तृणमूल कांग्रेस के दूसरे सबसे बड़े नेता, पार्टी सुप्रीम को भतीजे, महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी को लोगों ने सड़क पर पीट दिया। उनके कपड़े फाड़ दिए। उनके ऊपर पत्थर और अंडे फेंके गए। उस समय वे अपनी पार्टी के एक कार्यकर्ता के घर जा रहे थे, जो चुनाव के बाद की हिंसा का शिकार हुआ था। इस घटना से कानून व्यवस्था का सवाल तो उठता ही है साथ ही राज्य की राजनीतिक संस्कृति पर बड़ा सवाल उठता है। यह भी दिख रहा है कि भाजपा बड़ी तेजी से हिंसा की वही संस्कृति अपना रही है, जो पहले वाम मोर्चे की सत्ता के समय लेफ्ट पार्टियों ने अपनाई थी और ममता सरकार के समय तृणमूल के लोगों ने अपनाई थी।
लेकिन उससे बड़ा सवाल यह है कि तृणमूल कांग्रेस के सांसद, विधायक और नेता कहां चले गए? राज्य में तृणमूल कांग्रेस को 41 फीसदी से ज्यादा वोट मिला है। उसके 80 विधायक हैं और 29 लोकसभा सांसदों के साथ 10 से ज्यादा राज्यसभा सांसद हैं। यह भी सवाल है कि जब पार्टी के दूसरे सबसे बड़े नेता किसी राजनीतिक कार्यक्रम में जा रहे थे तो उनके साथ पार्टी के दूसरे लोग क्यों नहीं थे? उनके साथ स्थानीय विधायक या पूर्व विधायक, अन्य नेता व कार्यकर्ता होने चाहिए थे साथ ही वहां पुलिस भी होनी चाहिए थी। सोचें, बिहार में राजद के सिर्फ 25 विधायक हैं लेकिन राजद नेता तेजस्वी यादव के ऊपर कहीं भी हमला नहीं हो सकता है। ऐसी मारपीट की तो बात ही भूल जाइए। अखिलेश यादव के पास भी एक समय सिर्फ 47 विधायक थे। लेकिन तब भी ऐसा कुछ नहीं हुआ, जैसा अभिषेक के साथ बंगाल में हुआ है। क्या सचमुच बंगाल में राजनीति लोग ऐसे ही कमजोर और डरपोक होते हैं कि सत्ता हाथ में होगी तभी लड़ेंगे?
