है राम! यह वायरस

Sale!

Price: 100.00
Sale Price: 98.00

यह पुस्तक 21वीं सदी की महामारी पर है। कोविड़-19 के वायरस की त्रासदी पर है। उसका दस्तावेज है।

 

SKU: NIB001 Category:

Description

हरिशंकर व्यास

यह पुस्तक 21वीं सदी की महामारी पर है। कोविड़-19 के वायरस की त्रासदी पर है। उसका दस्तावेज है। उससे उठे सवालों पर विचार है तो सुर्खियों के परिपेक्ष्य में यह बतलाने का प्रयास भी है कि कोविड़ महामारी जब आई तो विश्व बिरादरी और राष्ट्र- राज्य की व्यवस्थाओं के व्यवहार में क्या फर्क था? वह क्या कुछ हुआ जिससे आपदा में करोड़ों-अरबों लोग त्रासद जीवन जीने को मजबूर हुए। इस वायरस ने मौत के ‘मायने’ बदले है तो इंसान ने ऐश्वर्य, वैभव जो बनाया है उस पर भी ताला लगाया है। सबको वायरस सोख डाल रहा है। तभी वैश्विक मायनों में उन वैश्विक नेताओं पर पहले खंड में विचार है जिन्हे ऐसे वक्त में दुनिया को नेतृत्व देना था। झूठ का पहलू वैश्विक पैमाने के नेतृत्व में भी गंभीर है। तय माने कोविड—19 की यह पहेली स्थाई अनसुलझी रहेगी कि वायरस कैसे पैदा हुआ? यदि वायरस के जन्म के तुंरत बाद चीन ने सच्चाई से विषाणु की खबर डब्बल्यूएचओ, अमेरिका-योरोप की प्रयोगशालाओं को दी होती तो महामारी इतनी जल्दी उतनी वैश्विक नहीं बनती जैसे बनी है। यह सवाल अनुतरित रहना है कि वायरस वुहान से ऐसे कैसे उड़ा जो चीन के प्रांतों में सबतरफ नहीं फैला लेकिन दुनिया के तमाम देशों में जा पहुंचा!

पुस्तक के लबोलुआब में इस पुस्तक के अंश की इन लाईनों पर गौर करें- “कोविड-19 मानों जीव जंतुओं का इंसान से बदला है! बहुत इतराते हो, हम बतलाते हैं हमारे डीएनए की एक बूंद तुम लोगों को हम जैसे मारने लगेगी! कितनी गजब बात है जो वुहान के मछली बाजार की जीव-जंतु मंडी से चमगादड़ या उल्लू जैसे किसी जंतु ने अपने डीएनए का एक छींटा इंसान की नाक या मुंह में घुसेड़ा और पूरी पृथ्वी सूतक में है! पृथ्वी के सिरमौर देश अमेरिका, पश्चिमी सभ्यता के सिरमौर गढ़ यूरोप में यह वायरस, जिस तरह लोगों की जान ले रहा है और आने वाले दिनों-महीनों में गरीब देशों में जो तांडव बनाएगा उससे निश्चिंतता से यह फिर प्रमाणित है कि इंसान याकि होमो सेंपियंस बनाम प्रकृति व शेष जीवों की लड़ाई वैसे ही चलती रहेगी, जैसे सहस्त्राब्दियों से चली आ रही है।

बारीकी से गौर करेंगे तो लगेगा कोविड-19 वायरस चिकित्सा की मानवीय उपलब्धि के घमंड को मार रहा है तो यह भी जतला दे रहा है देखो लोगों, तुम्हारे स्वजन, सगेजन याकि सब कुछ होते हुए भी तुम कैसे हम जीव-जंतुओं की तरह मर रहे हो। सोचें, जिस भी इंसान की श्वास नली में घुस विषाणु ने उसके फेफड़े पर परत बनाई नहीं की वह फिर अकेला अंतिम सांसें गिनने को शापित! शायद गिन भी नहीं पाता होगा। न किसी सगे का हाथ पर हाथ रख सांत्वना दे सकना और न उसका सगे को देख अलविदा कर सकना और न सगा उसका क्रियाकर्म कर पाए। मतलब ‘मौत’ के अर्थ को बतलाता शोक, अंत्येष्टि व क्रियाकर्म में कुछ भी तो आज इंसान के बस में नहीं। क्योंकि बाकी सब तो, परिवार, समाज, मित्र सब तो घर के बाहर तख्ती लगाए अपनी जान की चिंता में प्रार्थना कर रहे हैं कि- मौत इधर न आना!

..पूरी मानव सभ्यता दोराहे पर है। एक रास्ता चिड़ियाघर का है तो दूसरा इंसान की आजाद जिंदगी का! एक रास्ता चीन का है तो दूसरा स्वीडन, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, जर्मनी, फ्रांस, यूरोपीय संघ का। एक तरफ शी जिनफिंग, पुतिन, डोनाल्ड ट्रंप,  बोलसोनारो और नरेंद्र मोदी नाम के पंच परमेश्वर हैं, जो प्रजा को हांकते हुए वायरस के आगे ताली-थाली का विकल्प लिए हुए  है तो दूसरी और स्वीडन, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, यूरोपीय संघ की सांस्थायिक प्रकृति वाली वह लीडरशीप है, जो वैज्ञानिकता, सत्य, समझदारी और बुद्धि से वायरस की चुनौती का सामना कर रही है।

Additional information

Book Author