होगी और जांच शुरू होगी तो क्या मिलेगा? सभी आरोपियों को पर्याप्त समय मिल गया है कि वे अपने ट्रैक कवर कर लें। सीसीटीवी फुटेज पहले ही डिलीट हो चुकी है। सो, अब एफआईआर कराएं या किसी भी एजेंसी से जांच कराएं, इस मामले में कुछ नहीं होने वाला है। हां, इसी बहाने ट्रस्ट के अदंर और बाहर की गुटबाजी भी सामने आई है। इसमें कोई गुट हालात का फायदा उठा कर प्रशासन का नया सिस्टम बनाए तो वह एक कहानी होगी। लेकिन उससे भी चंदे और चढ़ावे की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी।
