नब्ज पर हाथ !

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मौजूदा महाकाल विचार, विवेचना, बुद्धि, तर्क, ज्ञान-विज्ञान पर तालाबंदी लिए हुए है। यकायक सब कुछ ठहरता, स्थगित होता, खत्म होता हुआ है।

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मौजूदा महाकाल विचार, विवेचना, बुद्धि, तर्क, ज्ञान-विज्ञान पर तालाबंदी लिए हुए है। यकायक सब कुछ ठहरता, स्थगित होता, खत्म होता हुआ है। नियंताओं ने, लोकतांत्रिक सत्ता ने अपनी आत्ममुग्धता में विचार-सत्य-बुद्धि-तर्क के विकल्पों पर जैसे कुंडली मारी है उसके चलते हिंदी प्रकाशन, पठन-पाठन या तो प्रायोजित है या डरा-सहमा और सांस तोड़ते हुए है। ऐसे में घटनाओं, मुद्दों और वक्त की विवेचना के तमाम विषयों पर वर्ष समीक्षा, विचार वार्षिकी या भारत-विचार में पुस्तक प्रकाशन (फिर भले वह ई-बुक से हो या छपी पुस्तक रूप में) की सोचना ही दुस्साहसी प्रयास है। ‘नया इंडिया’ की इस पहल का अर्थ क्या है, यह वक्त बताएंगा लेकिन इतना जरूर मानें कि ‘नया इंडिया’ का प्रयास अन्तःकरण की सहज उस जिद्द से है कि सत्य-साहस से यदि विचार लेखन आकार लिए हुए, सुलभ नहीं हुआ तो कौम, राष्ट्र, समाज, धर्म और मनुष्य की फिर विभिन्न विषाणुओं के आगे सामर्थ्य क्या रहेगी? जैसे भी हो, इंसान को, हिंदीभाषी समाज की बुद्धि को वक्त के मुहावरों में, वक्त का बेबाक खुलासा मिलना ही चाहिए।

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