यह किसका देश है ?

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पुस्तक के आलेख लेखक की चिन्ताएं हैं, क्यों कि आखिर तमाम प्रसंगों, घटनाओं के बीच उसने इन बिन्दुओं पर ही लिखा।

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पुस्तक के आलेख लेखक की चिन्ताएं हैं, क्यों कि आखिर तमाम प्रसंगों, घटनाओं के बीच उसने इन बिन्दुओं पर ही लिखा। साथ ही, दूसरे अर्थ में ये राष्ट्रीय चिंताएं भी है, क्यों कि ऐसी छोटी या बड़ी, कोई न कोई ठोस बात, घटना, बयान, मौन, या हरकत तो हुई ही थी जिसने उस चिन्ता का रूप लिया, और उस पर लिखना उपयुक्त, कभी-कभी तो अनिवार्य लगा।

इस प्रकार, सब से अधिक लेख इस्लाम, हिन्दू-मुस्लिम संबंध, तथा संघ-परिवार के क्रिया-कलापों पर हैं। फिर शिक्षा विषयक। वस्तुतः ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। उन्हें पढ़कर किसी पाठक को यह सहजता से स्पष्ट होगा।

भारत आज उस स्थिति में है, जिस में दो या तीन सौ साल पहले लाहौर और ढाका थे। अर्थात् 70 प्रतिशत हिन्दू और 20 प्रतिशत मुसलमान। आज लाहौर में 1 प्रतिशत और ढाका में 4 प्रतिशत हिन्दू होंगे। जो बचे हैं, वे भी समाप्त होंगे। ऐसा एक दिन में या हिंसा से नहीं हुआ है। न केवल मुस्लिमों की तेज जनसंख्या-वृद्धि से। वह जिस सचेत प्रक्रिया से हुआ है, वह कुछ और है। जिस विषय की चर्चा हमारे देश में अघोषित रूप से प्रतिबंधित (टैबू) है। यह टैबू स्वयं उसी प्रक्रिया का अंग है, जिस से इस्लामी तकनीक काफिरों का सफाया करती है! चाहे इस सफाए में सदियों लगे। कोन्सटेंटीनोपल या अफगानिस्तान की तरह।

सो हिन्दू समाज जिस गंभीर संकट में हैं – उस का आभास ही इन लेखों का मूल कथ्य है। उनमें लिखी बातों का सत्य पाठक परख कर देख सकते हैं। यदि उन प्रश्नों, चिन्ताओं का उत्तर किसी ओर से, आधिकारिक रूप से, नहीं दिया जाता, तो इसका क्या अर्थ निकलता है?

आशा है, ये चिन्ताएं सुधी पाठकों और देशभक्त नीतिकारों तक पहुँचेंगी, जो इन का समाधान करने की दिशा में अपनी बेहतर बुद्धि और ऊर्जा लगाने का ध्यान करेंगे। यही पुस्तक का उद्देश्य है।

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