अंधे है लेकिन पता नहीं अंधे है!

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भारत सन् 2020 में उस अनुभव में गुजरा है, जिससे शेष दुनिया भी गुजरी। पर भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दैवीय घटना का जुमला बोल असहायता प्रकट की।

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भारत सन् 2020 में उस अनुभव में गुजरा है, जिससे शेष दुनिया भी गुजरी। पर भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दैवीय घटना का जुमला बोल असहायता प्रकट की। दुनिया में किसी देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या वित्त मंत्री के मुंह से प्रकट नहीं हुआ कि ‘एक्ट ऑफ गॉड’ के आगे क्या करें! तभी वर्ष 2020 का भारत अनुभव कई बुनियादी सवाल-विचार लिए हुए है। जर्जर आर्थिकी और ऊपर से महामारी! दोनों की चुनौती के बीच में 138 करोड़ लोगों के राष्ट्र-राज्य का उभरा बुनियादी सवाल है कि हमारी बुद्धि, हमारा पुरुषार्थ क्या बिना इस भान, लक्ष्य-उद्देश्य के नहीं है कि हमें करना क्या है? हम भले-बुरे को बूझ नही पाते। बुद्धि और निर्बुद्धि का भेद नहीं कर पाते।

क्या कभी सोचा गया कि 1947 से पहले भारत ब्रिटेन का कैसा आर्थिक उपनिवेश था और आज हम चीन पर कैसे आश्रित हैं? जवाहरलाल नेहरू., पीवी नरसिंह राव, नरेंद्र मोदी के तीन अलग-अलग व्यक्तित्वों ने जिन उद्देश्यों में भारत का जो पुरुषार्थ बनाया था तो उससे भारत को कुल जमा क्या प्राप्त हुआ? नेहरू का भी मंत्र आत्मनिर्भरता का था तो सन् 2020 में नरेंद्र मोदी भी वहीं सुर लिए हुए थे। बावजूद इसके हमारा 73 साला सफर कहां पहुंचा? भारत अनजाने-अनचाहे चीन का ऐसा आर्थिक गुलाम हुआ है कि किसी के भी पास जवाब नहीं है कि कैसे इतने निर्भर हो गए? कैसे उससे हम अपनी सार्वभौमता, अपनी जमीन बचाएं? कैसे उससे लड़ें?

सन् 2020 में भारत ‘दैवीय घटना’ की लाचारगी में जीता हुआ था लेकिन पड़ोस का मामूली बांग्लादेश तक नहीं। भारत में रिकार्ड तोड़ विकास दर गिरी जबकि बांग्लादेश की जीडीपी 3.8 प्रतिशत रफ्तार से ब़ढती हुई और भारत से आगे बढ़ते हुए। ऐसा क्यों? क्या तब यह कोई दैवीय श्राप तो नहीं जो मुगालतों, झूठ और गुलामी में ही जीना हमारी नियति है। कई पाठक असहमत हो सकते हैं लेकिन उनका पढ़ते हुए असहमति का विचार बनाना अपने लिए उपलब्धि वाली बात होगी। आखिर लेखन का उद्देश्य यह भी है कि हम हिंदीभाषी पढ़ें तो सही, सोचें तो सही!

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