महान निष्क्रियता का दौर

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यह इतिहास की एक सबसे बड़ी त्रासदी के दौर में लिखे गए लेखों का संकलन है। यह तो नहीं कहा जा सकता है कि यह त्रासदी का इतिहास बताने वाला है

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यह इतिहास की एक सबसे बड़ी त्रासदी के दौर में लिखे गए लेखों का संकलन है। यह तो नहीं कहा जा सकता है कि यह त्रासदी का इतिहास बताने वाला है पर समाचार को इतिहास का पहला मसौदा माना जाता है इसलिए कह सकते हैं कि कभी कोई इस समय का इतिहास लिखेगा या समकालीन इतिहास में किसी की दिलचस्पी होगी तो उसके लिए जरूरी संदर्भ के तौर पर इनका इस्तेमाल हो सकता है। जरूरी इसलिए क्योंकि ये लेख सिर्फ महामारी की त्रासदी के दौर में नहीं लिखे गए हैं, बल्कि पत्रकारिता के सबसे त्रासद दौर में लिखे गए हैं। यह पत्रकारिता का भक्ति काल है, जिसमें सच लिखना भी बगावत करने जैसा है। इस दौर के पत्रकारों ने सत्ता की चापलूसी में मध्यकाल के दरबारी कवियों और लेखकों को भी पीछे छोड़ा हुआ है।

ऐसे दौर में लिखना, उन्हें छापना और फिर पुस्तक के रूप में दुनिया के सामने लाना सिर्फ इसलिए संभव हो सका है क्योंकि व्यास जी को लगता है कि चाहे कुछ भी हो लेकिन जो हो रहा है, हम जो देख रहे हैं, जिस समय और समाज से रूबरू हैं उसके बारे में लिखा जाना चाहिए और उसे संग्रहित भी किया जाना चाहिए। आजकल कौन पढ़ रहा है या कौन सोच रहा है, इन सवालों की उनको रत्ती भर भी चिंता नहीं रहती है। हर बार सिर्फ यह कि अपन स्वांतसुखाय लिख रहे हैं। ‘नया इंडिया’ के छपना शुरू होने के कई बरस बाद मैंने अपना कॉलम लिखना शुरू किया तो यह भी उनकी जिद और लगभग जबरदस्ती थी कि लिखो!

फिर लिखने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह कोरोना वायरस की महामारी के त्रासद दौर में भी जारी रहा। पिछले पूरे साल का लेखन इस महामारी की त्रासदी से ही जुड़ा है। चाहे राजनीति की बातें हों या आर्थिक घटनाक्रम हो या दुनिया की बातें हों, सब पर कहीं न कहीं कोरोना वायरस की छाया है। समाज का हर हिस्सा इससे किसी न किसी तरह से प्रभावित हुआ इसलिए संकलन के लेखों पर भी वायरस की छाया दिखेगी। दूसरी खास बात यह है कि ये लेख किसी विचार, सिद्धांत या दर्शन के प्रतिपादन को ध्यान में रख कर नहीं लिखे गए हैं। मोटे तौर पर समाचार विश्लेषण के तौर पर इन्हें लिखा गया है, जिसका मकसद यह है कि आम लोगों के लिए रोजमर्रा की घटनाओं के आसपास की चीजों और हो सके तो उनके पीछे के संदर्भों की समझ को साफ किया जा सके।

हर घटना जैसी दिखती है वैसी ही नहीं होती है, इस बात को किसी पत्रकार से बेहतर और कोई नहीं जानता है। इसलिए भी यह अपनी जिम्मेदारी है कि जो दिख रहा है, सिर्फ वह नहीं, बल्कि जो असल में हो रहा है वह भी लोगों तक पहुंचाया जाए। भारत में और दुनिया में भी लोग अखबारों के लिखे पर भरोसा करते हैं, टेलीविजन पर देखी गई बातों को सत्य मानते हैं और रेडियो पर जो सुनते हैं उसे आकाशवाणी मान कर उन पर यकीन करते हैं। लेकिन इन माध्यमों से जो बातें लोगों तक पहुंचती हैं वह असल में हमेशा सच नहीं होती हैं। इन दिनों तो वैसे भी हर माध्यम से सिर्फ झूठ का या गढ़े गए सच का प्रचार हो रहा है। समाचार अब विनिर्मित उत्पाद की तरह लोगों के सामने पेश किए जा रहे हैं।

ऐसे समय में ‘नया इंडिया’ में हर सामयिक घटना का बेबाक विश्लेषण हुआ। उसी विचार विश्लेषण को एक जगह इकट्ठा करके पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। लेखों का कोई क्रम शायद नहीं बने, लेकिन विचारों में बिखराव या विरोधाभास नहीं दिखेगा। विषय के हिसाब से लेखों को संकलित किया गया है, ताकि पाठकों को संदर्भ समझने में आसानी हो। स्वांतसुखाय लेखन और अब उसी भाव से प्रकाशित हो रहा यह संकलन अगर पाठकों के काम आए तो इसकी सार्थकता होगी।

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