रोबोटिक जनतंत्र कथा

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पुस्तक के लबोलुआब में  गौर करें पुस्तक अंश की इन लाईनों पर- “साढ़े छह साल में हर तरह की आंच का प्रबंधन करने में मिली सफलता ने नरेंद्र भाई के भीतर जैसा भरम भर दिया था

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पुस्तक के लबोलुआब में  गौर करें पुस्तक अंश की इन लाईनों पर- “साढ़े छह साल में हर तरह की आंच का प्रबंधन करने में मिली सफलता ने नरेंद्र भाई के भीतर जैसा भरम भर दिया था, उसे किसानों के एक आंदोलन की शुरुआती लपटों ने ही गंगाघाट दिखा दिया। अपनी ज़िद के चलते वे भले ही किसानों को अपने ठेंगे पर रखे रहें, मगर इस ज़रा-सी चिनगारी ने साबित कर दिया कि नरेंद्र भाई का फुस-महल कितना भुरभुरा है। ज़रा सोचिए, अगर देशवासी सपनीले झक्कू में न आते और कहीं 2016 की आठ नवंबर को रात आठ बजे के बाद उठ कर खड़े हो जाते तो क्या होता? ज़रा सोचिए, अगर छोटे कारोबारी 2017 की 30 जून की आधी रात के बाद सड़कों पर उतर आते तो क्या होता? ज़रा सोचिए, लॉकडाउन के कुप्रबंधन से त्रस्त एक करोड़ से ज़्यादा प्रवासी मज़दूर रोते-कलपते पांव-पांव अपने-अपने घरों की तरफ़ जाने के बजाय दिल्ली की ओर चल देते तो क्या होता? नरेंद्र भाई के पराक्रम का ताशमहल तो इन छह सालों में कब का कई बार बिखर चुका होता। सो, अब तक की शांति-व्यवस्था का श्रेय देश की उस छाती के धैर्य को दीजिए, जिस पर मूंग दलने में एक अधीर शासक ने कोई कसर बाकी नहीं रखी।

किसी के सब्र का कहिए, चाहे किसी के पाप का मानिए, यह घड़ा अब भरने को आ गया है। जिन्हें उनकी सुल्तानी सनक यह अहसास नहीं होने दे रही है कि पानी अब गले-गले तक आ गया है, उनकी सलामती के लिए, आइए, दुआ करें! मेरा ये लेख सहेज कर अपने पास इसलिए रख लीजिए कि 2023 की पहली तिमाही में मैं आपसे इसे दोबारा पढ़ने का अनुरोध करूंगा। आज नहीं, मगर तब आपको महसूस होगा कि मैं ग़लत नहीं था।

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