इसे लेकर दो तरह की खबरें हैं। एक खबर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी तीसरी सरकार के दो साल पूरे होने के बाद यानी नौ जून के बाद मंत्रिमंडल में बदलाव करेंगे और वह बड़ा बदलाव होगा। दूसरी खबर है कि बदलाव छोटा मोटा होगा। कहा जा रहा है कि अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को ध्यान में ऱखते हुए कुछ बदलाव किया जाएगा। असल में क्या होगा यह कोई नहीं जानता है। ऐसे मामलों में लोगों को जानकारी तभी मिलेगी, जब ऊपर से बताया जाएगा। अगर नहीं बताना होगा तो पश्चिम बंगाल सरकार जैसा हो जाएगा। वहां जब तक मंत्रियों ने शपथ पढ़नी नहीं शुरू की, तब तक किसी को पता नहीं चला कि कौन कौन शपथ लेगा। भाजपा इस हद तक गोपनीयता रख सकती है क्योंकि फैसला दो लोगों को करना है।
सो, बदलाव कैसा होगा इसका अंदाजा किसी को नहीं है। सिर्फ नरेंद्र मोदी और अमित शाह जानते हैं क्या होना है। लेकिन जैसे हालात हैं उन्हें देखते हुए बड़े बदलाव की जरुरत है और सबसे ज्यादा जरुरत कुछ बड़े मंत्रियों को बदलने की है। पिछले सात साल से निर्मला सीतारमण वित्त मंत्री हैं। अभी जैसी देश की अर्थव्यवस्था है उसे देखते हुए लग नहीं रहा है कि उनके पास कोई नया आइडिया है, जिससे भारत की वित्तीय स्थिति में सुधार हो। एक तरफ रुपया बुरी तरह से गिरता जा रहा है और सरकार से बाहर के आर्थिक जानकार कई तरह के सुझाव दे रहे हैं। परंतु न तो वित्त मंत्री के पास कोई आइडिया दिख रहा है और न रिजर्व बैंक के गवर्नर के पास कोई नई दृष्टि दिख रही है। रुपया गिरने से भारत चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से फिसल कर छठे स्थान पर पहुंच गया। संस्थागत विदेशी निवेशक यानी एफआईआई और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक यानी एफपीआई भारत के शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं।
पिछले 11 महीने में उन्होंने साढ़े चार लाख करोड़ रुपए से ज्यादा निकाले हैं। उनका मानना है कि भारत का बाजार बहुत बढ़ाया चढ़ाया गया है। ऊर्जा संकट अलग लोगों का जीवन मुश्किल कर रहा है। वित्त मंत्री ने जिस ‘थ्री एफ’ की जो बात कही है उसमें एक फर्टिलाइजर है, जिसकी कमी और महंगाई के कारण खाद्य उत्पादन पर असर होगा। ऐसे में एक नए और आर्थिकी के जानकार वित्त मंत्री की जरुरत है।
ऐसे ही देश को एक नए और अच्छे शिक्षा मंत्री की जरुरत है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी शिक्षा मंत्र रहे थे। नरेंद्र मोदी ने स्मृति ईरानी, प्रकाश जावडेकर, रमेश पोखरियाल निशंक और धर्मेंद्र प्रधान को बनाया। आज शिक्षा की हालत सबके सामने है। ध्यान रखें बाकी किसी भी मंत्रालय के मुकाबले शिक्षा ज्यादा जरूरी और विषय की समझ की मांग करने वाला मंत्रालय है। वहां ऐसे मंत्री की जरुरत है, जिसकी शिक्षा के लिए प्रतिबद्धता हो। इसके अलावा दो और मंत्रालय हैं, जहां बदलाव की जरुरत है।
इसी तरह विदेश मंत्री को भी बदलने की जरुरत है। ध्यान रहे भारत की विदेश नीति समय की एक निरंतरता रही है और वह समय की कसौटी पर खरा उतरी है। लेकिन पिछले कुछ समय से वह इतनी व्यक्ति केंद्रित हो गई है कि उससे देश की छवि पर नकारात्मक असर हुआ है। इसी तरह केल मंत्रालय को तदर्थ ढंग से नहीं चलाया जा सकता है। वहां ऐसे व्यक्ति को मंत्री बनाया गया है, जिसके पास दो और मंत्रालय हैं। बाकी मंत्रालयों का कामकाज तो जैसे तैसे चल जाता है लेकिन रेल की स्थिति ठीक नहीं है। रेल मंत्रालय की प्राथमिकता अब यात्रियों की सुविधा नहीं रह गई है। ऐसे लग रहा है कि रेल मंत्रालय फैंसी ट्रेन लॉन्च करने के अलावा कुछ खास नहीं कर रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय का हाल भी कोई खास अच्छा नहीं है। लेकिन वित्त, शिक्षा, विदेश और रेल की हालत तो भगवान भरोसे है।
